एक देश एक चुनाव: मोदी सरकार और BJP तो इसके पक्ष में पर आम लोगों की क्या है राय?

अभिषेक गुप्ता

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One Nation One Election
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One Nation One Election: हाल के दिनों में आपने ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ यानी ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर चर्चा सुनी ही होगी. केंद्र की मोदी सरकार इसे अमलीजामा पहनाने को लेकर काफी ऐक्टिव दिखी है. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में इसके लिए बनी कमेटी ने पिछले दिनों राजनीतिक दलों के अलावा आम लोगों से भी इस बारे में सुझाव मांगे थे. विपक्षी दलों के विरोध के बीच आम लोगों के भी हजारों सुझाव मिले हैं. एक देश एक चुनाव सत्तारूढ़ बीजेपी का चुनावी मुद्दा भी रहा है. आइए आपको इससे जुड़े लेटेस्ट डेवलपमेंट और लोगों से मिले सुझाव के बारे में बताते हैं.

केंद्र सरकार ने पिछले साल सितंबर में रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक हाई लेवल कमेटी बनाई थी. कमेटी की अबतक दो बैठकें हो चुकी है. 18 जनवरी को इसकी तीसरी बैठक होनी है. बैठक में इसके कई पहलुओं पर विचार होने की संभावना है. ‘एक देश एक चुनाव’ पर करीब सभी विपक्षी और क्षेत्रीय दलों ने असहमति जताई है. पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि भारत के संघीय ढांचे के मद्देनजर ‘एक देश, एक चुनाव’ का विचार व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है. ममता ने कमेटी के सुझाव मांगने वाले पत्र पर कहा था कि वह इसका व्यवहारिक रूप से समर्थन नहीं कर सकतीं.

वन नेशन वन इलेक्शन पर लोगों की क्या राय है?

कमेटी ने इसी महीने 15 तारीख को देश में ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ और इससे संबंधित कानूनों के लिए आम जनता से भी सुझाव मांगे थे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कमेटी को 20000 से ज्यादा सुझाव मिले हैं. बताया ये भी जा रहा है कि, ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ पर अधिकांश जनता का मूड इसके फेवर में है.

चुनाव आयोग से भी मांगा है सुझाव

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, कमेटी ने चुनाव आयोग से भी देश में एक साथ चुनाव कराने को लेकर चुनौतियों और संभावनाओं को लेकर सुझाव मांगे हैं. कुल मिलाकर कमेटी ने इलेक्शन कमीशन से देश में एकसाथ चुनाव के लिए आयोग के ओपिनियन के साथ ही EVM और VVPAT जैसी लॉजिस्टिक्स की उपलब्धता आदि पर विचार मांगा है.

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वैसे क्या है ‘वन नेशन वन इलेक्शन’?

एक देश, एक चुनाव का आशय देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव को एकसाथ कराने से है. इसको लागू करने के पीछे का सबसे प्रमुख लक्ष्य देश में होने वाले चुनावों की बारंबारता को कम करने से है. भारत एक बड़ा देश है. देश में हमेशा कहीं न कहीं चुनाव होते रहते है जिससे संसाधनों के साथ-साथ भरी-भरकम पैसों की खपत होती है. वन नेशन-वन इलेक्शन से इसपर लगाम लगेगी साथ ही सरकारों की स्टेबिलिटी भी बढ़ेगी.

देश में आजादी के बाद से पहली लोकसभा से लेकर साल 1967 तक के लोकसभा और राज्यों के विधानसभा के चुनाव एकसाथ ही हुए थे. इसके बाद से ही देश में चुनाव अलग-अलग समयावधि में होने लगे जो आज तक चला आ रहा है.

इसे लेकर कहा फंस रहा पेच?

देश में वन नेशन वन इलेक्शन के लागू होने के बाद सबसे बड़ा मुद्दा क्षेत्रीय मुद्दों की उपेक्षा होने के खतरे का है. भारत एक विविधतावों वाला देश है, यहां 28 राज्य हैं, जिनमें अनेक क्षेत्रीय दल हैं. सभी राज्यों के अपने अलग-अलग मुद्दे हैं. एक साथ चुनाव होने पर वे मुद्दे पीछे छूट जाएंगे.

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