दीपक प्रकाश के लिए छोड़ी MLC सीट, अब देवेश कुमार को मिला कैबिनेट मंत्री का दर्जा!

ऋचा शर्मा

01 Sep 2026 (अपडेटेड: Sep 1 2026 5:42 PM)

देवेश कुमार को बिहार राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है. इस पद के साथ उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिला है. खास बात यह है कि कुछ समय पहले उन्होंने दीपक प्रकाश के लिए अपनी MLC की कुर्सी से इस्तीफा दिया था. अब उनकी नई नियुक्ति को लेकर बिहार की सियासत में 'कुर्सी, कुर्बानी और सियासी इनाम' की चर्चा तेज हो गई है.

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बिहार की सियासत में एक बार फिर 'कुर्सी, कुर्बानी और इनाम' की चर्चा तेज हो गई है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व MLC देवेश कुमार को बिहार राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है. इस पद के साथ उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया है. दिलचस्प बात यह है कि कुछ ही समय पहले देवेश कुमार ने अपनी विधान परिषद सदस्यता से इस्तीफा दिया था. उनके इस्तीफे के बाद RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश के लिए विधानमंडल में आने का रास्ता साफ हुआ था. अब नई नियुक्ति के बाद उस पूरे घटनाक्रम को एक बार फिर सियासी नजरिए से देखा जा रहा है.

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बिहार की राजनीति में सत्ता के साथ होने वाली नियुक्तियां अक्सर सिर्फ प्रशासनिक फैसले नहीं होतीं. इनके पीछे राजनीतिक समीकरण, संगठन के भीतर संतुलन और नेताओं की भूमिका का भी संदेश छिपा होता है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता देवेश कुमार की बिहार राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष पद पर नियुक्ति को लेकर भी कुछ ऐसा ही राजनीतिक विमर्श शुरू हो गया है. देवेश कुमार को राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया है और इस पद को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है. राज्य के योजना एवं विकास विभाग की ओर से जारी आदेश के मुताबिक उनकी नियुक्ति तीन साल के लिए या अगले आदेश तक रहेगी.

लेकिन देवेश कुमार की इस नियुक्ति को खास बनाने वाली सबसे बड़ी वजह उनका हालिया राजनीतिक फैसला है. कुछ ही समय पहले उन्होंने बिहार विधान परिषद की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दिया था. उस समय उनका इस्तीफा बिहार की राजनीति में काफी चर्चा का विषय बना था. अब MLC की कुर्सी छोड़ने के बाद उन्हें कैबिनेट मंत्री के दर्जे वाले पद की जिम्मेदारी मिलने से सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं.

दीपक प्रकाश के लिए छोड़ी थी MLC की कुर्सी

देवेश कुमार के इस्तीफे को समझने के लिए पूरे घटनाक्रम को पीछे से देखना जरूरी है. देवेश कुमार को साल 2021 में बिहार के राज्यपाल की ओर से विधान परिषद के लिए नामित किया गया था. उनका कार्यकाल 2027 तक था. यानी उनके पास अभी काफी समय बाकी था. इसके बावजूद उन्होंने पिछले महीने अचानक विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया.

उनके इस्तीफे के बाद बिहार की राजनीति में सवाल उठने लगे कि आखिर उन्होंने कार्यकाल पूरा होने से पहले अपनी MLC की सीट क्यों छोड़ दी? बाद में यह साफ हुआ कि उनके इस्तीफे से राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश के लिए विधानमंडल की सदस्यता हासिल करने का रास्ता आसान हो गया.

दीपक प्रकाश बिहार सरकार में मंत्री हैं और मंत्री पद पर बने रहने के लिए उनका विधानमंडल का सदस्य होना जरूरी था. ऐसे में देवेश कुमार की खाली हुई सीट ने उनके लिए राजनीतिक रास्ता खोल दिया. यही वजह थी कि देवेश कुमार का इस्तीफा सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं माना गया. उनके इस फैसले ने बिहार की सियासत में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था कि आखिर एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने अपने बचे हुए कार्यकाल के बावजूद सीट छोड़ने का फैसला क्यों किया?

देवेश कुमार के इस्तीफे पर क्यों उठे थे सवाल?

देवेश कुमार ने अपने इस्तीफे को व्यक्तिगत और अपनी इच्छा से लिया गया फैसला बताया था. हालांकि राजनीति में किसी बड़े नेता के ऐसे फैसले को सिर्फ व्यक्तिगत फैसला मानकर छोड़ देना आसान नहीं होता. उनके इस्तीफे के बाद बीजेपी के भीतर और खासकर उनके समर्थकों के बीच चर्चा शुरू हुई. उनके राजनीतिक आधार से जुड़े लोगों में भी नाराजगी की बातें सामने आईं.

