हाजीपुर नाव हादसा: सरकारी थी या प्राइवेट नाव? 14 मौतों के बाद प्रशासन और ग्रामीणों के दावे अलग-अलग

आशीष अभिनव

• 02:21 PM • 14 Oct 2026

हाजीपुर नाव हादसे के बाद सरकारी बनाम निजी नाव का विवाद गहराया. डीएम वर्षा सिंह ने नाव को निजी बताया, जबकि ग्रामीणों ने सरकारी होने का दावा किया.

Hajipur Boat Accident
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बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर में नाव पलटने से हुई दर्दनाक घटना के बाद अब नाव की पहचान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. प्रशासन हादसे में इस्तेमाल नाव को निजी बता रहा है, जबकि ग्रामीणों का दावा है कि यह सरकारी नाव है, जिसे मुखिया की ओर से आने-जाने के लिए उपलब्ध कराया गया था. इस विरोधाभास ने हादसे के बाद कई सवाल खड़े कर दिए हैं. आखिर जिस नाव पर लोग सवार होकर नदी पार कर रहे थे, वह सरकारी थी या निजी? और अगर नाव की स्थिति खराब थी, तो क्या पहले इसकी शिकायत की गई थी?

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हाजीपुर नाव हादसे के बाद सरकारी बनाम निजी नाव का विवाद

वैशाली जिले के राघोपुर में मंगलवार रात करीब 8:30 बजे बच्चों से भरी नाव पलट गई थी. बताया गया कि बच्चे पास के गांव में भोज खाने गए थे और लौटने के दौरान यह हादसा हुआ. इस दुर्घटना में कई लोगों की जान चली गई. घटना के बाद इलाके में मातम पसरा हुआ है और पीड़ित परिवारों का रो-रोकर बुरा हाल है. हादसे के बाद जब जिलाधिकारी वर्षा सिंह घटनास्थल पर पहुंचीं, तो ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की. इसी दौरान नाव सरकारी थी या निजी, इस मुद्दे पर भी बहस सामने आई.

डीएम वर्षा सिंह ने नाव को बताया निजी

घटनास्थल पर पहुंचीं वैशाली की जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने बताया कि हादसा रात करीब 8:30 बजे हुआ था. उनके अनुसार, नाव पर लगभग 15 से 20 बच्चे सवार थे, जो पड़ोस के गांव में भोज खाने जा रहे थे. इसी दौरान नाव पलट गई. डीएम ने अपने बयान में नाव को निजी बताया. उन्होंने यह भी कहा कि हादसे के बाद बचाव अभियान चलाया जा रहा था और एसडीआरएफ की टीमें रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी थीं. प्रशासन के इस बयान के बाद ग्रामीणों के दावे ने मामले को नया मोड़ दे दिया है.

ग्रामीणों का दावा- मुखिया की ओर से मिली थी सरकारी नाव

हादसे के बाद मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने संवाददाता से बातचीत में नाव को सरकारी बताया. स्थानीय निवासी अजय राय ने कहा कि यह नाव सरकारी है और इसे मुखिया की ओर से उपलब्ध कराया गया था. अजय राय के मुताबिक, पानी बढ़ने के दौरान लोगों को आने-जाने में परेशानी होती थी. ऐसे में नाव की व्यवस्था की गई थी. उन्होंने बताया कि पानी सूख जाने पर नाव को नीचे कर दिया जाता था और पानी बढ़ने पर दोबारा चलाने के लिए तैयार किया जाता था. एक अन्य ग्रामीण कुणाल कुमार ने भी दावा किया कि नाव किसी व्यक्ति ने अपने निजी पैसे से नहीं खरीदी थी, बल्कि यह सरकारी व्यवस्था के तहत मिली थी. हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि नाव किस सरकारी विभाग या योजना के माध्यम से उपलब्ध कराई गई थी. ग्रामीणों के इन बयानों के बाद नाव के स्वामित्व और उसे उपलब्ध कराने की प्रक्रिया की जांच अहम हो गई है.

नाव चलाने के लिए कोई निर्धारित नाविक नहीं था?

ग्रामीणों से बातचीत में नाव के संचालन को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई. स्थानीय लोगों ने बताया कि नाव चलाने के लिए कोई निर्धारित नाविक नहीं था. उनके अनुसार, आने-जाने की जरूरत पड़ने पर गांव के लोग ही नाव चलाते थे. ग्रामीणों के मुताबिक, नदी के दूसरी ओर करीब सात घर हैं, जहां लगभग 100 लोगों के रहने की बात बताई गई. पानी बढ़ने के दौरान रास्ता प्रभावित हो जाता है और नाव से आना-जाना जरूरी हो जाता है. अगर नाव का संचालन वास्तव में बिना किसी निर्धारित नाविक और स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था के किया जा रहा था, तो यह जांच का विषय है कि नाव चलाने की जिम्मेदारी किसके पास थी और यात्रियों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए गए थे.

जर्जर नाव और पुरानी शिकायतों को लेकर भी सवाल

हादसे के बाद कुछ ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि नाव की हालत ठीक नहीं थी और उसे बदलने के लिए पहले भी कहा गया था. लोगों का दावा है कि इस संबंध में संबंधित अधिकारियों को जानकारी दी गई थी, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई. हालांकि, पुरानी शिकायतों, नाव की वास्तविक स्थिति और अधिकारियों को दी गई जानकारी की स्वतंत्र पुष्टि अभी जरूरी है. यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि नाव का रखरखाव कौन करता था और उसे चलाने की अनुमति किसके पास थी.

हादसे के बाद प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल

राघोपुर नाव हादसे ने नदी पार करने वाले लोगों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. एक ओर ग्रामीण नाव को सरकारी बताकर उसके इंतजाम पर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रशासन उसे निजी बता रहा है. फिलहाल, सरकारी और निजी नाव को लेकर उठे सवालों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है.