बिहार की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है. अमूमन अपने फैसलों पर अडिग रहने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए अपना घोषित प्रत्याशी बदलना पड़ा है. बीजेपी उम्मीदवार अभिषेक कुमार उर्फ अभिषेक बंटी ने नामांकन दाखिल करने के महज 30 घंटे के भीतर ही बेहद नाटकीय घटनाक्रम में अपना नाम वापस ले लिया. इसके बाद बीजेपी ने तुरंत 'डैमेज कंट्रोल' करते हुए अपनी रणनीति बदली और 32 वर्षीय पार्टी कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को बांकीपुर से अपना नया उम्मीदवार घोषित कर दिया है। नीरज कुमार सिन्हा ग्रेजुएट (स्नातक) हैं.
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पारिवारिक वजह या राजनीतिक मजबूरी?
इस पूरे नाटकीय घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब अभिषेक बंटी ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी से मुलाकात की और चुनाव न लड़ने की इच्छा जताते हुए अपना नामांकन वापस लेने की चिट्ठी सौंप दी. इसके बाद बिहार के सियासी गलियारों में भूचाल आ गया. हालांकि, अभिषेक बंटी की ओर से सार्वजनिक तौर पर यह संदेश दिया गया है कि वह पारिवारिक कारणों से यह विधानसभा उपचुनाव लड़ने में असमर्थ हैं. लेकिन इस दलील पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि नाम वापसी से महज 24 घंटे पहले ही वह अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर धूमधाम से नामांकन करने निकले थे. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि 24 घंटे के भीतर ऐसा कौन सा पारिवारिक कारण आ गया कि उन्हें मैदान से हटना पड़ा.
शिक्षा को लेकर शुरू हुआ था विवाद
अभिषेक बंटी को टिकट दिए जाने के बाद से ही उनके शैक्षणिक योग्यता को लेकर सोशल मीडिया और सियासी हलकों में विवाद शुरू हो गया था. अभिषेक बंटी ने अपने चुनावी हलफनामे (एफिडेविट) में जानकारी दी थी कि उन्होंने बिहार बोर्ड से भी नहीं, बल्कि संस्कृत बोर्ड से केवल 10वीं (मैट्रिक) पास की है. बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र को पटना का सबसे समृद्ध और बौद्धिक रूप से मजबूत इलाका माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे लोग, आईएएस और आईपीएस अधिकारी रहते हैं. विपक्षी दलों ने इस बात को मुद्दा बनाना शुरू कर दिया था और तंज कसा जा रहा था कि सबसे शिक्षित आबादी वाले क्षेत्र में बीजेपी ने सिर्फ 10वीं पास प्रत्याशी को मैदान में उतार दिया है.
क्या विपक्ष के हाथ लग गया था कोई बड़ा मुद्दा?
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी जोरदार चर्चा है कि केवल शिक्षा का विवाद ही उम्मीदवार बदलने की इकलौती वजह नहीं है.सूत्रों और कयासों के मुताबिक, विपक्षी खेमे को अभिषेक बंटी के इतिहास या पुरानी घटनाओं से जुड़ी कुछ ऐसी जानकारियां हाथ लग गई थीं, जिन्हें अगर चुनाव के दौरान सामने लाया जाता तो बड़ा राजनीतिक बवाल हो सकता था. हालांकि, इन बातों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन माना जा रहा है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को भनक लग गई थी कि अगर अभिषेक बंटी मैदान में रहे तो पार्टी की भारी फजीहत हो सकती है और चुनाव में हार का सामना करना पड़ सकता है. इसी बड़े नुकसान से बचने के लिए पार्टी के सबसे ऊंचे स्तर पर यह फैसला लिया गया.
35 साल पुराने गढ़ को बचाने की चुनौती और 'पीके फैक्टर'
बांकीपुर विधानसभा सीट बीजेपी की परंपरागत और सबसे सुरक्षित सीटों में से एक मानी जाती है, जहां पिछले 35 सालों से बीजेपी का ही कब्जा रहा है. इस सीट से मौजूदा समय में बीजेपी के पांच बार के विधायक और वरिष्ठ नेता नितिन नवीन प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं. नितिन नवीन के इस गढ़ में अगर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ता, तो इसका संदेश पूरे बिहार ही नहीं बल्कि देश भर में जाता कि बीजेपी कमजोर पड़ रही है.
इसके साथ ही, इस चुनाव में जन सुराज के मुखिया प्रशांत किशोर (पीके) के फैक्टर को भी बेहद अहम माना जा रहा है. माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर जैसे बड़े चेहरों के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरने के लिए बीजेपी को एक ऐसी साफ-सुथरी और बेदाग छवि वाले उम्मीदवार की जरूरत थी, जिसका विवादों से कोई नाता न हो. यही वजह है कि 13 जुलाई को नामांकन की आखिरी तारीख से ठीक पहले बीजेपी ने आनन-फानन में डैमेज कंट्रोल करते हुए नीरज कुमार सिन्हा के नाम पर मुहर लगा दी है.
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