ITBP Jawans in Kanpur Police Office: उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने पूरे सरकारी और पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया. कानपुर पुलिस कमिश्नरेट दफ्तर के बाहर भारी संख्या में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के हथियारबंद जवान और कमांडो वर्दी में खड़े नजर आए. सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों को 'सेना वर्सेस पुलिस' और 'कमिश्नर दफ्तर की घेराबंदी' बताकर शेयर किया जाने लगा, जिससे सियासी गलियारों में भी बवाल मच गया. हालांकि, मामला बढ़ता देख खुद आईटीबीपी के कमांडेंट गौरव प्रसाद सामने आए और उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम पर बड़ी सफाई दी है.
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क्या है पूरा मामला, क्यों पहुंचे ITBP जवान?
इस पूरे विवाद की जड़ एक अस्पताल की कथित लापरवाही और इंसाफ की गुहार से जुड़ी है. दरअसल, आईटीबीपी के एक जवान विकास सिंह की मां को सांस लेने में तकलीफ के बाद कानपुर के टाटमिल स्थित कृष्णा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था. आरोप है कि डॉक्टरों की लापरवाही के चलते महिला के हाथ में गंभीर इंफेक्शन (संक्रमण) फैल गया, जिसके बाद डॉक्टरों को उनका हाथ काटना पड़ा.
इंसाफ न मिलने पर पीड़ित जवान कुछ दिन पहले अपनी मां का कटा हुआ हाथ लेकर ही पुलिस कमिश्नरेट दफ्तर पहुंच गया था. इसके बाद आईटीबीपी के अधिकारियों ने अपने जवान को न्याय दिलाने के लिए मोर्चा संभाला, क्योंकि बटालियन अधिकारियों के मुताबिक इसी अस्पताल में उनके दो अन्य जवानों के साथ भी ऐसा हो चुका था.
घेराबंदी नहीं हुई, मीडिया ने गलत रूप में लिया- ITBP कमांडेंट
23 मई को जब कमिश्नरेट दफ्तर के बाहर आईटीबीपी के जवान बड़ी संख्या में दिखे, तो हड़कंप मच गया. इस पर सफाई देते हुए आईटीबीपी के कमांडेंट गौरव प्रसाद ने कहा:
"जवान की माता का हाथ कटने के मामले के संबंध में मैंने पुलिस कमिश्नर सर से मिलने के लिए कल अपॉइंटमेंट लिया था. आज मैं, मेरे अधिकारी और जवान यहां आए थे. मैं अंदर कमिश्नर सर के साथ बैठक में था और जवान बाहर खड़े थे. मीडिया ने शायद इसे गलत लेवल और गलत रूप में ले लिया है. हमारी तरफ से घेराबंदी जैसी कोई कार्रवाई नहीं की गई है. हमें कमिश्नर सर पर पूरा भरोसा है और उनकी तरफ से पूरा सपोर्ट मिल रहा है.
मामले पर शुरू हुई सियासत
इस घटनाक्रम को लेकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने यूपी सरकार और पुलिस को कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे 'डबल इंजन सरकार का टकराव' बताते हुए लिखा कि यूपी पुलिस की नाइंसाफी देखकर अब देश के जवानों (ITBP) को भी इन पर भरोसा नहीं रहा है. दिल्ली का भरोसा लखनऊ से उठ चुका है और ऐसा लगता है जैसे दोनों एक-दूसरे के खिलाफ बंदूक ताने खड़े हैं.
पुलिस प्रशासन का क्या कहना है?
मामले में मचे बवाल पर कानपुर के अपर पुलिस आयुक्त डॉ. विपिन ताडा ने स्थिति स्पष्ट की. उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार यह मामला मेडिकल नेग्लिजेंस (चिकित्सकीय लापरवाही) का था, इसलिए इसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) के पास जांच के लिए भेजा गया था. डॉक्टरों की कमेटी ने जो पहली जांच रिपोर्ट सौंपी, पीड़ित पक्ष और आईटीबीपी के अधिकारी उसके कुछ बिंदुओं से असहमत थे.
पुलिस के मुताबिक, अब दोनों पक्षों की रजामंदी के बाद सीएमओ को उन आपत्तिजनक बिंदुओं पर दोबारा जांच (Re-investigation) करने के निर्देश दिए गए हैं. जांच के बाद जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसी आधार पर अस्पताल और संबंधित डॉक्टरों के खिलाफ सख्त विधिक कार्रवाई की जाएगी.
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