रामचंद्र गुहा जब भी अपनी कलम उठाते हैं या किसी इंटरव्यू में बोलते हैं, तो राजनीतिक तूफान आना तय होता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि वो लेफ्ट या राइट वाले किसी राजनीतिक खांचे में फिट नहीं बैठते. BJP-RSS की राजनीति की आलोचना की तो राइट विंग ने देशविरोधी टैग दिया. कांग्रेस या राहुल गांधी के लिए भी दयालु नहीं रहे. कुल मिलाकर ये कि जब जिसके बारे में लिखते हैं वो वर्ग नाराज हुआ. राजनीतिक रूप से अकेले द्वीप पर खड़े ऐसे इंटेलेक्चुअल हैं जो दोनों तरफ से निशाने पर रहते हैं. रामचंद्र गुहा को भी सुनना पड़ता है. उन्हें आर्मचेयर क्रिटिक कहा जाता है जो बेंगलुरु के आलीशान घर में फिल्टर कॉफी पीते हुए दिल्ली की राजनीति पर ज्ञान दिया करते हैं.
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इसी बीच देश की राजनीति में रामचंद्र गुहा को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई. मोदी वर्सेस राहुल वाले दौर में उन्होंने कुछ ऐसा लिखा है जिससे कोई नाराज हुआ तो किसी को बहुत प्यार आ रहा है. आजकल बीजेपी वालों को रामचंद्र गुहा बड़े अच्छे लगने हैं लेकिन कांग्रेस वालों का पारा हाई है क्योंकि उन्होंने राहुल की काबिलियत पर क्वेश्चन मार्क लगाया है. एक वक्त वो भी था जब 2009 में यूपीए सरकार के समय राम गुहा को पद्म भूषण सम्मान मिला था.
रामचंद्र कह गए सिया से... कलयुग में बिना CV के नेता हैं राहुल गांधी. राहुल गांधी पर रामचंद्र गुहा के ऐसा कहने पर हंगामा मचा है. लेकिन कहानी राजनीतिक विवाद की नहीं, बल्कि बात उस इतिहासकार की, जो राजनीति का बड़ा 'कंजूस' क्रिटिक है. आखिर इस 'हिस्ट्री के इश्कजादे' राम गुहा की अपनी क्या कहानी है? कैसे दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज का एक नौजवान, जिसे इतिहास से कोई लेना-देना नहीं था, वो पुरानी फाइलों और खतों के इश्क में पड़कर देश का सबसे बड़ा इतिहासकार बन गया? और उससे भी दिलचस्प इस 'इश्कजादे' की अपनी असल जिंदगी की लव स्टोरी जो बेंगलुरु के आलीशान बंगले में फिल्टर कॉफी की चुस्कियों के साथ जवान होती गई. चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में जानिए पूरी कहानी.
पहले जानिए कौन हैं रामचंद्र गुहा?
रामचंद्र गुहा तमिल ब्राह्मण परिवार से हैं. उनका अपना जन्म देहरादून में हुआ लेकिन उनका परिवार बेंगलुरु में बसा. पिता सुब्रमण्यम रामदास गुहा वैज्ञानिक थे जो देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) में काम करते थे. मां देहरादून के ही एक स्कूल में पढ़ाती थीं. राम गुहा का बचपन देहरादून के जंगलों और पहाड़ों के बीच बीता, जिसने उनकी सोच को गहराई दी. शुरुआती पढ़ाई द दून स्कूल से करने के बाद सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया. आगे दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया. दिलचस्प बात ये है कि देश का सबसे बड़ा इतिहासकार बनने की राह पर चल रहे गुहा के पास कॉलेज के दिनों तक हिस्ट्री की कोई डिग्री नहीं थी.
