बिहार की सियासत में इन दिनों दो बातों की चर्चाएं काफी तेज है, पहली नीतीश कुमार की विदाई और दूसरी पिछले 10 सालों से राज्य में बंद शराबबंदी का अब क्या होगा. जानकारों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि जैसे ही राज्य में सत्ता परिवर्तन होता है और भाजपा पार्टी की नई सरकार बनती है तो शराबबंदी का खत्म होना लगभग तय है. हालांकि यह प्रक्रिया अचानक से नहीं होगी और इसे चरण बद्ध तरीके से करना होगा. वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय ने बिहार तक से खास बातचीत में पूरी बात को अच्छी तरह समझाया है और बताया है कि शराबबंदी क्यों हट सकती है और कब तक हट सकती है.
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कब तक होगी शराबबंदी की विदाई?
वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय ने शराबबंदी की विदाई को लेकर कहा है कि, जब अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू हुई थी तब भी समय लगा था. करीब 100 साल पुराना कानून हटाने के लिए कई सख्त नियम-कानून बनाए गए थे और राज्य में शराब का नाम लेना भी अपराध सा हो गया था. ऐसे में अगर नीतीश कुमार की विदाई के बाद जो सरकार आएगी वह शराबबंदी तो हटाने के लिए उन्हें भी समय लगेगा. अरुण पांडेय ने आगे कहा है कि सरकार को इस प्रक्रिया को पूरी करने के लिए 3 महीने का समय चाहिए होगा और तब जाकर जुलाई महीने से शराबबंदी हट सकती है.
राजस्व को हो रहा बड़ा नुकसान
शराबबंदी हटाने के पीछे सबसे बड़ा तर्क राज्य का गहराता वित्तीय संकट बताया जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय ने बातचीत में कहा कि, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी बताया कि शराबबंदी के कारण बिहार सरकार को सालाना करीब 30,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है. इसके बावजूद राज्य में बड़े पैमाने पर अवैध शराब की खेप पकड़ी जा रही है और होम डिलीवरी का धंधा फल-फूल रहा है. ऐसे में नई सरकार इस घाटे की भरपाई के लिए शराबबंदी की समीक्षा कर इसे समाप्त करने का कड़ा राजनैतिक निर्णय ले सकती है.
कानून की विफलता और अदालतों पर बोझ
10 साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो बिहार में शराबबंदी कानून को धत्ता बताने वालों की कमी नहीं रही है. इस दौरान 4 करोड़ लीटर से अधिक शराब जब्त की गई, 12 लाख से ज्यादा केस दर्ज हुए और लगभग 15 लाख गिरफ्तारियां हुईं. इतनी बड़ी संख्या में मुकदमों के कारण निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पर बोझ बढ़ गया है। हैरानी की बात यह है कि इतने केस होने के बावजूद सजा की दर महज 1 से 2 प्रतिशत ही रही है. जानकारों का कहना है कि यह कानून माफियाओं को जन्म दे रहा है, जिससे निपटने के लिए नई व्यवस्था जरूरी हो गई है.
क्या भाजपा के लिए आसान होगा शराबबंदी हटाना?
इस सवाल के जवाब में अरुण पांडेय कहते है कि, यह राजनैतिक डिसीजन होगा और इसमें जदयू भी शामिल होगी. उन्होंने आगे कहा कि, एनडीए के घटक दल जीतन राम मांझी की पार्टी हम, शुरू से ही इस कानून का विरोध करती रही है. मांझी का तर्क है कि इस कानून से सबसे ज्यादा गरीब तबका प्रभावित हो रहा है. इसलिए नई सरकार को 3 महीने का समय लगेगा ताकि शराबबंदी को पूरी तरह से खत्म किया जा सकें.
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