कौन थे नागरमल बाजोरिया! 280 बार चुनाव लड़े, इंदिरा-वाजपेयी-आडवाणी को दी चुनौती, 97 साल की उम्र में ‘धरतीपकड़’ का निधन

न्यूज तक डेस्क

• 01:07 PM • 04 Sep 2026

नागरमल बाजोरिया उर्फ धरतीपकड़ का 97 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्होंने करीब 280 चुनाव लड़े और इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वाजपेयी और आडवाणी जैसे नेताओं को चुनौती दी. 2012 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी नामांकन किया था. चुनावी हार के बावजूद लोकतंत्र में भागीदारी और समाजसेवा उनका जुनून रही.

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बिहार के भागलपुर में ‘धरती पकड़’ के नाम से मशहूर नागरमल बाजोरिया का 97 साल की उम्र में निधन हो गया. नागरमल बाजोरिया ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा चुनाव लड़ते हुए गुजारा. उन्होंने वार्ड और नगर निकाय से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक में अपनी दावेदारी पेश की. अपने लंबे राजनीतिक सफर में उन्होंने 280 से ज्यादा बार चुनावी मैदान में उतरकर एक अलग पहचान बनाई.

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लाहौर में जन्म, भागलपुर बना कर्मभूमि

नागरमल बाजोरिया का जन्म साल 1930 में लाहौर में हुआ था. उस समय भारत और पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था. आजादी से पहले उनका परिवार भागलपुर आकर बस गया था. परिवार ने शहर के एमपी द्विवेदी रोड के पास अपना घर बनाया. इसके बाद भागलपुर ही नागरमल बाजोरिया की कर्मभूमि बन गया.

सितंबर 2026 में 97 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद उनका निधन पटना में हुआ. उनके अंतिम संस्कार की तैयारी भागलपुर में की जा रही है. उनका अंतिम संस्कार गंगा नदी के किनारे बरारी श्मशान घाट पर किया जाएगा.

करीब 30 साल की उम्र में जीता था चुनाव

नागरमल बाजोरिया को चुनाव लड़ने का जुनून था, लेकिन उनका मकसद केवल जीत हासिल करना नहीं था. उनके पोते सौरव बाजोरिया के मुताबिक, दादा जी चुनाव के जरिए लोगों को जागरूक करना चाहते थे.

नागरमल का मानना था कि चुनाव में बार-बार हार जाना ही असली असफलता नहीं है. उनके लिए यह दिखाना जरूरी था कि एक सामान्य आदमी भी सत्ता के बड़े से बड़े चुनाव में अपनी आवाज उठा सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन में चुनाव जीता भी था. करीब 30 साल की उम्र में वह भागलपुर नगरपालिका का चुनाव जीतकर नगर निकाय में पहुंचे थे.

राष्ट्रपति चुनाव में भी उतरे

नागरमल बाजोरिया का चुनावी सफर सिर्फ स्थानीय चुनावों तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने देश के बड़े नेताओं के खिलाफ भी चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया.

साल 1969 में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति वी. वी. गिरि के खिलाफ राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था. इसके अलावा उन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली और राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से भी चुनाव लड़ने की कोशिश की.

उनकी चुनावी सूची में संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और प्रणब मुखर्जी जैसे बड़े नेताओं के खिलाफ नामांकन दाखिल करना भी शामिल रहा.

गधे के साथ निकाली थी भ्रष्टाचार विरोधी रैली

नागरमल बाजोरिया अपने अनोखे चुनाव प्रचार के लिए भी चर्चा में रहते थे. साल 2005 में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अलग अंदाज में प्रचार किया.

वह ऐसे कपड़े पहनकर चुनाव प्रचार करते थे, जिन पर नारे लिखे होते थे. एक रैली में उन्होंने गधों का इस्तेमाल किया था. गधे के गले में भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश वाली तख्ती लटकाई गई थी. इस अनोखे प्रचार ने लोगों का ध्यान खींचा था.

हाथ में घंटी, कलाई पर पुरानी घड़ी

‘धरती पकड़’ की पहचान उनके चुनाव प्रचार के अंदाज से भी होती थी. चुनाव के दौरान उनकी कलाई पर गांधी जी के दौर की शैली वाली घड़ी दिखाई देती थी. हाथ में वह घंटी रखते थे और रैली के दौरान उसे बजाते हुए लोगों के बीच जाते थे.

घंटी बजाकर वह लोगों को लोकतंत्र और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की कोशिश करते थे. उनका चुनाव प्रचार दूसरे उम्मीदवारों से काफी अलग होता था.

गरीब बेटियों की शादी में करते थे मदद

नागरमल बाजोरिया सिर्फ चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहे. समाजसेवा भी उनके जीवन का अहम हिस्सा रही. वह गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में आर्थिक मदद करते थे.

भागलपुर के कई इलाकों में पानी की समस्या को देखते हुए उन्होंने अपने खर्च पर हैंडपंप भी लगवाए थे. स्थानीय स्तर पर लोगों की मदद करने के कारण भी उनकी पहचान बनी.

2019 तक लड़ते रहे चुनाव

नागरमल बाजोरिया ने उम्र बढ़ने के बावजूद चुनाव लड़ना नहीं छोड़ा. उनका चुनावी सफर 2019 तक जारी रहा. जिंदगी में 280 से अधिक बार चुनावी मैदान में उतरना अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड जैसा है.

उनकी कहानी सिर्फ चुनाव हारने या जीतने की नहीं थी. वह चुनाव को आम आदमी की आवाज उठाने का जरिया मानते थे. इसी वजह से ‘धरती पकड़’ नाम उनकी पहचान बन गया.

लाहौर में जन्म, भागलपुर में होगा अंतिम संस्कार

नागरमल बाजोरिया का जन्म लाहौर में हुआ था, लेकिन उनका जीवन और सार्वजनिक पहचान भागलपुर से जुड़ी रही. जिंदगी की आखिरी सांस उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में ली.

अब उनकी अंतिम विदाई उनकी कर्मभूमि भागलपुर में होगी. गंगा किनारे बरारी श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. उनके निधन के साथ ही भागलपुर की राजनीति और चुनावी किस्सों से जुड़ा एक ऐसा अध्याय खत्म हो गया, जिसे लंबे समय तक याद किया जाएगा.

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