रामचंद्र गुहा की लव-स्टोरी
रामचंद्र गुहा की शादी सुजाता केशवन से हुई, जो देश की मशहूर ग्राफिक डिजाइर्स में से हैं. मशहूर ब्रांड डिजाइन फर्म रे केशवन की को-फाउंडर हैं, जिसने देश के कई बड़े कॉर्पोरेट घरानों के ब्रांड लोगो डिजाइन किए हैं. दोनों की लव स्टोरी शुरू हुई दिल्ली में पढ़ाई के दौरान. कॉलेज के दिनों में ही दोनों की मुलाकात हुई और जल्द ही दोस्ती प्यार में बदल गई. हालांकि, दोनों के करियर के सपने बिल्कुल अलग थे. गुहा का एकेडमिक इंटरेस्ट था. सुजाता आर्ट,डिजाइन की दुनिया में करियर बना रही थीं.
कॉलेज के बाद दोनों का प्यार डिटेंस रिलेशनशिप के कड़े इम्तिहान से गुजरा. सुजाता केशवन ने दिल्ली से पहले डिजाइनिंग की पढ़ाई के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन अहमदाबाद, फिर अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी. रामचंद्र गुहा पीएचडी करते हुए जंगलों की खाक छान रहे थे. उस दौर में जब मोबाइल या इंटरनेट नहीं था, दोनों ने सालों तक चिट्ठियों और गिने-चुने ट्रंक कॉल्स के जरिए अपने रिश्ते को जिंदा रखा. जब चीजें सेटल हुई तब शादी की और दोनों ने बेंगलुरु में घर बसाया. राम गुहा किताबें लिखकर कमाई कर रहे थे जो कम थी. सुजाता घर की ब्रेडविनर यानी कमाई करने वाली थीं. गुहा अपनी किताबों के प्रीफेस यानी प्रस्तावना में अक्सर सुजाता का जिक्र करते हैं. उन्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक और दोस्त मानते हैं.
बिना हिस्ट्री की डिग्री के बने 'एक्सीडेंटल इतिहासकार'?
गुहा की लाइफ में ट्विस्ट तब आया जब वो कोलकाता IIM से पीएचडी कर रहे थे. चिपको आंदोलन पर रिसर्च करते-करते उन्हें पुरानी फाइलों और इतिहास के पन्नों से ऐसा इश्क हुआ कि इकोनॉमिस्ट बनने चला नौजवान देश का सबसे बड़ा एक्सीडेंटल हिस्टोरियन बन गया. आगे उन्होंने खुद को 'एक्सीडेंटल इतिहासकार' कहना शुरू किया क्योंकि उन्होंने औपचारिक रूप से कभी इतिहास नहीं पढ़ा.
अभी अचानक क्यों हो रही उनकी चर्चा?
दरअसल अब जो रामचंद्र गुहा ने लिखा बोला है वो राहुल गांधी के बारे में है. उन्होंने राहुल गांधी पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है. उन्होंने लिखा- राहुल में 'अनुशासन, गंभीरता और एक मजबूत सीवी यानी योग्यता-अनुभव की भारी कमी है. यूपीए सरकार के 10 सालों में राहुल ने कभी कोई मंत्री पद नहीं संभाला, इसलिए उनके पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है.' गुहा के मुताबिक, राहुल 'अंशकालिक राजनीतिज्ञ' की तरह काम करते हैं, वे संसद या प्रेस कॉन्फ्रेंस में 'वोट चोरी' जैसे किसी गंभीर मुद्दे पर बोलते हैं और फिर अचानक यूरोप या विदेश दौरे पर चले जाते हैं. गुहा की लाइन है कि, राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी के आदेश पर और उन्हीं के हित में अनमने ढंग से राजनीति कर रहे हैं. राहुल गांधी की कमियां और उनका 'वंशवादी चेहरा' ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है.
बयान से मचा बवाल, घेरने लगे राहुल के लोग!
