बिहार के जमुई में 19 सितंबर की शाम एक नाबालिग लड़की और उसके साथी को रास्ते में रोककर उनके साथ बदसलूकी और मारपीट का मामला सामने आया. घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो पुलिस ने कार्रवाई शुरू की. मामले में FIR दर्ज की गई, SIT का गठन हुआ और आरोपियों की पहचान कर गिरफ्तारी की गई. पुलिस के मुताबिक कई अन्य संदिग्धों की तलाश भी जारी रही. लेकिन इस घटना के साथ एक दूसरी बहस भी शुरू हो गई- क्या 2026 में हुई किसी घटना का जवाब देने के लिए बार-बार 2005 का संदर्भ जरूरी है?
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घटना आज की, बहस 2005 पर क्यों?
जमुई की घटना सामने आने के बाद जब सत्ता पक्ष से कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल पूछे गए तो जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने 2005 से पहले के बिहार का संदर्भ दिया. उन्होंने यह भी कहा कि आज घटना होने पर कार्रवाई होती है. उनके बयान में मौजूदा सरकार की कार्रवाई और पुराने बिहार के बीच तुलना का संदर्भ था. इसी बहस के बीच बिहार सरकार के मंत्री श्रवण कुमार ने जमुई की घटना को 'छिटपुट' घटनाओं के संदर्भ में बताया और साथ ही दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया. बाद में उन्होंने घटना को दुखद और शर्मनाक बताते हुए कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.
यहीं से सवाल और बड़ा हो जाता है.
जब घटना 2026 में हुई है, पीड़ित आज की पीढ़ी की है और पुलिस की कार्रवाई भी आज हो रही है, तो जवाब देने के लिए राजनीतिक बहस बार-बार 2005 में क्यों लौटती है? उस लड़की के लिए 2005 क्या मायने रखता है? यहां एक अहम तथ्य भी है. मामले में पीड़िता नाबालिग है. यानी उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा 2005 के बाद का है. इसलिए 2005 की राजनीतिक तुलना उस पीढ़ी के लिए एक ऐतिहासिक संदर्भ हो सकती है, लेकिन जमुई की घटना उसके सामने मौजूद मौजूदा कानून-व्यवस्था का सवाल है. सवाल यह नहीं है कि 2005 से पहले बिहार में क्या स्थिति थी और उसके बाद क्या बदलाव हुए. सवाल यह है कि 19 सितंबर 2026 को जमुई में जो हुआ, उसके लिए आज की व्यवस्था क्या कर रही है?
कार्रवाई हुई, लेकिन सवाल भी कायम
पुलिस ने मामले में तेजी से कार्रवाई की. 5 आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद SIT गठित की गई और वीडियो के आधार पर अन्य संदिग्धों की पहचान की गई. पुलिस ने सोशल मीडिया पर घटना के वीडियो के प्रसार के खिलाफ भी कार्रवाई की. 22 सितंबर को मुख्य आरोपी नंदन यादव पुलिस मुठभेड़ में घायल हुआ और उसे गिरफ्तार किया गया. पुलिस के मुताबिक वह कार्रवाई के दौरान घायल हुआ. यानी पुलिस कार्रवाई का एक पूरा सिलसिला सामने है. लेकिन कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल का जवाब सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है. असली सवाल यह भी है कि ऐसी घटना हुई कैसे, आरोपियों ने खुले रास्ते पर नाबालिगों को कैसे रोका और घटना का वीडियो कैसे बनाया गया?
राजनीति की बहस में असली सवाल पीछे तो नहीं छूट रहा?
जमुई की घटना पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी भी तेज हुई. सत्ता पक्ष के नेताओं ने मौजूदा कार्रवाई का हवाला देते हुए विपक्ष को 2005 से पहले के बिहार की याद दिलाई. दूसरी तरफ विपक्ष ने इसी घटना को लेकर सरकार की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए. इस तरह बहस दो हिस्सों में बंट गई है. एक तरफ सवाल है- पहले बिहार में क्या होता था?
दूसरी तरफ सवाल है- आज बिहार में क्या हो रहा है? लेकिन पीड़िता के नजरिए से सबसे जरूरी सवाल शायद तीसरा है- उसे सुरक्षा कब और कैसे मिलेगी?
जवाबदेही का पैमाना अतीत नहीं, वर्तमान भी होना चाहिए
राजनीतिक दलों के लिए 2005 एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदर्भ हो सकता है. बिहार की राजनीति में कानून-व्यवस्था को लेकर 2005 से पहले और बाद की तुलना लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रही है. लेकिन किसी मौजूदा आपराधिक घटना की गंभीरता तय करने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं हो सकता कि आज स्थिति पहले से बेहतर है. क्योंकि किसी लड़की के साथ अपराध हुआ है तो उसके लिए यह सवाल नहीं है कि 2005 में क्या होता था. उसका सवाल है- आज उसके साथ क्या हुआ और आज उसे न्याय कैसे मिलेगा? जमुई की घटना इसी वजह से सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं है. यह पुलिस कार्रवाई, पीड़ित की सुरक्षा, आरोपियों की गिरफ्तारी और आगे की कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा सवाल है. आखिर में सवाल वही है कि अगर घटना 2026 में हुई है, तो जवाबदेही भी 2026 की व्यवस्था की ही तय होगी. फिर हर बार जवाब देने के लिए 2005 में लौटना क्यों जरूरी है?
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