बेगूसराय: साल 2021 में कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की वार्डन रिंकू कुमारी की मौत को जिस बेगूसराय पुलिस ने जल्दबाजी में 'आत्महत्या' मानकर फाइल बंद कर दी थी, वह असल में एक सोची-समझी साजिश और बेदर्दी से अंजाम दी गई हत्या निकली।
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पटना हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद मगध रेंज के आईजी विकास वैभव के नेतृत्व में गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने इस सनसनीखेज मामले का पर्दाफाश कर दिया है। 15 लाख रुपये के लेन-देन के विवाद में वार्डन की गला दबाकर हत्या की गई थी और फिर साक्ष्य छुपाने के लिए शव को फंदे से लटका दिया गया था। पुलिस ने इस मामले में मृतका के पड़ोसी कौशल कुमार और स्कूल के गार्ड (केयरटेकर) अजीत कुमार बबलू को गिरफ्तार कर लिया है।
15 लाख रुपये का लेन-देन बना हत्या की वजह
आईजी विकास वैभव द्वारा बेगूसराय एसपी कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयानों और मृतका की बेटियों के अनुसार, रिंकू कुमारी ने अपने पड़ोसी कौशल कुमार को जमीन खरीदने के लिए 15 लाख रुपये दिए थे। कौशल न तो जमीन दे रहा था और न ही पैसे लौटा रहा था।
4 अप्रैल 2021 को कौशल ने पैसे लौटाने की बात कहकर रिंकू कुमारी को बुलाया था। आरोप है कि उसी दिन कौशल ने कस्तूरबा विद्यालय के गार्ड अजीत कुमार बबलू के साथ मिलकर स्कूल परिसर में ही रिंकू कुमारी की गला दबाकर हत्या कर दी। इसके बाद वारदात को सुसाइड का रूप देने के लिए शव को फंदे से लटका दिया। घटना के वक्त स्कूल के सीसीटीवी कैमरे भी बंद पाए गए थे।
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद गठित हुई थी SIT
शुरुआती जांच में स्थानीय पुलिस और जांच अधिकारी (IO) ने मामले में घोर लापरवाही बरती थी। फॉरेंसिक टीम द्वारा शव लटकाए जाने (Hanging post-murder) के ओपिनियन को नजरअंदाज कर पुलिस ने जल्दबाजी में इसे आत्महत्या बताकर केस बंद कर दिया था।
अपनी मां को न्याय दिलाने के लिए मृतका की बेटियां—तेजस्विनी और चेतना—पिछले 5 सालों से लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रही थीं। जब निचली अदालत से न्याय नहीं मिला, तो उन्होंने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने पुलिस अनुसंधान में कई गंभीर खामियां पाईं और अप्रैल 2026 में आईजी विकास वैभव को नए सिरे से टीम बनाकर जांच करने का सख्त आदेश दिया।
फॉरेंसिक और डॉक्टरों की रिपोर्ट ने खोला राज
आईजी विकास वैभव के निर्देशन में बनी SIT (जिसमें बेगूसराय के डीआईजी शैलेश कुमार सिंह, तीन DSP और दो इंस्पेक्टर शामिल थे) ने 13 जुलाई से जब नए सिरे से जांच शुरू की, तो परतें खुलती चली गईं।
जांच टीम ने फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों और मेडिकल बोर्ड से दोबारा राय ली। इसके साथ ही चश्मदीदों के बयान और घटना के समय अभियुक्तों के स्कूल में आने-जाने के साक्ष्य जुटाए गए। जब सभी सबूतों का मिलान किया गया, तो स्पष्ट हो गया कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या थी।
लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों पर भी जांच
प्रेस वार्ता के दौरान आईजी विकास वैभव ने स्पष्ट किया कि मामले की शुरुआती जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों (IO) की भूमिका बेहद संदिग्ध रही है। उन्होंने कहा कि साक्ष्यों को नजरअंदाज करने के पीछे तत्कालीन जांच अधिकारी की क्या मंशा थी, इसकी भी गहन जांच की जा रही है और लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई तय है।
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