रामचंद्र गुहा के इस लेख के आते ही राजनीतिक बवाल मच गया है. पूरा प्रो राहुल इको सिस्टम राम गुहा के खिलाफ है. कम ऑन रामचंद्र गुहा ये कुछ ज्यादा ही हो गया, ऐसा कहते हुए पहली बार राहुल गांधी के बचाव में उतरे शशि थरूर ने रामचंद्र गुहा को जमकर सुनाया. पलटवार किया कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और खुद नरेंद्र मोदी के पास 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले कोई केंद्रीय मंत्री पद या राष्ट्रीय प्रशासनिक अनुभव नहीं था. नेतृत्व के लिए अनुभव से ज्यादा विजन जरूरी होता है. राम गुहा के खिलाफ लिबरल गैंग से लेकर बहुत से पढ़े-लिखे बीजेपी के प्रोपेगंडा के आधार पर राहुल को बदनाम करने के आरोप लगा दिए हैं.
मोदी को पसंद नहीं करते फिर भी करते हैं तारीफ!
रामचंद्र गुहा ऐसे लेखक हैं जिन्होंने अपनी कलम को किसी विचारधारा का गुलाम नहीं बनने दिया. मोदी को पसंद नहीं करते और प्रशंसा भी करते रहे हैं. जो गुहा मोदी सरकार को Anti-Intellectual कह चुके हैं उन्हीं गुहा की नजर में मोदी बहुत मेहनती और आत्मनिर्भर नेता हैं. मोदी सरकार के साथ गुहा का सबसे सीधा टकराव दिसंबर 2019 को हुआ था जब बेंगलुरु के टाउन हॉल के बाहर CAA के खिलाफ शांति पूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे. मीडिया से बात करते समय बेंगलुरु पुलिस ने उन्हें बीच में ही लाइव कैमरे पर घसीटकर हिरासत में ले लिया था. 2018 में, गुजरात की अहमदाबाद यूनिवर्सिटी ने रामचंद्र गुहा को राजनीति विज्ञान का मानद प्रोफेसर (Chair Professor) नियुक्त किया था. लेकिन ABVP जैसे राइट विंग संगठनों के भारी विरोध और हंगामे के बाद गुहा को खुद उस पद से पीछे हटना पड़ा.
विवादों से भरा रहा सफर
मोदी-राहुल तो बाद में आए. रामचंद्र गुहा की पहचान के दो सबसे बड़े हिस्से बने महात्मा गांधी और क्रिकेट. गुहा बचपन से ही क्रिकेट के दीवाने रहे. उन्होंने भारतीय क्रिकेट के इतिहास पर 'अ कॉर्नर ऑफ ए फॉरेन फील्ड' जैसी कई बेहतरीन किताबें लिखीं. क्रिकेट के दीवाने थे लेकिन बीसीसीआई के कड़े आलोचक. ग्लोबल पहचान मिली महात्मा गांधी की 2 वैल्यूम वाली जीवनी गांधी बिफोर इंडिया और गांधी: द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड से. दुनिया भर के आर्काइव्स की खाक छानकर उन्होंने महात्मा गांधी के वो पहलू सामने लाए जो छिपे हुए थे.
2017 में रामचंद्र गुहा का जीवन एक बिल्कुल नए मोड़ पर आ गया. सुप्रीम कोर्ट ने क्रिकेट बॉडी बीसीसीआई में रिफॉर्म लोढ़ा कमेटी बनाई थी. सिफारिशों के आधार पर बीसीसीआई (BCCI) को चलाने के लिए कमेटी ऑफ एडमिनिस्ट्रेटर्स (CoA) का गठन किया, और राम गुहा को सदस्य बनाया. हालांकि, वो सफर लंबा नहीं चला. केवल चार महीनों के भीतर उन्होंने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि बीसीसीआई के भीतर 'सुपरस्टार कल्चर और Conflict of Interest हावी हैं जिसे सुधारा नहीं जा रहा. राम गुहा के इस्तीफे ने क्रिकेट की दुनिया ने हलचल मचा दी.
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