Prashant Kishore: प्रशांत किशोर को क्रेडिट दिया जाता है कि उन्होंने कभी नरेंद्र मोदी के लिए चाय पे चर्चा करवाई और एक दिन चायवाले को देश का प्रधानमंत्री बनवा दिया. 2014 में मोदी की जीत के बाद प्रशांत किशोर देश के हर एक नेता के फेवरेट हो गए. जब प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार, जगन रेड्डी, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे, स्टालिन, ममता बनर्जी, को एक के बाद एक चुनावी जीत दिलाई तो उनकी प्रोफाइल स्टोरीज मीडिया में खूब-सुनी सुनाई गई.
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आज एक बार फिर प्रशांत किशोर की प्रोफाइल लिखी जा रही है. इसमें नया बस ये है कि दूसरों को पीएम, सीएम की कुर्सी पर पहुंचाने वाला ये बैकस्टेज इलेक्शन मास्टर माइंड आज खुद पहली बार फ्रंट स्टेज पर है. बिहार की वीआईपी सीट बांकीपुर में हुए उपचुनाव के नतीजों ने प्रशांत किशोर ने अपने पहले राजनीतिक मित्र बीजेपी को हराकर विधानसभा में प्रवेश हासिल कर लिया. इसलिए चर्चित चेहरा के इस खास एपिसोड में आज जानेंगे प्रशांत किशोर की पूरी कहानी.
प्रशांत किशोर ने भेद दिया BJP का अभेद्य किला!
प्रशांत किशोर ने राजनीति के उस सबसे बड़े मिथक को तोड़ दिया है, जिसे तोड़ना असंभव माना जाता था. पटना की बांकीपुर सीट सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि पिछले 1995 से यानी करीब 30 साल से बीजेपी का वो अभेद्य किला रही है, जहां कोई बीजेपी को हिला नहीं पाया. इसी सीट से 5 बार चुनाव जीतकर नितिन नबीन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. जब इस गढ़ में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपना पहला चुनावी दांव खेला तो टारगेट सीधे निशाने पर लगा. प्रशांत किशोर बीजेपी को एक ऐसी मशीन मानते रहे हैं जिसके पास डेटा और डिटरमिनेशन दोनों है लेकिन जब वे खुद बांकीपुर में उतरे, तो उन्होंने साबित कर दिया कि डेटा और डिटरमिनेशन केवल बीजेपी के पास नहीं है.
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर नई-नई जन सुराज पार्टी बनाकर 238 सीटों पर चुनाव लड़ने उतरे थे लेकिन 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. मजाक उड़ा कि डेटा का डॉक्टर जमीन पर फेल हो गए. पीके ने स्वीकार किया कि खुद चुनाव न लड़ना उनकी सबसे बड़ी भूल थी. उन्होंने अपनी इस गलती का प्रायश्चित करने के लिए किसी सुरक्षित सीट को नहीं चुना, बल्कि सीधे बीजेपी के सबसे मजबूत सवर्ण और शहरी वोट बैंक वाले सन्नाटे में सेंध लगा दी. बांकीपुर का नतीजा साबित करता है कि पीके ने 2025 की 'फर्श' से सीखकर 2026 की 'अर्श' का रास्ता तय कर लिया है.
कांग्रेस ने की पीके की मदद?
बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत उस विपक्ष, उस कांग्रेस और उन राहुल गांधी की भी जीत है जिसे बीजेपी को हारते देखकर कलेजे को ठंडक मिलती है. अकेले प्रशांत किशोर ने वो कर दिखाया जिसे करने में राहुल गांधी सड़क से संसद तक अंतहीन टाइप जद्दोजहद कर रहे हैं. बांकीपुर में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार न देकर भी प्रशांत किशोर की मदद ही की.
जब पीके ने कांग्रेस के सामने रखी थी शर्तें!
राहुल गांधी का चुनाव जीतने का ट्रैक रिकॉर्ड खराब रहा. इसके बावजूद वो 2014 से पीएम बनने के सबसे बड़े दावेदार बने हुए हैं. इसके बावजूद राहुल गांधी देश के अकेले नेता हैं जिन्होंने कभी खुद चुनावी की लड़ाई जीतने के लिए प्रशांत किशोर की कंसल्टेंसी नहीं ली. एक बार सीरियस नोट पर बातचीत शुरू हुई भी हुई थी लेकिन पावर और फ्री-हैंड के टकराव के कारण बातचीत बिना नतीजा खत्म हो गई.
2022 में सोनिया गांधी के घर 10 जनपथ पर हफ्तों चली उन हाई-प्रोफाइल बैठकों का एकमात्र मकसद डूबती हुई कांग्रेस को ऑक्सीजन देना और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए पूरी पार्टी को री-बूट करना था. सुनने में आया कि प्रशांत किशोर ने सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी के सामने 600 पन्नों का एक ऐसा क्रांतिकारी ब्लूप्रिंट रखा था, जिसमें गैर-गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने, प्रियंका गांधी को यूपी का प्रभार सौंपने, कमजोर संगठन को पूरी तरह भंग करने जैसे क्रांतिकारी आइडियाज दिए गए. पार्टी को कॉर्पोरेट स्टाइल में री-डिजाइन करने का प्लान था पीके का, लेकिन बातचीत ऐन वक्त पर आकर इसलिए टूट गई क्योंकि पीके पार्टी में शामिल होकर टिकट बंटवारे, गठबंधन और रणनीतिक फैसलों पर फ्री-हैंड यानी वीटो पावर मांग रहे थे.
