बिहार की सियासत में इन दिनों 'कसमें, वादे, प्यार, वफा' जैसे फिल्मी बोल पूरी तरह चरितार्थ होते नजर आ रहे हैं. राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और भारतीय जनता पार्टी के बीच विधान परिषद (MLC) सीट को लेकर हुआ समझौता अब विवादों के घेरे में आ गया है. उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को MLC नहीं बनाया गया है, जिसके बाद बिहार के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या बीजेपी अपने पुराने वादे से मुकर गई है. इस नए घटनाक्रम के बाद अब दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर भी तलवार लटकती हुई दिखाई दे रही है. सवाल यह भी उठ रहा है कि अब आगे उपेंद्र कुशवाहा कौन सा दांव चलेंगे. आइए विस्तार से जानते है पूरी कहानी.
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दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर क्यों मंडराया खतरा
नियमों के मुताबिक, किसी भी गैर-सदस्य को मंत्री पद पर बने रहने के लिए शपथ लेने के 6 महीने के भीतर राज्य विधानमंडल के किसी न किसी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य बनना अनिवार्य होता है. दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार सरकार में मंत्री बने हुए हैं, लेकिन सदन की सदस्यता न मिलने के कारण अब उनके भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं.
हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के प्रवक्ताओं और नेताओं का दावा है कि चिंता करने की कोई बात नहीं है और दीपक प्रकाश अपने पद पर बने रहेंगे. पार्टी सूत्रों का कहना है कि बीजेपी और उनके बीच कोई न कोई बीच का रास्ता जरूर निकाल लिया जाएगा, लेकिन धरातल पर अभी तक ऐसा कोई रास्ता बनता दिखाई नहीं दे रहा है.
सोशल मीडिया पर वायरल पत्र और ट्वीट ने बढ़ाई रार
इस पूरे विवाद के बीच सोशल मीडिया पर कुछ पुराने दस्तावेज, लेटर्स और ट्वीट्स तेजी से वायरल हो रहे हैं. इसमें बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल के समय का एक पत्र शामिल है, जिसमें उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के लिए छह विधायक और एक विधान परिषद (MLC) की सीट का स्पष्ट जिक्र है.
इसके अलावा बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का भी एक पुराना ट्वीट वायरल हो रहा है, जिसमें एक राज्यसभा और एक एमएलसी सीट की बात कही गई थी. इन वायरल दस्तावेजों को हथियार बनाकर अब उपेंद्र कुशवाहा के समर्थक और आम लोग बीजेपी को उसके वादे की याद दिला रहे हैं.
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने केंद्रीय नेतृत्व पर डाला पाला
जब इस पूरे विवाद और वायरल पत्र को लेकर बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने साफ तौर पर इस मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया. जायसवाल ने स्वीकार किया कि विधानसभा चुनाव के सीट बंटवारे के समय केंद्रीय नेतृत्व द्वारा कुछ बातें तय हुई थीं और उसी शर्त के तहत विधायक और विधान पार्षद की चर्चा की गई थी.
हालांकि, उन्होंने नया मोड़ देते हुए कहा कि इस बीच उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेज दिया गया, जिससे राजनीति में एक अलग तरह का घटनाक्रम शुरू हो गया. जायसवाल ने कहा कि चूंकि अब वह खुद प्रदेश अध्यक्ष के पद पर नहीं हैं, इसलिए इस विषय पर आगे क्या बातचीत हुई, इसकी जानकारी केवल बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व ही दे सकता है.
क्या राज्यसभा सीट के बदले खत्म हो गई एमएलसी की डील
बिहार के राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजने के बाद बीजेपी ने एमएलसी वाली डील को खत्म मान लिया है. दिलीप जायसवाल के बयानों से भी यह संकेत मिलता है कि कुशवाहा के राज्यसभा जाने के बाद स्थितियां बदल गईं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा के पास अब बीजेपी के सामने कोई दूसरा विकल्प बचा है? चर्चाएं यह भी हैं कि क्या दीपक प्रकाश अपने 6 महीने का कार्यकाल पूरा होने तक मंत्री बने रहेंगे या फिर उन्हें बीच में ही इस्तीफा देना पड़ेगा.
तरकश से कौन सा तीर निकालेंगे उपेंद्र कुशवाहा
उपेंद्र कुशवाहा को बिहार की राजनीति में एक बेहद चतुर खिलाड़ी और 'हार्ड बार्गेनर'(कड़ी सौदेबाजी करने वाला नेता) माना जाता है. राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी चल रही है कि बीजेपी उपेंद्र कुशवाहा को संतुष्ट करने के लिए उन्हें केंद्र की मोदी कैबिनेट में मंत्री पद का नया फॉर्मूला दे सकती है. लेकिन सबसे बड़ा सस्पेंस इस बात को लेकर है कि क्या दीपक प्रकाश का बिहार में मंत्री पद सुरक्षित रह पाएगा या बीजेपी यहां कोई बड़ा खेल कर जाएगी. अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को बचाने के लिए उपेंद्र कुशवाहा अपने तरकश से कौन सा तीर निकालते हैं.
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