Bankipur ByElection: बोचहां से बांकीपुर तक...सवर्ण वोटरों की नाराजगी ने BJP का खेल बिगाड़ा?

ऋचा शर्मा

• 07:08 PM • 04 Aug 2026

बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत के बाद 2022 के बोचहां उपचुनाव की चर्चा फिर तेज हो गई है. राजनीतिक विश्लेषक दोनों चुनावों के बीच सवर्ण वोटरों की नाराजगी और तीसरे विकल्प की भूमिका जैसी कई समानताओं की बात कर रहे हैं.

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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत ने बिहार की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. बीजेपी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर में मिली इस हार को सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है.राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि बांकीपुर का चुनाव काफी हद तक 2022 के बोचहां विधानसभा उपचुनाव की याद दिलाता है. दोनों चुनावों में सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी और तीसरे राजनीतिक विकल्प की भूमिका को लेकर चर्चा तेज है.

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पहले समझिए बोचहां में क्या हुआ था ?

साल 2022 में मुजफ्फरपुर की बोचहां विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था. एनडीए की ओर से बेबी कुमारी उम्मीदवार थीं, जबकि महागठबंधन ने अमर पासवान को मैदान में उतारा था. चुनाव परिणाम में अमर पासवान ने बड़ी जीत दर्ज की थी, जिसे उस समय बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना गया था.राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उस चुनाव में सवर्ण समाज के एक वर्ग की नाराजगी और स्थानीय राजनीतिक विवादों ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया था.

बांकीपुर में क्या बदला?

बांकीपुर लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, इस बार भी चुनाव से पहले कुछ मुद्दों को लेकर असंतोष की चर्चा रही. विश्लेषकों का कहना है कि परंपरागत वोट बैंक के एक हिस्से में नाराजगी की बातें सामने आईं.हालांकि इन दावों को लेकर कोई आधिकारिक चुनावी अध्ययन उपलब्ध नहीं है और अलग-अलग राजनीतिक दल इसकी अलग-अलग व्याख्या करते हैं.

क्या तीसरा विकल्प बना गेम चेंजर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार सबसे बड़ा अंतर प्रशांत किशोर की मौजूदगी रही. जन सुराज ने उन मतदाताओं को एक नया विकल्प दिया जो न तो एनडीए के साथ जाना चाहते थे और न ही महागठबंधन के साथ.इसी वजह से कई विश्लेषक मानते हैं कि चुनावी मुकाबला पारंपरिक दोध्रुवीय राजनीति से आगे निकलकर त्रिकोणीय हो गया.

क्या BJP ने वोट बैंक को हल्के में लिया?

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी को अपने परंपरागत समर्थन आधार पर भरोसा था. लेकिन यदि किसी वर्ग में असंतोष था, तो इस बार उसे एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच भी मिल गया.हालांकि बीजेपी ने अभी तक आधिकारिक रूप से हार के कारणों पर अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया है. पार्टी संगठन स्तर पर चुनाव परिणाम की समीक्षा कर रहा है.

बोचहां और बांकीपुर में दिखीं ये समानताएं

  • दोनों उपचुनावों में बीजेपी को मजबूत दावेदार माना जा रहा था.
  • दोनों चुनावों में सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी.
  • दोनों जगह विपक्ष या वैकल्पिक राजनीतिक ताकतों ने असंतोष को अपने पक्ष में साधने की कोशिश की.
  • दोनों परिणामों ने यह संकेत दिया कि परंपरागत वोट बैंक को स्थायी मानना किसी भी दल के लिए चुनौती बन सकता है.

क्या बिहार की राजनीति बदल रही है?

बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम सिर्फ एक सीट का नतीजा नहीं माना जा रहा. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि आने वाले समय में सामाजिक समीकरण और नए राजनीतिक विकल्प इसी तरह प्रभावी बने रहते हैं, तो बिहार की चुनावी राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं.
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी चुनावी परिणाम के पीछे उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, संगठन, प्रचार, मतदान प्रतिशत और क्षेत्रीय परिस्थितियां जैसे कई कारक मिलकर काम करते हैं. इसलिए किसी एक कारण को हार या जीत का एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता.