18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव ने एनडीए की एक जड़ को हिला दिया है. इसका इशारा इससे मिलता है कि पीएम मोदी के परम मित्र पूर्व पीएम एच डी देवगौड़ा अब सांसद नहीं बन पाएंगे. बीजेपी ने रविवार देर रात जैसे ही अपने कार्यकर्ता प्रोफेसर एम. नागराज को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया तो जेडीएस कैंप और देवगौड़ा कैंप में सन्नाटा पसर गया.
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कर्नाटक विधानसभा के नंबर के हिसाब से एनडीए चार में से सिर्फ एक राज्यसभा सीट जीत सकता है. जेडीएस के पास अपने दम पर देवेगौड़ा को राज्यसभा भेजने के लिए जरूरी नंबर नहीं हैं. व्हील चेयर से संसद की राजनीति कर रहे देवगौड़ा पूरी तरह बीजेपी की दया पर निर्भर थे. जेडीएस को उम्मीद थी कि बीजेपी देवेगौड़ा के सम्मान में राज्यसभा पहुंचा देगी लेकिन बीजेपी ने अपना उम्मीदवार उतारकर सब पलट दिया.
दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक सियासी भूचाल
आधी रात के एक फैसले ने दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक सियासी भूचाल ला दिया है. एनडीए के पार्टनर जेडीएस को इशारा मिल चुका है कि या तो अपमान सहन कर ले या एनडीए से निकल जाए. इस समय देवगौड़ा एंड फैमिली के लिए दोनों में से कोई भी फैसला आत्मघाती साबित हो सकता है.
कर्नाटक के हासन जिले के वोक्कालिग्गा किसान परिवार में जन्मे थे हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा देवेगौड़ा. 1953 में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद देवेगौड़ा सीधे किसानों के हक की लड़ाई में कूद पड़े. 1962 में महज 29 साल की उम्र में हासन जिले की होलेनरसिपुरा सीट से चुनाव जीतकर निर्दलीय विधायक बन गए. फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. देश की समाजवादी राजनीति का चेहरा बनते गए. उन्होंने ऐसा बैलेंस बनाया कि देश के राष्ट्रीय नेता भी बने और कर्नाटक में भी दबदबा बनाए रखा.,
एचडी देवेगौड़ा का चुनावी सफरनामा भारतीय राजनीति के सबसे बड़े रिकॉर्ड्स में से एक है. कुल 7 बार विधायक, 6 बार सांसद चुने गए. 1962 में पहली बार जीतने के बाद लगातार 1989 तक 7 बार कर्नाटक विधानसभा के सदस्य रहे. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति का रुख किया. 1991 से 2009 तक 5 बार लोकसभा सांसद का चुनाव जीते. बहुत बाद में 2020 में राज्यसभा में आए जिसका कार्यकाल इसी महीने खत्म हो जाएगा. इतना शानदार जानदार चुनावी सफर के बाद भी एक ही बार सीएम बने वो भी सिर्फ 2 साल के लिए.
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिनों में गिर गई
राजनीति में कब कुछ हो जाए, कब किसकी बदल जाए उसकी सबसे बड़े मिसाल माने जाते हैं एचडी देवगौड़ा. 1996 में देश में त्रिशंकु लोकसभा बनी, जहां बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सरकार में आई. लेकिन बहुमत की कमी से अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 दिनों में गिर गई. गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेस पार्टियों ने मिलकर 'यूनाइटेड फ्रंट' संयुक्त मोर्चा गठबंधन बनाया.
तब प्रधानमंत्री पद के लिए पहली पसंद पश्चिम बंगाल के सीएम ज्योति बसु थे, लेकिन वो नहीं माने. गठबंधन में किंगमेकर लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव ने मिलकर अचानक एचडी देवेगौड़ा के नाम का प्रस्ताव रखा. देवेगौड़ा उस समय कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे और राष्ट्रीय राजनीति की दौड़ से पूरी तरह बाहर थे. क्षत्रपों के आपसी गतिरोध को खत्म करने के लिए अचानक डार्क हॉर्स यानी सर्वसम्मत उम्मीदवार के रूप में उभरे और 1 जून 1996 को देश के 11वें प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. एक्सीडेंटस पीएम मनमोहन सिंह को पुकारा गया लेकिन पहले एक्सीडेंटल पीएम तो देवगौड़ा ही थे.
तब कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने बड़ा खेल करते हुए देवगौड़ा की सरकार को पहले बाहर से समर्थन देकर सरकार तो बनवा दी लेकिन 10 महीने में समर्थन वापस लेकर गिरा भी दी. सरकार गिरते एंटी कांग्रेस, एंटी बीजेपी मोर्चा ध्वस्त हो गया. जनता परिवार कई टुकड़ों में बंटा. एक टुकड़ा देवगौड़ा ने बटोरा.
