बिहार के शिक्षा विभाग ने राज्य के करीब 1.10 लाख शिक्षकों से जुड़ा एक ऐसा नियम लागू किया है, जिसने पूरे शिक्षक समुदाय में हलचल मचा दी है. यह नियम अंतर-जिला स्थानांतरण यानी एक जिले से दूसरे जिले में ट्रांसफर लेने वाले शिक्षकों की सेवा वरिष्ठता से जुड़ा हुआ है. नए प्रावधान के अनुसार, जैसे ही कोई शिक्षक अपना जिला कैडर बदलता है, उसकी पुरानी सेवा वरिष्ठता समाप्त मानी जाएगी. नए जिले में उसकी नियुक्ति को पूरी तरह से एक नई नियुक्ति के तौर पर दर्ज किया जाएगा.
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दस से पंद्रह साल का अनुभव भी बेअसर
इस नियम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि दस से पंद्रह साल तक की सेवा दे चुके शिक्षक भी नए जिले में जाकर उन शिक्षकों से जूनियर हो सकते हैं, जिन्होंने अभी हाल ही में नौकरी ज्वाइन की है. यानी अनुभव के मामले में भले ही कोई शिक्षक कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो, जिला बदलते ही वह प्रशासनिक रूप से नया कर्मचारी माना जाएगा. यह प्रावधान उन हजारों शिक्षकों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया है, जो पारिवारिक कारणों से घर के करीब पोस्टिंग चाहते हैं.
सर्विस बुक और प्रमोशन पर सीधा असर
इस फैसले का सबसे गहरा असर शिक्षकों की सर्विस बुक, वरिष्ठता सूची और प्रमोशन प्रक्रिया पर पड़ने वाला है. दूसरे जिले में स्थानांतरण के बाद शिक्षक की नई जिले में पहली नियुक्ति के रूप में गणना की जाएगी. सर्विस बुक में भी नई ज्वाइनिंग की तारीख दर्ज होगी. इसका मतलब यह हुआ कि पुराने जिले में अर्जित की गई वरिष्ठता का लाभ नए कैडर में शिक्षकों को नहीं मिल पाएगा.
करियर की रफ्तार पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा. वर्षों की सेवा देने के बावजूद अगर किसी शिक्षक को नए जिले में जूनियर मान लिया जाता है, तो प्रधानाध्यापक और उच्च वेतनमान वाले पदों पर प्रमोशन पाने के लिए उसे लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. अनुमान के मुताबिक, कुछ शिक्षकों के प्रमोशन की प्रक्रिया दस से पंद्रह साल तक पीछे खिसक सकती है.
प्रभारी प्रधानाध्यापक के पद पर भी संकट
इस नियम से जुड़ा एक और बड़ा सवाल स्कूलों में मिलने वाले प्रशासनिक प्रभार को लेकर उठ रहा है. जो शिक्षक वरिष्ठता के आधार पर प्रभारी प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, वे जिला बदलने के बाद इस जिम्मेदारी के दायरे से बाहर हो सकते हैं. जिस स्कूल में वर्षों का अनुभव उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, नए जिले में वही अनुभव वरिष्ठता सूची में उन्हें ऊपर रखने के लिए पर्याप्त नहीं होगा.
शिक्षा विभाग का तर्क क्या है ?
नियम के पीछे शिक्षा विभाग ने भी अपना तर्क रखा है. विभाग का कहना है कि अगर दूसरे जिले से आने वाले अनुभवी शिक्षकों को तुरंत वरिष्ठता का लाभ दे दिया जाए, तो इससे उस जिले में वर्षों से कार्यरत स्थानीय शिक्षकों का अधिकार प्रभावित होगा. ऐसी स्थिति में स्थानीय शिक्षकों के प्रमोशन की बारी पीछे जा सकती है. इसी वजह से विभाग जिला कैडर में वरिष्ठता को स्थानीय सेवा अवधि से जोड़ने की व्यवस्था पर जोर दे रहा है.
जूनियर के अधीन काम करने की स्थिति
शिक्षकों के लिए असली परेशानी यहीं समाप्त नहीं होती है. जिला कैडर बदलते ही एक ऐसी स्थिति भी बन सकती है, जिसमें पंद्रह साल पुराना अनुभवी शिक्षक अपने से कम अनुभव रखने वाले शिक्षक के अधीन काम करने के लिए मजबूर हो जाए. यानी सेवा का अनुभव भले ही ज्यादा हो, लेकिन नए कैडर के पदानुक्रम में उसका स्थान नीचे ही रहेगा.
पांच साल की लॉक-इन अवधि भी लागू
ट्रांसफर लेने वाले शिक्षकों के सामने एक और बड़ी चुनौती लॉक-इन अवधि के रूप में सामने आएगी. जानकारी के मुताबिक, एक बार जिला बदलने के बाद अगले पांच साल तक शिक्षकों को दोबारा ट्रांसफर का मौका नहीं मिलेगा. इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कोई शिक्षक वर्ष 2026 में ट्रांसफर लेता है, तो वह लगभग वर्ष 2031 तक नए कैडर में ही बंधा रहेगा.
बिहार के शिक्षकों के लिए अब ट्रांसफर का फैसला केवल घर-परिवार से जुड़ा एक साधारण विकल्प नहीं रह गया है. घर के करीब पहुंचने की सुविधा के साथ-साथ उन्हें सीनियारिटी, प्रमोशन, प्रशासनिक जिम्मेदारी और पांच साल की लॉक-इन अवधि का पूरा हिसाब-किताब भी लगाना होगा. अगर घर के करीब पहुंचने की कीमत वर्षों की नौकरी की वरिष्ठता खोना है, तो यह फैसला हजारों शिक्षकों के लिए इतना आसान साबित नहीं होगा.
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