"कहते हैं हौसलों की उड़ान के आगे किस्मत भी झुक जाती है..." इस कहावत को अक्षरशः सच कर दिखाया है बिहार के कटिहार जिले की एक नन्हीं मासूम ने. हसनगंज प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय भतौरिया में कक्षा 4 में पढ़ने वाली लक्ष्मी की उम्र भले ही खेलने-कूदने की हो, लेकिन जिंदगी ने उसे दोनों हाथों से दिव्यांग बनाकर एक कठिन परीक्षा में डाल दिया. हालांकि, लक्ष्मी ने हार मानने के बजाय अपने पैरों के बल इस चुनौती को हरा दिया है.
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'फेंक दो' कहने वालों को दिया करारा जवाब
लक्ष्मी एक मजदूर पिता की बेटी है, जो दिन-रात मेहनत कर अपने चार बच्चों का पेट पालते हैं. चार भाई-बहनों में लक्ष्मी अकेली ऐसी है जो जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग पैदा हुई. जन्म के वक्त समाज के तानों ने इस मासूम को स्वीकारने से इनकार कर दिया था. किसी ने कहा "इसे फेंक दो", तो किसी ने कहा "लक्ष्मी आई है, पालो". लेकिन मां रेणु देवी का दिल कभी नहीं हारा. उन्होंने ठान लिया कि जब तक सांसें हैं, बेटी को सीने से लगाकर रखेंगी.
पैरों से लिखती है, पैरों से खाती है खाना
आज वही लक्ष्मी अपने पैरों की उंगलियों से लिखती है, पैरों से ही खाना खाती है और अपने दैनिक जीवन का हर काम खुद करती है. स्कूल में भले ही कुछ बच्चे उसे हाथ न होने पर चिढ़ाते हैं, लेकिन लक्ष्मी का बुलंद हौसला हर दिन उसे स्कूल खींच लाता है. वह पढ़ाई में बेहद होनहार है और उसका सपना एक दिन शिक्षिका (टीचर) बनने का है.
शिक्षकों की प्रिय, स्कूल में अव्वल
स्कूल के प्राचार्य विनय चौधरी और शिक्षिका रिंकू लक्ष्मी का ज़िक्र करते ही भावुक हो उठते हैं. उनका कहना है कि लक्ष्मी पढ़ाई में अव्वल है और नियमित स्कूल आती है. स्कूल प्रशासन उसे कॉपी-किताब, बैग और मिड-डे मील की सुविधा प्राथमिकता के आधार पर मुहैया कराता है. शिक्षकों का भी मानना है कि इस होनहार बच्ची को सरकारी स्तर पर विशेष सहयोग मिलना चाहिए.
स्वास्थ्य विभाग ने बढ़ाया मदद का हाथ
लक्ष्मी की संघर्ष गाथा सामने आने के बाद हसनगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. आयुष भारद्वाज खुद डॉक्टरों की टीम लेकर लक्ष्मी के घर पहुंचे. उन्होंने बच्ची का स्वास्थ्य परीक्षण किया और सामाजिक कल्याण विभाग से मिलने वाली सरकारी योजनाओं व सुविधाओं का लाभ दिलाने के लिए कागजी प्रक्रिया तेज कर दी है.
क्या सिस्टम थामेगा इस होनहार का हाथ?
लक्ष्मी ने यह साबित कर दिया है कि "होनहार बिरवान के होत चिकने पात". लेकिन अब भी बड़ा सवाल यही है कि जिस मासूम ने बिना हाथों के भी हार मानना नहीं सीखा, क्या सरकार और प्रशासन उसके सपनों को उड़ान देने के लिए कोई ठोस मदद करेगा? या फिर यह बेटी अपने पैरों के दम पर ही अपनी मंजिल खुद तय करेगी?
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