बीजेपी-कांग्रेस से अलायंस
1999 में जनता दल ने वाजपेयी की सरकार बनवाने के लिए एनडीए ज्वाइन किया तो देवगौड़ा बिगड़ गए. वैचारिक मतभेद के कारण जनता दल का विभाजन हो गया. उस दौर में जनता दल से विभाजित होकर आगे-पीछे कई रीजनल पार्टियां जेडीयू, बीजेडी बनीं. देवेगौड़ा ने कर्नाटक के लिए जनता दल सेक्युलर यानी JDS नाम की पार्टी बना ली. तब कहां पता था कि आगे देवगौड़ा सुविधा की राजनीति के हिसाब से बीजेपी-कांग्रेस से अलायंस की चालें चलने वाले हैं. मोहरा बने उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी.
कर्नाटक की राजनीति में देवेगौड़ा का परिवार सबसे बड़ा और रसूखदार 'पॉलिटिकल डायनेस्टी' (राजनीतिक घराना) माना जाता है, जहां घर के कई सदस्य सक्रिय राजनीति में हैं. एचडी देवेगौड़ा और उनकी पत्नी चेन्नम्मा के चार बेटे और दो बेटियां हैं. एचडी कुमारस्वामी देवेगौड़ा के बड़े बेटे और राजनीतिक वारिस माने जाते हैं. उनकी पत्नी अनीता कुमारस्वामी भी विधायक रही हैं.
दूसरे बेटे एचडी रेवन्ना उनकी सीट से विधायक हैं. निखिल कुमारस्वामी एचडी कुमारस्वामी के बेटे हैं, जो एक्टर भी हैं और राजनीति में भी हैं. एच डी रेवन्ना के बेटे प्रज्वल रेवन्ना हासन से सांसद का चुनाव जीते लेकिन अब सेक्स स्कैंडल में बुरी तरह फंसे हैं.
पहले 2004 में कांग्रेस के साथ सरकार बनाई. फिर गिराकर बीजेपी के साथ नई सरकार बनाई. इस खेल के कारण 2007 तक जेडीएस किनारे पर लग गई. सत्ता कांग्रेस-बीजेपी में ट्रांसफर होने लगी. 2018 के विधानसभा चुनाव में किसी को बहुमत नहीं मिलने से जेडीएस की वापसी हुई. कांग्रेस के साथ फिर अलायंस किया जो येदियुरप्पा ने ऑपरेशन लोटस से तहस-नहस कर दिया. 2003 में तीनों पार्टियों ने अकेले चुनाव लड़ा लेकिन प्रचंड बहुमत कांग्रेस को मिला. बीजेपी-जेडीएस को मजबूरी में फिर साथ आना पड़ा. 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए नए पैच-अप का चुनावी असर इतना जोरदार रहा कि 28 में से 19 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की. इनाम में कुमारस्वामी को मोदी सरकार में मंत्री पद मिला और देवगौड़ा से पीएम मोदी की शुरू हुई पर्सनल दोस्ती जो अब फिर से खतरे के निशान पर है.
देवेगौड़ा को दरकिनार
देवेगौड़ा को राज्यसभा टिकट न देकर दरकिनार करने के पीछे बीजेपी की लंबी दूरी की पॉलिटिकल स्ट्रेटेजी हो सकती है. बीजेपी अब कर्नाटक में बैसाखियों के सहारे चलने के बजाय खुद को अकेले सबसे बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करना चाहती है. देवेगौड़ा की 93 साल की उम्र पार्टी के काम के लिए नहीं रहा. जेडीएस का लगातार सिमटते जनाधार को कंधा में पार्टी को कोई फायदा नहीं दिख रहा.
कर्नाटक में देवगौड़ा ने लंबे समय तक किंगमेकर का रोल निभाया लेकिन आज साइडलाइन हैं. टिकट कटने के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी-जेडीएस गठबंधन अब टूट जाएगा? अलायंस में खटास और तनाव जरूर बढ़ेगा, लेकिन गठबंधन तुरंत नहीं टूटेगा. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह हैं देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी, जो मोदी सरकार में केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री हैं. जेडीएस इस वक्त केंद्र की सत्ता में साझीदार है और कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपनी जमीन बचाए रखने के लिए उसे बीजेपी के साथ की सख्त जरूरत है. हालांकि, सीटों के बंटवारे और स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर दोनों दलों में पहले से ही खींचतान चल रही है. कुमारस्वामी ने अभी चुप्पी साध रखी है.
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