उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का मलीहाबाद इलाका इस समय एक बड़े सांप्रदायिक और सामाजिक विवाद का केंद्र बन गया है. कासमंडी किले पर मालिकाना हक को लेकर पासी समाज और मुस्लिम पक्ष आमने-सामने हैं. इस पूरे विवाद के बीच सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक सिर्फ एक ही नाम गूंज रहा है-सूरज पासी. खुद को नई पीढ़ी की सामाजिक चेतना का चेहरा बताने वाले सूरज पासी इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं और उनके एक बयान ने यूपी प्रशासन की नींद उड़ा दी है. दरअसल, 'लाखन आर्मी' के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूरज पासी ने सोशल मीडिया पर लाइव आकर शासन-प्रशासन को खुली चेतावनी दी है.
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सूरज पासी ने कहा ह कि "मैं प्रशासन को बता देना चाहता हूं कि बकरीद पर कोई भी गलत गतिविधि हमारे किले और प्राचीन शिव मंदिर पर हुई, तो लाखन आर्मी इसे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी. हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे. हम संविधान को मानने वाले लोग हैं, लेकिन अगर हमारी बातों को अनदेखा किया गया तो उसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी. हम इतनी तादाद में वहां पहुंचेंगे कि मलीहाबाद प्रशासन संभाल नहीं पाएगा."
क्या है कासमंडी किले का विवाद?
कासमंडी किले को लेकर दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे हैं:
पासी समाज का दावा: पासी समाज का कहना है कि यह किला उनके पूर्वज महाराजा कंसा पासी का ऐतिहासिक महल है, जहां एक प्राचीन शिव मंदिर मौजूद है.
मुस्लिम पक्ष का दावा: वहीं मुस्लिम पक्ष इसे एक पुरानी मस्जिद और मकबरे की जगह बता रहा है.
इस धार्मिक विवाद ने अब पासी समाज के भीतर एक नई सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता का रूप ले लिया है.
कौन हैं सूरज पासी? संघर्ष से 'लाखन आर्मी' तक का सफर
साल 1998 में लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के भोलापुर गांव में जन्मे सूरज पासी बेहद साधारण परिवार से आते हैं. जब वह महज 17 साल के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया. घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई. इस संघर्ष के बीच उन्होंने पासी समाज के गौरवशाली इतिहास को पढ़ना शुरू किया.
सूरज पासी का मानना है कि पासी समाज का अतीत बेहद समृद्ध था, लेकिन समय के साथ यह समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ गया. युवाओं में आत्मगौरव और स्वाभिमान जगाने के लिए उन्होंने 27 फरवरी 2023 को 'लाखन एकता मिशन' की शुरुआत की, जिसे आज 'लाखन आर्मी' के नाम से जाना जाता है.
80 जिलों में फैला साम्राज्य, जुड़ने के लिए अनोखी शर्त
शुरुआत में युवाओं तक सीमित रहने वाला यह संगठन आज उत्तर प्रदेश के करीब 80 जिलों में फैल चुका है. हरदोई, उन्नाव, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, गोरखपुर, शाहजहांपुर, पीलीभीत और आजमगढ़ जैसे जिलों में इस संगठन का मजबूत नेटवर्क है. अब यह संगठन बिहार और उत्तराखंड में भी पैर पसार रहा है.
लाखन आर्मी से जुड़ने वाले युवाओं के लिए पहली और सबसे बड़ी शर्त 'नशा मुक्त' होना है. युवाओं को शराब, ड्रग्स और अपराध से दूर रहने की शपथ दिलाई जाती है. इसी सामाजिक सुधार के कारण बुजुर्ग और समाज के प्रबुद्ध लोग भी इस संगठन का समर्थन कर रहे हैं. इसके अलावा, यह संगठन दलित और वंचित समाज के धर्मांतरण के खिलाफ भी बेहद मुखर है.
यूपी की राजनीति में 'पासी फैक्टर' क्यों है अहम?
उत्तर प्रदेश की सियासत में पासी समाज को एक बहुत बड़ा चुनावी फैक्टर माना जाता है. दलित समुदाय में जाटव समाज के बाद पासी समाज दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. अवध और पूर्वांचल के कई जिलों में यह वोट बैंक किसी भी राजनीतिक दल का समीकरण बनाने या बिगाड़ने की ताकत रखता है. यही वजह है कि कासमंडी विवाद अब सिर्फ एक स्थानीय धार्मिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह पासी समाज की नई पीढ़ी की राजनीतिक लामबंदी का बड़ा प्रतीक बन चुका है.
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