जुलाई के पहले सप्ताह में संभावित मोदी कैबिनेट विस्तार और फेरबदल को लेकर देश के सियासी गलियारों में चर्चाएं काफी तेज हो गई हैं. इस संभावित विस्तार को लेकर खासकर बिहार की राजनीति में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं. राजनीतिक हलकों में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार अब दिल्ली की राजनीति में एक नई भूमिका निभाने जा रहे हैं. सूत्रों और चर्चाओं के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों चाहते हैं कि नीतीश कुमार केंद्र सरकार में कोई अहम जिम्मेदारी संभालें, जिसके बाद से ही कयासों का बाजार गर्म है.
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पीएम मोदी के कॉल से तेज हुईं चर्चाएं
नीतीश कुमार को लेकर यह सवाल अचानक इसलिए उठे हैं क्योंकि कहा जा रहा है कि एक फोन कॉल के बाद से इस चर्चा को काफी बल मिला है. 14 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद से ही नीतीश कुमार की अगली राजनीतिक भूमिका को लेकर लगातार कयास लगाए जा रहे थे. अब चर्चा है कि मोदी कैबिनेट के संभावित फेरबदल में उन्हें कोई बड़ा मंत्रालय दिया जा सकता है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व नीतीश कुमार को दिल्ली लाता है, तो इसके पीछे कई बड़े रणनीतिक कारण हो सकते हैं.
नीतीश को केंद्र में लाने के पीछे के समीकरण
नीतीश कुमार को मोदी कैबिनेट में शामिल करने के पीछे उनका लंबा प्रशासनिक अनुभव सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है. वह पहले भी केंद्र सरकार में रेलवे, कृषि और सड़क परिवहन जैसे बड़े और महत्वपूर्ण मंत्रालयों को बेहद कुशलता से संभाल चुके हैं. इसके अलावा, जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते दिल्ली में उनकी मौजूदगी बीजेपी और जेडीयू के आपसी समन्वय को और ज्यादा मजबूत कर सकती है.
साथ ही, बिहार की सत्ता छोड़ने के बाद उन्हें केंद्र में एक सम्मानजनक भूमिका देकर एनडीए (NDA) के भीतर राजनीतिक और सामाजिक संतुलन को बनाए रखा जा सकता है. हालांकि, दूसरी तरफ यह भी चर्चा है कि नीतीश कुमार खुद दिल्ली जाने के इच्छुक नहीं हैं. मुख्यमंत्री पद छोड़ते समय उन्होंने कार्यकर्ताओं से बिहार में ही रहकर संगठन को मजबूत करने की बात कही थी, और उनकी बढ़ती उम्र को भी इसका एक बड़ा कारण माना जा रहा है. ऐसे में अंतिम फैसला खुद नीतीश कुमार के हाथ में ही है.
गिरिराज सिंह की कुर्सी पर मंडराया संकट
इस संभावित फेरबदल में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का नाम भी काफी चर्चा में बना हुआ है. राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी इस बार नेताओं की उम्र और उनके प्रदर्शन दोनों को ध्यान में रखते हुए कुछ नए और युवा चेहरों को मौका दे सकती है. गिरिराज सिंह की उम्र 73 साल से अधिक हो चुकी है, इसलिए पार्टी भविष्य की राजनीति को देखते हुए नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है. हालांकि, गिरिराज सिंह को मंत्रिमंडल से हटाना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि वे पार्टी के सबसे मुखर हिंदुत्ववादी नेताओं में गिने जाते हैं और बिहार में भूमिहार समाज के एक बेहद प्रभावशाली चेहरे हैं.
विवेक ठाकुर और मनन मिश्रा रेस में आगे
यदि गिरिराज सिंह की जगह किसी नए चेहरे को शामिल किया जाता है, तो नवादा के सांसद विवेक ठाकुर का नाम सबसे आगे चल रहा है. पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर की छवि एक शिक्षित और विवादों से दूर रहने वाले नेता की है, जिन्हें बीजेपी भूमिहार समाज के नए चेहरे के रूप में आगे बढ़ा सकती है. इसके अलावा, केंद्रीय कोयला एवं खान राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे को लेकर भी चर्चा है कि उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर मंत्रिमंडल से बाहर किया जा सकता है, क्योंकि बिहार बीजेपी के नए प्रदेश नेतृत्व में उनकी भूमिका बढ़ने की संभावना है. उनकी जगह राज्यसभा सांसद और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन मिश्रा का नाम भी चर्चा में बना हुआ है.
राजपूत समाज को मिल सकता है प्रतिनिधित्व
बिहार से मौजूदा मोदी कैबिनेट में राजपूत समाज का कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं होने की चर्चा भी राजनीतिक हलकों में काफी जोर पकड़ रही है. ऐसे में महाराजगंज के सांसद जनार्दन सिंह सिगरीवाल के नाम को संभावित मंत्रियों की सूची में शामिल बताया जा रहा है. सिगरीवाल लंबे समय से राजनीति में सक्रिय हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं, और उनकी साफ-सुथरी छवि और संगठनात्मक अनुभव उनके पक्ष में जाता है.
हालांकि, उनके सामने चुनौती यह है कि राजपूत समाज से बीजेपी के पास राधा मोहन सिंह और राजीव प्रताप रूढ़ी जैसे कई वरिष्ठ नेता भी मौजूद हैं, इसलिए अंतिम फैसला पार्टी के जातीय और राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखकर ही केंद्रीय नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा.
फिलहाल कयासों का बाजार गर्म, आधिकारिक पुष्टि का इंतजार
आपको बता दें कि मोदी कैबिनेट के इस संभावित फेरबदल को लेकर जो भी नाम इस समय सामने आ रहे हैं, वे फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं और मीडिया रिपोर्ट्स पर ही आधारित हैं. केंद्र सरकार या भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से अभी तक किसी भी नाम की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. ऐसे में जुलाई के पहले सप्ताह में होने वाले संभावित कैबिनेट विस्तार के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी कि बिहार से किसे नया मौका मिलता है, कौन अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब होता है और क्या नीतीश कुमार वाकई दिल्ली आकर अपनी नई सियासी पारी की शुरुआत करते हैं.
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