Bankipur ByElection: बीजेपी के नीरज सिन्हा का पलड़ा अभी भी भारी, जानें क्यों मुश्किल है प्रशांत किशोर के जीत की राह

रोहित कुमार सिंह

14 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 14 2026 8:43 AM)

Bankipur ByElection: बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी के 35 साल पुराने मजबूत गढ़ को भेदने के लिए जन सुराज के प्रशांत किशोर खुद मैदान में उतरे हैं, जिससे मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है.

नीरज कुमार सिन्हा और प्रशांत किशोर
नीरज कुमार सिन्हा और प्रशांत किशोर
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बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने जा रहा उपचुनाव बेहद दिलचस्प और हाई-प्रोफाइल हो चुका है. 13 जुलाई को नामांकन के आखिरी दिन जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor), भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा और जनतांत्रिक जनता दल की वीणा मानवीय ने अपने-अपने पर्चे दाखिल कर दिए हैं. वैसे तो मैदान में कई चेहरे हैं, लेकिन असल मुकाबला 'भाजपा बनाम प्रशांत किशोर' के बीच सिमट गया है.

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बांकीपुर को पिछले 35 सालों से भाजपा का सबसे मजबूत और अभेद किला माना जाता रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या खुद चुनावी मैदान में उतरे प्रशांत किशोर इस गढ़ में सेंधमारी कर पाएंगे या फिर बीजेपी अपनी इस परंपरागत सीट को बचाने में कामयाब रहेगी? आइए समझते हैं कि इस चुनावी रण में बीजेपी उम्मीदवार नीरज सिन्हा का पलड़ा क्यों भारी दिख रहा है और प्रशांत किशोर के सामने क्या बड़ी चुनौतियां हैं.

1. 35 सालों का परंपरागत वोट बैंक और जातीय समीकरण

बांकीपुर सीट परंपरागत रूप से भाजपा की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक रही है. जातीय समीकरण की बात करें तो यह इलाका कायस्थ बहुल माना जाता है. इसके साथ ही यहां वैश्य समाज की भी अच्छी-खासी तादाद है, जो लंबे समय से भाजपा का कोर वोटर रहा है. यह क्षेत्र प्रबुद्ध वर्ग (पढ़े-लिखे लोग), मिडिल क्लास परिवारों, व्यापारियों, प्रोफेशनल्स और छात्रों का गढ़ है, जिनका झुकाव अमूमन भाजपा की तरफ रहता है. इस मजबूत सामाजिक और जातीय ताने-बाने को भेदना प्रशांत किशोर के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होगी.

2. बूथ लेवल का मजबूत संगठन बनाम जन सुराज का नया ढांचा

चुनाव में सिर्फ बड़े चेहरे की लोकप्रियता काम नहीं आती, बल्कि सबसे ज्यादा मायने रखता है इलेक्शन मैनेजमेंट. भाजपा का बांकीपुर में बूथ लेवल तक का संगठन बेहद मजबूत है. इलाके के लगभग हर मोहल्ले और घर में बीजेपी का कोई न कोई कार्यकर्ता या काडर मौजूद है. मतदान के दिन अपने वोटरों को घरों से निकालकर पोलिंग बूथ तक पहुंचाने की जो कला भाजपा के पास है, उसका तोड़ ढूंढना प्रशांत किशोर के लिए आसान नहीं होगा. दूसरी तरफ, जन सुराज का संगठन इस क्षेत्र में बिल्कुल नया है और उसके पास वर्षों पुराना यह जमीनी ढांचा मौजूद नहीं है.

3. एनडीए (NDA) की एकजुटता और सत्ता का फायदा

नीरज कुमार सिन्हा सिर्फ भाजपा के ही नहीं, बल्कि पूरे एनडीए के प्रत्याशी हैं. आने वाले दिनों में उनके पक्ष में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के अलावा जेडीयू (JDU), लोजपा (LJP), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के बड़े नेता भी चुनाव प्रचार करते नजर आएंगे. ऐसे में एनडीए के सहयोगी दलों (जैसे दलित, महादलित और अति पिछड़ा वर्ग) के वोटों की गोलबंदी भी भाजपा के पक्ष में होने की पूरी उम्मीद है. साथ ही, मौजूदा सरकार की योजनाओं का लाभ भी सत्ता पक्ष को मिल सकता है. जबकि प्रशांत किशोर अकेले अपने चेहरे के दम पर यह लड़ाई लड़ रहे हैं.

4. स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा

बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा भले ही कोई बहुत बड़ा या राष्ट्रीय स्तर का चर्चित चेहरा न हों, लेकिन वह बांकीपुर के ही स्थानीय निवासी हैं. जब वह क्षेत्र में वोट मांगने निकलेंगे, तो एक लोकल 'बेटे' के तौर पर कनेक्ट कर पाएंगे. इसके विपरीत, प्रशांत किशोर की अपनी एक बड़ी पहचान और इमेज जरूर है, लेकिन वह बांकीपुर या पटना के स्थानीय निवासी नहीं हैं. विधानसभा जैसे छोटे चुनावों में मोहल्ले-मोहल्ले की नेटवर्किंग और लोकल होना बहुत बड़ा फैक्टर साबित होता है.

प्रशांत किशोर की रणनीति

इन तमाम चुनौतियों को प्रशांत किशोर भी बखूबी समझते हैं. यही वजह है कि वह एक अलग पिच पर बैटिंग कर रहे हैं. वह जनता के बीच जाकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि वह इस क्षेत्र के लिए नए हैं और उनका संगठन अभी उतना मजबूत नहीं है. वह जनता से 'एक मौका' देने की भावुक अपील कर रहे हैं. पीके इस उपचुनाव को बिहार सरकार और मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ एक 'जनमत संग्रह' के रूप में पेश कर रहे हैं कि जनता मौजूदा सरकार के कामकाज से खुश है या नहीं.

हालांकि, इस चुनाव में भाजपा के सामने भी कुछ मुश्किलें रही हैं, जैसे आखिरी वक्त में प्रत्याशी बदलना और नीरज सिन्हा के बायोडाटा को लेकर उठा विवाद. लेकिन इसके बावजूद संगठन, इतिहास और स्थानीय समीकरणों के मामले में फिलहाल भाजपा का पलड़ा भारी नजर आ रहा है. अब देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या प्रशांत किशोर अपनी रणनीतियों से बीजेपी के इस अभेद किले को ढहा पाते हैं, या बांकीपुर का यह गढ़ भगवा रंग में ही रंगा रहता है.