बिहार में छात्र आंदोलन के बीच छह साल का एक बच्चा इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है. नाम है आदित्य. पिछले करीब 24 घंटे से आदित्य धरना स्थल पर बैठा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की मांग कर रहा है. उसका कहना है कि उसके माता-पिता के साथ भेदभाव हुआ और कथित तौर पर पुलिस ने उनके साथ मारपीट की. आदित्य का दावा है कि 25 तारीख को उसके माता-पिता को कोतवाली थाना ले जाया गया, जहां उनके साथ मारपीट की गई. बच्चे ने आरोप लगाया कि इस दौरान एसपी और एक आईपीएस अधिकारी की ओर से धमकी भी दी गई. उसके मुताबिक, उन्हें चेतावनी दी गई कि दोबारा वहां जाने पर उन्हें मारा जाएगा और माता-पिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी.
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पढ़ने की उम्र है, धरने पर क्यों?
आदित्य का कहना है कि इस मामले में उसके परिवार ने डीजीपी से मुलाकात की है और वहां से न्याय की जांच का आश्वासन भी मिला है. हालांकि, वह डीजीपी के आश्वासन से संतुष्ट नहीं है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर संबंधित पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर रहा है. धरना स्थल पर बातचीत के दौरान आदित्य से उसकी पढ़ाई को लेकर भी सवाल किए गए. उसने बताया कि उसने करीब छह महीने तक स्कूल में पढ़ाई की थी, लेकिन बाद में उसका नाम स्कूल से हटा दिया गया. उसके परिवार के मुताबिक, आर्थिक परेशानी के कारण फीस जमा नहीं हो सकी और पढ़ाई रुक गई.
सांसद पप्पू यादव की पहल पर स्कूल में दाखिला
बातचीत में यह भी सामने आया कि आदित्य को पहले सांसद पप्पू यादव की पहल पर स्कूल में दाखिला मिला था. हालांकि, कुछ समय बाद पढ़ाई छूट गई. आदित्य ने बताया कि वह पढ़ना चाहता है और आगे चलकर वकील बनना चाहता है. बिहार तक को इंटरव्यू के दौरान उससे बार-बार पूछा गया कि जब उसकी उम्र पढ़ने और स्कूल जाने की है तो वह धरने पर क्यों बैठा है. जवाब में आदित्य ने कहा कि वह पढ़ना भी चाहता है और अपने माता-पिता के साथ हुई कथित ज्यादती के खिलाफ आवाज भी उठाना चाहता है.
पिता बोले- बच्चे को हमने नहीं बैठाया
आदित्य के पिता रंजीत कुमार से भी सवाल किया गया कि आखिर छह साल के बच्चे को धरने पर क्यों बैठाया गया. इस पर उन्होंने कहा कि बच्चे को उन्होंने जबरदस्ती धरने पर नहीं बैठाया, बल्कि वह खुद जिद करके वहां बैठा है.
क्या बोले अधिवक्ता शिव नंदन भारती?
वहीं, धरना स्थल पर मौजूद अधिवक्ता शिव नंदन भारती ने आदित्य के समर्थन में कहा कि हर नागरिक को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अधिकार है. उनका तर्क था कि आदित्य के माता-पिता के साथ अगर कथित तौर पर ज्यादती हुई है तो उसके खिलाफ आवाज उठाना भी जरूरी है.
शिक्षा और मानसिक विकास को लेकर सवाल?
हालांकि, बातचीत में यह सवाल भी उठा कि छह साल के बच्चे के लिए सबसे जरूरी चीज स्कूल और पढ़ाई है. बच्चे को लगातार राजनीतिक या सामाजिक गतिविधियों में शामिल करने से उसकी पढ़ाई प्रभावित हो सकती है. पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी बच्चे को अपने माता-पिता के साथ हुए कथित अन्याय के खिलाफ धरने पर बैठना चाहिए?
एक तरफ आदित्य अपनी बात बेहद आत्मविश्वास से रखता नजर आता है. वह संविधान, अधिकार और पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर सवाल करता है. दूसरी तरफ उसकी उम्र महज छह साल है और वह पहली कक्षा की उम्र में है. ऐसे में उसकी शिक्षा और मानसिक विकास को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है.
न्याय की मांग और बच्चे का भविष्य, दोनों जरूरी
आदित्य के परिवार की ओर से पुलिस पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस बातचीत के आधार पर नहीं हुई है. परिवार मामले में कार्रवाई की मांग कर रहा है और प्रधानमंत्री से मुलाकात चाहता है. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है- क्या छह साल के बच्चे की आवाज को आंदोलन का माध्यम बनाया जाना चाहिए या उसके लिए सबसे पहले स्कूल और शिक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए?
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