खास तौर पर भूमिहार समाज के एक हिस्से में यह सवाल उठाया गया कि जब देवेश कुमार का कार्यकाल 2027 तक था, तो फिर उन्हें बीच में ही विधान परिषद की सदस्यता क्यों छोड़नी पड़ी? देवेश कुमार खुद भूमिहार समाज से आते हैं और बिहार बीजेपी में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. ऐसे में उनके इस्तीफे को सामाजिक और राजनीतिक दोनों नजरिए से देखा गया.

एक तरफ यह सवाल था कि दीपक प्रकाश को विधानमंडल में लाने के लिए देवेश कुमार को ही अपनी सीट क्यों छोड़नी पड़ी? दूसरी तरफ अब नई नियुक्ति के बाद सवाल यह है कि क्या उस राजनीतिक फैसले के बाद देवेश कुमार को सरकार में एक महत्वपूर्ण पद के जरिए सम्मान दिया गया है?

MLC की कुर्सी गई, कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला

देवेश कुमार की नई जिम्मेदारी यहीं से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है. उन्हें बिहार राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया है. योजना बोर्ड राज्य की विकास योजनाओं और नीतिगत प्राथमिकताओं से जुड़ा महत्वपूर्ण संस्थागत ढांचा है. सबसे बड़ी बात यह है कि बिहार राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष पद को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है. इसका मतलब यह है कि देवेश कुमार अब सरकार के भीतर कैबिनेट मंत्री के बराबर का राजनीतिक दर्जा रखने वाले पद पर होंगे.

यानी जिस समय उनकी विधान परिषद की सदस्यता छोड़ने को लेकर सवाल उठ रहे थे, अब उसी नेता को सरकार की ओर से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है. यहीं से 'कुर्बानी के बदले इनाम' वाली राजनीतिक चर्चा को हवा मिल रही है. हालांकि यह कहना कि नियुक्ति सीधे तौर पर किसी राजनीतिक सौदे या इनाम का परिणाम है, आधिकारिक तौर पर पुष्ट नहीं है. यह फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण और चर्चाओं का हिस्सा है.

क्या देवेश कुमार की कुर्बानी का मिला इनाम?

बिहार की राजनीति में यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है. देवेश कुमार ने अपनी MLC की सीट छोड़ी. उनके इस्तीफे के बाद दीपक प्रकाश के लिए विधानमंडल में आने का रास्ता आसान हुआ. अब देवेश कुमार को राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया है और इस पद के साथ उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल गया है.

इस पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखा जाए तो राजनीतिक गलियारों में इसे देवेश कुमार के पिछले फैसले के बाद मिले सम्मान के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि, यहां यह भी जरूरी है कि इसे 'सियासी इनाम' के तौर पर आधिकारिक रूप से घोषित फैसला नहीं माना जा सकता. सरकार की ओर से नियुक्ति के पीछे ऐसा कोई कारण सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया है. इसलिए इस कहानी का दिलचस्प पहलू तथ्य और राजनीतिक व्याख्या के बीच का अंतर है.

तथ्य यह है कि देवेश कुमार ने MLC पद से इस्तीफा दिया. तथ्य यह भी है कि उनके इस्तीफे के बाद दीपक प्रकाश के लिए विधानमंडल की सदस्यता का रास्ता खुला. और अब यह भी तथ्य है कि देवेश कुमार को राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है. इन तीनों घटनाओं को एक साथ देखने पर सियासी चर्चाएं होना स्वाभाविक है.

पीएम मोदी से लेकर सीएम सम्राट तक का जताया आभार

नई जिम्मेदारी मिलने के बाद देवेश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का आभार जताया. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इन नेताओं को धन्यवाद दिया. उनकी नई जिम्मेदारी ऐसे समय में आई है जब बिहार में बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार के सामने संगठन और सरकार के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है. ऐसे में पार्टी के पुराने और अनुभवी नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिया जाना संगठनात्मक नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है.

पत्रकारिता से राजनीति तक का सफर

देवेश कुमार का राजनीतिक सफर भी काफी लंबा रहा है. राजनीति में आने से पहले उनका जुड़ाव पत्रकारिता से रहा है. इसके बाद उन्होंने बीजेपी में सक्रिय राजनीति शुरू की. बिहार बीजेपी में उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं. वह पार्टी के प्रवक्ता, उपाध्यक्ष और महासचिव जैसे पदों पर रह चुके हैं.

संगठन के भीतर लंबे अनुभव के कारण उन्हें बीजेपी के अनुभवी नेताओं में गिना जाता है. वर्तमान में वह मिजोरम में बीजेपी के प्रभारी की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं.ऐसे में राज्य योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति को सरकार और संगठन, दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के तौर पर देखा जा सकता है.

स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी से जुड़ा है परिवार

देवेश कुमार की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि भी काफी महत्वपूर्ण है. वह स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी के पोते हैं. यमुना कार्जी को किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती का करीबी और दायां हाथ माना जाता था. यानी देवेश कुमार का परिवार स्वतंत्रता आंदोलन और किसान राजनीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है.

