बिहार में बैंकों द्वारा स्थानीय लोगों को लोन देने में आनाकानी करने का मामला अब एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक मुद्दा बन चुका है. राज्य स्तरीय बैंक समिति (SLBC) की हालिया बैठक में सामने आए आंकड़ों के बाद बिहार सरकार ने बैंकों के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है. सरकार का साफ मानना है कि बिहार के लोगों द्वारा बैंकों में जमा की गई गाढ़ी कमाई का इस्तेमाल राज्य के विकास, यहां के किसानों, युवाओं और छोटे व्यापारियों के लिए होना चाहिए, न कि दूसरे राज्यों के उद्योगों को मालामाल करने के लिए. इस मुद्दे पर सरकार ने बैंकों को सीधे तौर पर चेताया है कि यदि उनके रवैये में सुधार नहीं हुआ तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
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क्या है पूरा मामला और क्या कहते हैं आंकड़े
बीते 23 जून को पटना में राज्य स्तरीय बैंकर समिति (SLBC) की बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें बिहार का नया क्रेडिट डिपॉजिट (सीडी) रेशियो जारी किया गया. इस रिपोर्ट के अनुसार, बिहार का वर्तमान सीडी रेशियो 60.21 प्रतिशत दर्ज किया गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि बिहार के लोग बैंकों में जो भी 100 रुपए जमा करते हैं, उसमें से केवल 60.21 रुपए ही बिहार के लोगों को लोन के रूप में वापस मिल पा रहे हैं.
बाकी का करीब 40 प्रतिशत पैसा बैंकिंग व्यवस्था के जरिए दूसरे राज्यों में भेजकर वहां के उद्योगों और विकास कार्यों में इस्तेमाल किया जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि 31 मार्च 2026 तक बिहार के बैंकों में कुल जमा राशि 6,15,428 करोड़ रुपये थी, लेकिन इसके मुकाबले लोन के रूप में सिर्फ 3,70,563 करोड़ रुपये ही बांटे गए, जिससे करीब 2.45 लाख करोड़ रुपये बिहार से बाहर चले गए.
सीएम की बैंकों को सख्त हिदायत
इस निराशाजनक रिपोर्ट के सामने आने के बाद बिहार के सीएम सम्राट चौधरी ने राज्य स्तरीय बैंकर समिति की बैठक में बैंकों को अंतिम चेतावनी दे दी है. सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि बैंकों को बिहार में कर्ज देने की अपनी स्थिति सुधारने के लिए अगले 6 महीने का समय दिया जा रहा है.
अगर इस तय समय सीमा में बैंकों ने अपना प्रदर्शन नहीं सुधारा, तो राज्य सरकार ऐसे बैंकों से अपनी तमाम जमा राशि (सरकारी फंड) वापस निकाल लेगी. इसके साथ ही सरकार ने यह भी नीति बनाई है कि जिन बैंकों का सीडी रेशियो 50 प्रतिशत से कम होगा, वहां सरकार भविष्य में अपना कोई भी पैसा जमा नहीं करेगी. इस कदम के जरिए सरकार बैंकों पर सीधा आर्थिक दबाव बना रही है.
आखिर दूसरे राज्यों में क्यों चला जाता है बिहार का पैसा
तकनीकी दृष्टिकोण से देखा जाए तो बैंक किसी राज्य का पैसा अलग से किसी तिजोरी में बंद करके नहीं रखते हैं. देश भर के बैंकों में जमा होने वाला पैसा बैंकिंग सिस्टम के एक बड़े फंड पूल का हिस्सा बन जाता है. बैंकिंग नियम के अनुसार, पैसा स्वतः ही उन क्षेत्रों की तरफ खिंचा चला जाता है जहां लोन की मांग सबसे अधिक होती है.
तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में बड़े-बड़े उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग हब, आईटी कंपनियां और हजारों करोड़ रुपये के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स काम कर रहे हैं, जिससे वहां लोन की भारी मांग रहती है और इसी वजह से इन राज्यों का सीडी रेशियो 100 प्रतिशत से भी ऊपर रहता है. इसके विपरीत, बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में लोग बैंकों में पैसा जमा तो खूब करते हैं, लेकिन वहां बड़े उद्योगों की कमी के कारण लोन की मांग उतनी नहीं हो पाती, जिसके चलते बैंक इस अतिरिक्त पैसे को दूसरे विकसित राज्यों में भेज देते हैं.
लोन न देने के पीछे क्या है बैंकों की मजबूरी
इस पूरे मामले में बैंकों का भी अपना पक्ष और कुछ मजबूरियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. बिहार में बैंकों द्वारा ज्यादा लोन न देने की सबसे बड़ी वजह एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) यानी खराब लोन का होना है. राज्य में कृषि और एमएसएमई (MSME) सेक्टर में लोन डूबने की दर राष्ट्रीय औसत से कई गुना ज्यादा है, जिससे बैंकों में हमेशा यह डर बना रहता है कि दिया गया पैसा वापस नहीं आएगा.
इसके अलावा बिहार में जमीन के मालिकाना हक से जुड़े विवाद, म्यूटेशन (दाखिल- खारिज) की समस्याएं और साफ-सुथरे दस्तावेजों की कमी एक बहुत बड़ा रोड़ा हैं. उचित कागजात, आईटीआर (ITR), बैलेंस शीट और पुख्ता क्रेडिट हिस्ट्री न होने के कारण भी बैंक चाहकर भी लोगों के लोन पास नहीं कर पाते हैं.
विशेषज्ञों की राय और आगे की राह
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सोचे-समझे सिर्फ दबाव में आकर लोन बांट देने से राज्य का विकास नहीं हो सकता है, बल्कि इससे एनपीए बढ़ने का खतरा और ज्यादा हो जाएगा, जिसका नुकसान अंततः बैंकों और आम जमाकर्ताओं को ही भुगतना पड़ेगा. केवल सीडी रेशियो बढ़ाना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान नहीं है.
बिहार में बड़े पैमाने पर विकास और निवेश लाने के लिए राज्य सरकार को उद्योगों के अनुकूल माहौल तैयार करना होगा, जमीन से जुड़े नियमों में सुधार करना होगा और लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाना होगा. जब राज्य में मजबूत प्रोजेक्ट्स और लोन चुकाने की क्षमता वाले उद्यमी होंगे, तो बैंक भी बिना किसी डर के और पूरे भरोसे के साथ बिहार में निवेश करने और लोन देने के लिए खुद आगे आएंगे.
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