घरवालों को खेल की बात तक नहीं बताई, वुशु चैंपियनशिप में गोल्ड जीतकर लौटीं...मुजफ्फरपुर की दो बेटियां बनीं मिसाल

Muzaffarpur News: मुजफ्फरपुर की स्लम बस्ती से निकलकर माहिरा कुमारी और संध्या कुमारी ने 16वीं राज्य स्तरीय वुशु चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर नई मिसाल कायम की है. आर्थिक तंगी के बावजूद दोनों बेटियों ने शानदार प्रदर्शन किया और अब राष्ट्रीय प्रतियोगिता में बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगी. जानिए उनकी संघर्ष, मेहनत और सफलता की प्रेरणादायक कहानी.

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वुशु चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने वाली माहिरा और संध्या

मणि भूषण शर्मा

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'बड़ी मुश्किल से स्कूल जाने की इजाजत मिलती थी, ऐसे में खेल की बात घरवालों को बताने की हिम्मत नहीं हुई. जब गोल्ड मेडल जीतकर लौटी तो पूरे परिवार और मोहल्ले को पता चला, फिर सभी ने बधाई दी.' यह कहना है एक 11 साल की माहिरा कुमारी का, जिसने अभावों में रहकर भी कमाल कर दिखाया है. मुजफ्फरपुर की रहने वाली माहिरा कुमारी ने अपनी दोस्त संध्या कुमारी के साथ राज्य स्तरीय वुशु चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. माहिरा और संध्या की कहानी आज पूरे देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. आइए विस्तार से जानते हैं पूरी कहानी.

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राष्ट्रीय प्रतियोगिता में करेंगी बिहार का प्रतिनिधित्व

भागलपुर के खेल भवन में आयोजित 16वीं राज्य स्तरीय सब-जूनियर एवं जूनियर वुशु चैंपियनशिप में सिकंदरपुर स्लम बस्ती की रहने वाली माहिरा और संध्या ने अपने-अपने वर्ग में गोल्ड मेडल हासिल किया. इस शानदार प्रदर्शन के बाद दोनों का चयन राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ है, जहां वे बिहार का प्रतिनिधित्व करेंगी.

माहिरा और संध्या दोनों अप्पन पाठशाला की छात्राएं हैं. सीमित संसाधनों और आर्थिक अभाव के बीच उन्होंने वुशु की ट्रेनिंग शुरू की. शुरुआत में खेल की ड्रेस और जरूरी उपकरण खरीदना भी उनके परिवारों के लिए आसान नहीं था. लेकिन प्रशिक्षकों और संस्थान के सहयोग से दोनों ने लगातार अभ्यास जारी रखा और राज्य स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया.

माहिरा के पिता बेचते हैं सब्जी

11 साल की माहिरा के पिता सब्जी बेचते हैं, जबकि मां मजदूरी करती है और इन्हीं दोनों के सहयोग से परिवार का खर्च चलता है. माहिरा पिछले 5 सालों से अप्पन पाठशाला में पढ़ाई कर रही है और करीब डेढ़ साल से वुशु की ट्रेनिंग कर रही थी. माहिरा इस जीत से काफी ज्यादा ही खुशी है और जीतने के बाद उसने सबसे पहले अपने शिक्षक को यह खुशखबरी दी.

संध्या के पिता करते हैं पलदारी का काम

माहिरा की दोस्त संध्या की स्थिति भी लगभग समान है. 12 साल की संध्या अंबेडकर नगर स्लम बस्ती में रहकर पढ़ाई करती है. उसके पिता पलदारी का काम करते है तो मां दूसरों के घरों में जाकर चौका-बर्तन करती है. इन कामों से जो पैसा मिलता है उसी से परिवार का भरण-पोषण होता है. संध्या पिछले कई सालों से पढ़ाई के साथ-साथ वुशु की नियमित प्रैक्टिस कर रही है. संध्या का सपना है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए गोल्ड मेडल जीते.

स्कूल और शिक्षक में दिखा उत्साह

अप्पन पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार ने बताया कि दो वर्ष पहले वुशु प्रशिक्षकों के सहयोग से बच्चों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था शुरू की गई थी. आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को मुफ्त प्रशिक्षण और खेल सामग्री उपलब्ध कराई गई, जिसका परिणाम आज माहिरा और संध्या की सफलता के रूप में सामने है.

वहीं वुशु प्रशिक्षक सुनील कुमार ने बताया कि दोनों खिलाड़ी बेहद प्रतिभाशाली हैं. राष्ट्रीय प्रतियोगिता को देखते हुए उन्हें प्रतिदिन विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है. उन्होंने भरोसा जताया कि दोनों खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर भी शानदार प्रदर्शन कर बिहार और मुजफ्फरपुर का नाम रोशन करेंगी.

स्लम बस्ती की तंग गलियों से निकलकर राज्य स्तर पर स्वर्ण पदक जीतने वाली माहिरा और संध्या की कहानी इस बात का प्रमाण है कि प्रतिभा संसाधनों की नहीं, अवसर और मेहनत की मोहताज होती है. अब पूरे जिले की निगाहें राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उनके प्रदर्शन पर टिकी हैं.

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