इसी वजह से बिहार की राजनीति में उनकी पहचान सिर्फ बीजेपी संगठन के नेता के तौर पर नहीं बल्कि एक खास सामाजिक और राजनीतिक विरासत वाले नेता के रूप में भी रही है.

इस्तीफे से नियुक्ति तक क्या बदला?

अगर पूरे घटनाक्रम को एक टाइमलाइन के तौर पर समझें तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है.

  • पहला पड़ाव: साल 2021 में देवेश कुमार बिहार विधान परिषद के लिए राज्यपाल की ओर से नामित किए गए.
  • दूसरा पड़ाव: उनका कार्यकाल 2027 तक था.
  • तीसरा पड़ाव: उन्होंने कार्यकाल पूरा होने से पहले MLC पद से इस्तीफा दे दिया.
  • चौथा पड़ाव: उनके इस्तीफे के बाद RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश के लिए विधानमंडल की सदस्यता का रास्ता साफ हुआ.
  • पांचवां पड़ाव: अब देवेश कुमार को बिहार राज्य योजना बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया.
  • छठा पड़ाव: इस पद के साथ उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल गया.

यही पूरी टाइमलाइन अब बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है.

बीजेपी के लिए भी क्यों अहम है यह नियुक्ति?

देवेश कुमार की नियुक्ति का महत्व सिर्फ उनके व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य तक सीमित नहीं है. बीजेपी के लिए भी अनुभवी नेताओं को सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना संगठनात्मक रूप से अहम माना जाता है.

देवेश कुमार लंबे समय से पार्टी में सक्रिय हैं और संगठन की अलग-अलग जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. ऐसे में योजना बोर्ड जैसे महत्वपूर्ण पद पर उनकी नियुक्ति सरकार की नीतियों और विकास योजनाओं से जुड़े काम में राजनीतिक अनुभव के इस्तेमाल के तौर पर भी देखी जा सकती है. इसके साथ ही कैबिनेट मंत्री का दर्जा उनकी राजनीतिक हैसियत को भी बनाए रखता है.

सियासी गलियारों में अब सबसे बड़ा सवाल

देवेश कुमार की नई नियुक्ति के बाद बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक नियुक्ति है या फिर इसके पीछे पिछले घटनाक्रम की भी कोई राजनीतिक कड़ी है? क्योंकि कुछ ही समय पहले उन्होंने MLC की कुर्सी छोड़ी थी. उस समय उनके फैसले ने कई सवाल खड़े किए थे. अब उन्हें कैबिनेट मंत्री के दर्जे वाला पद मिलने के बाद वही सवाल फिर से सामने आ गए हैं.

राजनीति में एक पद छोड़कर दूसरा पद मिलना अपने आप में असामान्य नहीं है. लेकिन यहां मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि देवेश कुमार की छोड़ी गई MLC सीट के बाद एक मंत्री के बेटे के लिए विधानमंडल में आने का रास्ता बना था. यही कड़ी इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रूप से दिलचस्प बना रही है.

'कुर्सी से कुर्बानी और फिर इनाम' की कहानी?

बिहार की राजनीति में इस पूरे घटनाक्रम को अगर एक लाइन में समझें तो सवाल यही बनता है पहले MLC की कुर्सी छोड़ी, अब कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला... क्या देवेश कुमार की 'कुर्बानी' का मिला सियासी इनाम? इस सवाल का जवाब फिलहाल आधिकारिक तौर पर किसी के पास नहीं है.

देवेश कुमार ने अपनी नियुक्ति के बाद शीर्ष बीजेपी नेताओं और मुख्यमंत्री का आभार जताया है. सरकार ने भी अपनी ओर से नियुक्ति को लेकर निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत आदेश जारी किया है. लेकिन राजनीति में सिर्फ फैसले नहीं, फैसलों के समय और उनके बीच के संबंध भी मायने रखते हैं. देवेश कुमार का MLC पद छोड़ना, दीपक प्रकाश का विधानमंडल में आना और इसके बाद देवेश कुमार को कैबिनेट मंत्री के दर्जे वाला पद मिलना..इन घटनाओं की टाइमिंग ने बिहार की सियासत में एक नई बहस जरूर शुरू कर दी है.

फिलहाल इतना साफ है कि देवेश कुमार की राजनीतिक हैसियत कम होने के बजाय नई नियुक्ति के बाद और मजबूत हुई है. विधान परिषद की सदस्यता छोड़ने के बाद अब वह सरकार में कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ एक अहम जिम्मेदारी संभालेंगे. ऐसे में आने वाले दिनों में उनकी नई भूमिका और बिहार की सत्ता के भीतर उनकी सक्रियता पर सबकी नजर रहेगी.