क्यों नहीं बनी थी राहुल और प्रशांत की बात?
राहुल गांधी प्रशांत किशोर के आइडियाज पर भरोसा नहीं कर पाए. पीके को सुपर-पावर देने के लिए तैयार नहीं हुए. राहुल पीके को सीधे कांग्रेस अध्यक्ष के अंडर काम करने की बजाय केवल एडवाइजरी कमेटी यानी एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप का हिस्सा बनाना चाहते थे. इसके लिए प्रशांत किशोर तैयार नहीं हुए. बातचीत टूटी लेकिन राहुल की कोशिशें नहीं खत्म नहीं हुई. बिना प्रशांत किशोर के राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा से 2024 के चुनावों में कांग्रेस और अपनी राजनीति पलट दी जिसकी गहरी चोट बीजेपी को लगी.
क्या है 2017 के पीके की अनसक्सेस स्टोरी?
हालांकि ये कहना भी गलत होगा कि कांग्रेस ने कभी प्रशांत किशोर की सर्विस नहीं ली. सच ये है कि पीके ने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए काम किया था. दावा है कि यूपी के लड़के, खाट सभा जैसे बड़े कैंपेन पीके ने ही डिजाइन किए थे. हालांकि यूपी में कांग्रेस की हार पीके के बायो की अकेले अनसक्सेस स्टोरी बनी. 2017 में उन्होंने पंजाब चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए काम किया और वो प्रोजेक्ट सक्सेसफुल रहा था.
प्रशांत ने राहुल को दी थी नसीहत!
राहुल गांधी कभी नहीं बोले लेकिन प्रशांत किशोर राहुल की पॉलिटिक्स पर क्रिटिकल एनालिसिस देते रहे. यहां तक कहा कि राहुल गांधी को राजनीति से कुछ समय का ब्रेक ले लेना चाहिए. प्रशांत किशोर का कहा हुआ है कि जब आप पिछले 10 सालों से एक ही काम बिना किसी बड़ी सफलता के कर रहे हैं, तो ब्रेक लेने में कोई बुराई नहीं है. आपको 5 साल के लिए किसी और को कमान सौंप देनी चाहिए, जैसा सोनिया गांधी ने राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव को मौका देकर किया था. प्रशांत किशोर की राय रही कि दुनिया के अच्छे नेताओं को पता होता है कि उनमें क्या कमी है और वे उसे सुधारते हैं, लेकिन राहुल गांधी को लगता है कि वो सब कुछ जानते हैं. वो न तो खुद कांग्रेस को ठीक से चला पा रहे हैं और न ही किसी और को रास्ता दे रहे हैं.
बीजेपी को लेकर पीके की क्या है राय?
बीजेपी के साथ प्रशांत किशोर भी बड़े बने. लेकिन ये कभी पता नहीं चला कि 2014 के बाद प्रशांत किशोर और बीजेपी कभी एक प्लेटफॉर्म पर साथ क्यों नहीं आए. पीके का मानना है कि बीजेपी की जीत का एक बड़ा कारण यह नहीं है कि वह हर जगह बहुत अच्छी है, बल्कि ये है कि विपक्ष जनता को अपने पाले में लाने में पूरी तरह विफल रहता है. 2024 के लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने कहा था कि नौकरियों और बेरोजगारी जैसे बड़े मुद्दों के बावजूद अगर बीजेपी जीत रही है, तो इसका जिम्मेदार विपक्ष है. विपक्ष वोटर्स को एकजुट करने और उन्हें एक बेहतर विकल्प का भरोसा देने में नाकाम साबित होता है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलता है.
आज बीजेपी को हराकर हीरो बन चुके हैं प्रशांत किशोर लेकिन इन्हीं प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी को बीजेपी की जमीनी ताकत को कम न आंकने की चेतावनी दी. पीके का कहा हुआ है-बीजेपी भारतीय राजनीति के केंद्र में रहने वाली है. चाहे वो चुनाव जीते या हारे. जो पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर 30% से अधिक वोट बैंक सुरक्षित कर लेती है, वह इतनी जल्दी गायब नहीं होती. विपक्षी नेता इस मुगालते में न रहें कि लोग सिर्फ गुस्से में आकर मोदी या बीजेपी को उखाड़ फेंकेंगे, बल्कि बीजेपी से लड़ने के लिए लंबी और वैचारिक लड़ाई लड़नी होगी.
प्रशांत किशोर और I-PAC की शुरुआत!
