मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 'राज्यसभा का रण' दिलचस्प मोड़ पर आ गया है. नामांकन के आखिरी दिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपना तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारकर सूबे का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. यह सीट, जिसे कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन के लिए सुरक्षित माना जा रहा था, अब बीजेपी के महेश केवट की एंट्री के बाद 'हाई-वोल्टेज ड्रामा' का केंद्र बन गई है. बीजेपी के इस मास्टरस्ट्रोक ने न केवल कांग्रेस की रणनीति को चुनौती दी है, बल्कि खुद सत्ता पक्ष के लिए भी परीक्षा की घड़ी पैदा कर दी है.
ADVERTISEMENT
बीजेपी ने क्यों बदला अपना फैसला?
हैरानी की बात यह है कि कुछ दिन पहले तक बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व की ओर से ऐसे संकेत मिल रहे थे कि पार्टी केवल दो सीटों पर ही ध्यान केंद्रित करेगी. खुद बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने मीडिया से चर्चा में कहा था कि पार्टी तीसरे उम्मीदवार को उतारने पर विचार नहीं कर रही है. हालांकि, राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जैसे ही कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन का नाम फाइनल किया, कांग्रेस के अंदरूनी खेमे में असंतोष की खबरें सामने आने लगीं. सोशल मीडिया पर कई कांग्रेस नेताओं की नाराजगी और खेमेबाजी को देखते हुए बीजेपी ने इस मौके को भुनाने का फैसला किया और रविवार देर रात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के आवास पर हुई लंबी बैठकों के बाद महेश केवट के नाम पर मुहर लगा दी गई.
नंबर गेम और जीत का गणित
तीसरी सीट का मुकाबला पूरी तरह से संख्या बल (Numbers Game) पर टिका है. मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 वोटों की जरूरत है. कांग्रेस के पास संख्या बल के हिसाब से अपनी सीट सुरक्षित करने के पर्याप्त विधायक हैं. वहीं, बीजेपी के पास दो सीटें जीतने के बाद तीसरी सीट के लिए लगभग 8 से 10 वोटों की कमी पड़ रही है. बीजेपी का दावा है कि वे इस संख्या बल को जुटा लेंगे, जबकि कांग्रेस इसे 'लोकतंत्र की हत्या' और 'खरीद-फरोख्त' की राजनीति बता रही है.
क्रॉस वोटिंग का डर और कांग्रेस की 'बाड़ेबंदी'
बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार की घोषणा के बाद कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग का डर सताने लगा है. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस अपने विधायकों को टूटने से बचाने के लिए उन्हें किसी दूसरे राज्य (संभवतः कांग्रेस शासित राज्य) में शिफ्ट करने की तैयारी कर रही है. कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का कहना है कि उनके विधायक एकजुट हैं और बीजेपी की 'डराने-धमकाने' की राजनीति यहां काम नहीं करेगी. उनका कहना है कि मीनाक्षी नटराजन की जीत तय है और बीजेपी का तीसरा उम्मीदवार सिर्फ एक 'डमी' प्रत्याशी है.
बीजेपी के लिए भी आसान नहीं है राह
भले ही बीजेपी ने तीसरा उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस की धड़कनें बढ़ा दी हों, लेकिन यह फैसला मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के लिए भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. जानकारों का मानना है कि अगर बीजेपी जरूरी संख्या बल नहीं जुटा पाती और उनके तीसरे उम्मीदवार की हार होती है, तो यह पार्टी के नए नेतृत्व के लिए एक बड़ा झटका माना जाएगा. साथ ही, महेश केवट को उतारने के फैसले को यूपी चुनावों से जोड़कर भी देखा जा रहा है, जहां पार्टी बुंदेलखंड क्षेत्र के समुदायों को एक बड़ा संदेश देना चाहती है.
अब सबकी निगाहें 18 जून को होने वाली वोटिंग पर टिकी हैं. क्या बीजेपी अपनी रणनीति और 'साम-दाम-दंड-भेद' से तीसरी सीट पर कब्जा कर पाएगी, या कांग्रेस अपनी एकजुटता साबित कर मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा भेजने में कामयाब होगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
ADVERTISEMENT


