पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले राज्य की राजनीति में एक बड़ा आंकड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है. SIR (Special Information Report) के बाद राज्य की मतदाता सूची से करीब 57 लाख वोटरों के नाम कम होने की खबर है. इस बदलाव ने न केवल टीएमसी और बीजेपी के बीच की चुनावी जंग को दिलचस्प बना दिया है, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों को भी गुणा-भाग करने पर मजबूर कर दिया है.
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क्या है वोटों का गणित?
2021 के विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में कुल 7.34 करोड़ वोटर थे, जो अब घटकर 6.77 करोड़ रह गए हैं. यानी लगभग 57 लाख वोटरों के नाम कटे हैं.
- 2021 का फासला: ममता बनर्जी की टीएमसी और बीजेपी के बीच जीत का अंतर लगभग 60 लाख वोटों का था.
- 2024 का बदलाव: लोकसभा चुनाव में यह अंतर घटकर 42 लाख रह गया था.
- प्रति सीट प्रभाव: आंकड़ों के अनुसार, हर विधानसभा सीट से औसतन 19,000 वोटरों के नाम कटे हैं.
क्या ममता बनर्जी के लिए यह खतरे की घंटी है?
2021 में टीएमसी 215 सीटों पर जीती थी और उसका औसत जीत का अंतर (Victory Margin) लगभग 33,000 वोट था. अगर हर सीट से 19,000 वोट कटे हैं, तो भी टीएमसी के पास प्रति सीट औसतन 14,000 वोटों का 'बफर' बचता है. लेकिन असली चुनौती एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) है. ममता बनर्जी के 15 साल के शासनकाल के बाद, क्या यह 14,000 वोटों का मार्जिन बीजेपी की ओर शिफ्ट होगा? यह एक बड़ा सवाल है.
किसका वोट कटा: हिंदू या मुस्लिम?
मीडिया रिपोर्ट्स और शुरुआती आकलन के अनुसार, कटे हुए वोटों में 2/3 हिंदू समाज से और 1/3 मुस्लिम समाज से बताए जा रहे हैं. चूंकि पश्चिम बंगाल में हिंदू वोटरों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी को भी वोट करता है, इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसका सारा नुकसान केवल ममता बनर्जी को ही होगा. बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि वह इन बचे हुए वोटरों में से कितनों को अपने पाले में ला पाती है.
चुनावी दिशा और दशा
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल वोट कटने से हार-जीत का फैसला नहीं होगा, बल्कि बीजेपी को एंटी-इनकंबेंसी के साथ-साथ उन वोटरों को लुभाना होगा जो अब भी सूची में बरकरार हैं. 15 साल की सरकार के बाद जनता का मूड और नई मतदाता सूची का ये समीकरण 2026 के संग्राम को और भी रोमांचक बना रहा है.
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