प्रशांत किशोर (PK) ने भारतीय राजनीति में चुनाव लड़ने के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह बदलते हुए कॉर्पोरेट स्टाइल इंट्रोड्यूस किए. उन्होंने दो बड़ी कंसल्टिंग फर्म बनाए. 2013 में, उन्होंने सबसे पहले CAG यानी सिटिजन्स फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस नाम का एक मीडिया और स्ट्रेटेजी ग्रुप शुरू किया, जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए 'चाय पे चर्चा' और 'थ्रीडी होलोग्राफ रैलियां' डिजाइन की थीं.
2015 में बीजेपी से रास्ते अलग होने के बाद, पीके और उनकी पुरानी टीम ने मिलकर इसका नाम बदलकर I-PAC यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी कर दिया. इस कंसल्टिंग कंपनी ने आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) जैसे देश के प्रीमियम संस्थानों से आए हजारों प्रोफेशनल्स, डेटा साइंटिस्ट्स और ग्राउंड रिसर्चर्स को काम पर रखा. पीके की कंपनी किसी बड़ी एमएनसी (MNC) की तरह काम करती थी, जो बंद कमरों में भाषण लिखने से लेकर घर-घर जाकर डेटा जुटाने, मतदाता प्रोफाइलिंग और डिजिटल वॉर-रूम मैनेजमेंट को संभालती थी. इसी प्रोफेशनल पॉलिटिकल इंजीनियरिंग के दम पर पीके ने नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल जैसी बड़ी ताकतों को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया और इस ब्रांड को भारतीय राजनीति की सबसे महंगी कंसल्टेंसी मशीन बना दिया.
ममता को चुनाव जीताया और फिर छोड़ दिया I-PAC!
2014 से लेकर 2021 तक प्रशांत किशोर ने बहुत नाम कमाया, बहुत यश कमाया. 2021 से प्रशांत किशोर बदलने लगे, जज्बात बदलने लगे. 2021 के चुनाव में लग रहा था कि इस बार बीजेपी ममता बनर्जी से बंगाल छीन लेगी. तब ममता ने मास्टर स्ट्रोक चलते हुए प्रशांत किशोर को हायर किया. पीके ने 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी को जीत दिलाई और बीजेपी का सपना टूट गया.
2021 की ऐतिहासिक जीत को प्रशांत किशोर ने कंसल्टिंग का फेयरवेल बना दिया. चुनाव के तुरंत बाद पॉलिटिकल कंसल्टिंग से संन्यास की घोषणा करते हुए I-PAC को हमेशा के लिए छोड़ दिया. ये कीड़ा जागा कि दूसरों के लिए रणनीतियां बनाकर थक चुके हैं. अब सीधे जनता के बीच रहकर अपनी जमीनी राजनीति करना चाहते हैं. वहीं से प्रशांत किशोर के राजनीतिक करियर की शुरू हुई. उन्होंने होम स्टेट बिहार को अपना बैटल फील्ड बनाया. जन सुराज अभियान की शुरुआत की।
पीके के हटने के बाद, I-PAC का मालिकाना हक और कमान पूरी तरह से उनकी कोर टीम के सहयोगियों के हाथों में आ गई. I-PAC को प्रतीक जैन, ऋषिराज सिंह और विनेश गौतम जैसे सह-संस्थापक और सीनियर डायरेक्टर्स चला रहे हैं, जो पीके के बिना भी वाईएसआरसीपी और टीएमसी जैसी पार्टियों के लिए काम करते हैं.
प्रशांत किशोर का नेटवर्थ!
प्रशांत किशोर ने चुनावी रणनीतिकार और कॉर्पोरेट कंसल्टिंग के जरिए बेहिसाब कमाई की है, जिसका खुलासा उन्होंने खुद अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस बांकीपुर उपचुनाव के चुनावी हलफनामे में किया. प्रशांत किशोर ने खुद माना कि साल 2021 से 2024 के बीच पॉलिटिकल कंसल्टिंग से संन्यास लेने के बाद भी कंसल्टेंसी फीस के रूप में 241 करोड़ मिले. फीस का खुलासा करते हुए उन्होंने बिहार की एक जनसभा में बताया था कि वे किसी भी राज्य में पार्टियों को सलाह देने के लिए 100 करोड़ रुपए से अधिक की फीस चार्ज करते थे. यहां तक कि उन्होंने एक बड़ी कंपनी को महज 2 घंटे की कॉर्पोरेट कंसल्टेंसी देने के लिए 11 करोड़ रुपए लिए थे.
इस विशाल कमाई पर पीके ने 20 करोड़ रुपए का इनकम टैक्स और लगभग 31 करोड़ रुपए का जीएसटी (GST) सरकार को चुकाया था. साथ ही, उन्होंने अपनी इसी कमाई में से 98.75 करोड़ सीधे चेक के जरिए अपने 'जन सुराज' अभियान और पार्टी फंड में दान कर दिए. हलफनामे के मुताबिक, प्रशांत किशोर और उनकी डॉक्टर पत्नी जाह्नवी दास की कुल पारिवारिक संपत्ति करीब 198 करोड़ रुपए है.
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