बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव इस समय सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बना हुआ है. यह चुनाव केवल एक विधानसभा सीट को जीतने का मुकाबला नहीं है, बल्कि यह जन सुराज के सूत्रधार और देश के जाने-माने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला लिटमस टेस्ट साबित होने जा रहा है. कई वर्षों तक देश की बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनावी बिसात बिछाने वाले और मुख्यमंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्रियों तक को सत्ता के शिखर पर पहुंचाने वाले प्रशांत किशोर आज खुद बांकीपुर के चुनावी मैदान में उतरे हुए हैं. उनके लिए यह उपचुनाव किसी 'करो या मरो' की स्थिति से कम नहीं माना जा रहा है.
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चुनावी विफलता के बाद अंधेरे में रोशनी की किरण
प्रशांत किशोर ने साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के साथ एक बहुत बड़ा दांव खेला था, लेकिन नतीजों ने उनके सारे दावों को ध्वस्त कर दिया. जन सुराज या उनकी पार्टी ने 238 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पिछले दो-तीन सालों की कड़ी मेहनत के बावजूद पार्टी को एक भी सीट पर सफलता हासिल नहीं हुई.
इस करारी हार के बाद बिहार के राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा था कि क्या जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमने वाली बिहार की सियासत में प्रशांत किशोर की बदलाव वाली राजनीति की कोई जगह बची भी है या नहीं. ऐसे निराशाजनक माहौल के बीच बांकीपुर का यह अचानक हो रहा विधानसभा उपचुनाव प्रशांत किशोर के लिए अंधेरे में एक दीये की रोशनी के समान बनकर सामने आया है, जो उन्हें समय से पहले खुद को साबित करने का एक और मौका दे रहा है.
बीजेपी का अभेद्य किला और सीधी टक्कर का मुकाबला
बांकीपुर विधानसभा सीट पिछले 40 से 45 सालों से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का एक अभेद्य गढ़ रही है. यह सीट मौजूदा समय में बीजेपी के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन की रही है, जो यहां से लगातार पांच बार चुनाव जीत चुके हैं. इस बार बीजेपी ने इस कायस्थ बहुल सीट पर बेहद सोच-समझकर अपने सामाजिक समीकरण के तहत अभिषेक कुमार को अपना प्रत्याशी बनाया है.
हालांकि इस चुनावी समर में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की तरफ से रेखा गुप्ता और तेज प्रताप यादव की पार्टी जनशक्ति जनता दल से मानवीना मानवी भी मैदान में हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर मुख्य मुकाबला प्रशांत किशोर बनाम बीजेपी के अभिषेक कुमार के बीच ही देखा जा रहा है. प्रशांत किशोर ने खुद मैदान में उतरकर और आक्रामक प्रचार शुरू करके इस पूरे चुनावी मुकाबले को वन-टू-वन जैसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है.
अगर प्रशांत किशोर की जीत हुई, तो क्या होंगे मायने?
यदि प्रशांत किशोर इस पारंपरिक बीजेपी के गढ़ में किसी भी तरह से जीत हासिल करने में कामयाब हो जाते हैं, तो यह उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी छलांग मानी जाएगी. एक राजनेता के रूप में उन्हें न सिर्फ पूरे देश में एक नई और मजबूत पहचान मिलेगी, बल्कि बिहार समेत पूरे देश में एक बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश भी जाएगा.
उनकी यह जीत साबित कर देगी कि बिहार की जनता अब सिर्फ पारंपरिक जातीय गोलबंदी और जाति-पाति के आधार पर वोट नहीं करती, बल्कि वह व्यवस्था में वास्तविक बदलाव और परिवर्तन चाहती है. रणनीतिकार के तौर पर तो बीजेपी, तृणमूल कांग्रेस, वाईएसआर कांग्रेस, डीएमके और 2015 के महागठबंधन में उनका लोहा सबने माना ही था, लेकिन यह जीत उन्हें सीधे जननेता के रूप में स्थापित कर देगी.
सम्मानजनक हार से तेजस्वी यादव के विकल्प बनने की राह
इस चुनाव का दूसरा पहलू यह भी है कि यदि प्रशांत किशोर चुनाव जीतने से चूक जाते हैं, लेकिन वह बहुत ही कम मार्जिन या सम्मानजनक अंतर से दूसरे स्थान पर रहते हैं, तो भी उनके लिए राह पूरी तरह बंद नहीं होगी. 2025 की बड़ी विफलता के बाद भी जिस तरह प्रशांत किशोर बिहार में लगातार डटे हुए हैं और हर जिले का दौरा कर रहे हैं, उससे वह कम अंतर की हार के बावजूद बिहार में विपक्ष का एक बहुत बड़ा चेहरा बनकर उभर सकते हैं.
मौजूदा समय में बिहार में विपक्ष का मुख्य चेहरा आरजेडी के तेजस्वी यादव हैं, लेकिन उनके अक्सर दिल्ली या विदेश दौरे पर रहने और संकट के समय मौजूद न रहने को लेकर हमेशा सवाल खड़े होते रहे हैं. ऐसे में बांकीपुर में एक मजबूत फाइट देकर प्रशांत किशोर खुद को तेजस्वी यादव के एक मजबूत और सक्रिय विकल्प के तौर पर जनता के सामने पेश कर सकेंगे.
बड़ी शिकस्त का राजनीतिक भविष्य पर क्या पड़ेगा असर?
इस त्रिकोणीय और दिलचस्प मुकाबले का तीसरा और सबसे गंभीर पहलू यह है कि यदि बीजेपी प्रशांत किशोर को एकतरफा और बंपर वोटों के अंतर से हरा देती है, तो प्रशांत किशोर के राजनीतिक भविष्य पर बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा. एक करारी और बड़ी हार के बाद राजनेता के तौर पर प्रशांत किशोर की पूरी विश्वसनीयता और क्षमता पर ही गंभीर सवालिया निशान लग जाएगा.
राजनीतिक विश्लेषकों और विरोधी दलों को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि चुनाव की रणनीतियां बनाना या दूसरों को लड़वाना तो अलग बात है, लेकिन खुद जमीन पर उतरकर चुनाव जीतना बेहद टेढ़ी खीर है. ऐसी स्थिति में प्रशांत किशोर के नेतृत्व और उनकी नेतागिरी पर भी सवाल उठेंगे कि क्या उन्हें राजनीति करनी भी चाहिए या सिर्फ पर्दे के पीछे रहकर रणनीति ही बनानी चाहिए. फिलहाल बांकीपुर के चुनावी नतीजों पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं क्योंकि यही परिणाम प्रशांत किशोर की आगे की सियासी दशा और दिशा तय करेगा.
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