बिहार की चर्चित बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है. वर्ष 1995 से लगातार भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गढ़ रही इस सीट पर जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा खाली की गई इस सीट पर मिली हार को एनडीए (NDA) और खासतौर पर बीजेपी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत पर अपनी राय व्यक्त की है. उनका मानना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में खाता न खोल पाने के बाद, बांकीपुर की यह जीत प्रशांत किशोर के राजनीतिक करियर के लिए महज एक संयोग नहीं, बल्कि एक बड़ा 'रीवाइवल' (राजनीतिक पुनर्जन्म) है।
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30 साल पुराना बीजेपी का किला ध्वस्त
राजदीप सरदेसाई के मुताबिक उपचुनाव में आमतौर पर सत्ताधारी दल का पलड़ा भारी रहता है. आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 30 सालों में 80 फीसदी से ज्यादा उपचुनाव वही पार्टी जीतती है जिसकी सरकार होती है. इसके बावजूद, बांकीपुर में बीजेपी का पराजित होना बेहद चौंकाने वाला है. 2025 के चुनाव में जो सीट बीजेपी नेता ने 58,000 से अधिक वोटों से जीती थी, वहां पार्टी का हार जाना और नितिन नवीन के खुद के वार्ड में पिछड़ जाना बीजेपी के लिए बेहद चिंताजनक है.
सम्राट चौधरी सरकार पर 'रेफरेंडम' का दावा
राजदीप सरदेसाई कहते हैं कि प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और राज्य की एनडीए सरकार के कामकाज पर 'जनमत संग्रह' करार दिया है. सात महीने पुरानी सरकार के खिलाफ उपजे असंतोष, युवाओं के विरोध प्रदर्शन और नीतीश कुमार के पद छोड़ने के बाद पैदा हुए नए राजनीतिक समीकरणों का सीधा फायदा जन सुराज को मिला है. जेडीयू और बीजेपी के भीतर वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार किए जाने से उपजा असंतोष भी इस हार की बड़ी वजहों में से एक माना जा रहा है.
आरजेडी का सफाया, खिसका पारंपरिक 'MY समीकरण'
बांकीपुर के नतीजों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि प्रशांत किशोर ने केवल बीजेपी का वोट बैंक ही नहीं सेंधा, बल्कि विपक्ष के रूप में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को काफी पीछे छोड़ दिया. मुस्लिम और यादव (MY) समीकरण का एक बड़ा हिस्सा आरजेडी से छिटककर प्रशांत किशोर की तरफ शिफ्ट हुआ है. यानी जो वोट सरकार विरोधी (Anti-Incumbency) था, वह आरजेडी के बजाय सीधे प्रशांत किशोर के खाते में गया.
बीजेपी के कोर वोट बैंक में सेंधमारी
राजदीप सरदेसाई के मुताबिक प्रशांत किशोर की इस जीत का फॉर्मूला दोनों तरफ से वोट हासिल करना रहा. उन्होंने एक तरफ जहां आरजेडी के पारंपरिक वोट काटे, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के कोर वोटर समझे जाने वाले कायस्थ और सवर्ण समाज के वोटों में भी बड़ी सेंध लगाई. बिना दोनों तरफ के मतदाताओं के समर्थन के बीजेपी के इस गढ़ में इतनी बड़ी जीत हासिल करना मुमकिन नहीं था.
छात्र आंदोलन और 'Gen Z' का बड़ा संदेश
वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक यह चुनाव हाल ही में हुए देशव्यापी और पटना में हुए छात्र आंदोलनों के बाद का पहला प्रमुख चुनाव था. 18 से 25 साल के युवाओं (Gen Z) ने इस चुनाव के जरिए राजनीतिक दलों को साफ संदेश दिया है कि "हमारे वोट को गारंटीड मत मानिए". जनता ने साफ कर दिया है कि अगर उन्हें कोई मजबूत और नया विकल्प मिलेगा, तो वे पुरानी निष्ठाओं को छोड़कर नए विकल्प को मौका देने से नहीं हिचकिचाएंगे. प्रशांत किशोर इस वक्त बिहार में इसी 'एजेंट ऑफ चेंज' (बदलाव के प्रतीक) के रूप में उभरे हैं.
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