बिहार के सीएम और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मुंगेर दौरे के दौरान एक ऐसी दिलचस्प और हैरान कर देने वाली तस्वीर सामने आई, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. मुख्यमंत्री के वीआईपी काफिले में शामिल एक सरकारी वाहन अचानक बीच सड़क पर ही बंद पड़ गया. आलम यह रहा कि काफिले की रफ्तार बनाए रखने और गाड़ी को स्टार्ट करने के लिए पुलिस के जवानों को पसीना बहाते हुए जोरदार धक्का लगाना पड़ा.
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तारापुर से हवेली खड़कपुर के बीच घटी घटना
मिली जानकारी के मुताबिक, तारापुर के लोना गांव में आयोजित मॉडल स्कूल के भव्य उद्घाटन समारोह के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का काफिला अगले कार्यक्रम स्थल, यानी 'हरपुर थाना' के उद्घाटन के लिए रवाना हुआ था. मुख्यमंत्री के साथ अधिकारियों और सुरक्षा बलों की दर्जनों गाड़ियां एक साथ चल रही थीं. इसी दौरान, काफिले में शामिल श्रम संसाधन विभाग (संग्रामपुर) के श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी निलेश कुमार की सरकारी गाड़ी अचानक बीच रास्ते में हांफ गई और उसने दम तोड़ दिया.
'धक्का तंत्र' के सहारे मुख्य मार्ग तक पहुंची गाड़ी
गाड़ी के अचानक बंद होते ही अफरा-तफरी का माहौल बन गया. वीआईपी मूवमेंट के बीच रास्ता बाधित न हो और गाड़ी किसी तरह स्टार्ट हो जाए, इसके लिए वाहन में सवार पुलिस जवानों ने मोर्चा संभाला. जवानों ने ग्रामीण सड़क से धक्का मारते हुए गाड़ी को किसी तरह तारापुर-हवेली खड़गपुर मुख्य मार्ग तक पहुंचाया. कड़ी मशक्कत और जवानों के पसीने छूटने के बावजूद जब गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई, तो लाचार जवानों ने रास्ता बदलने में ही भलाई समझी. आखिरकार, पुलिसकर्मियों को मुख्य सड़क से गुजर रही अन्य गाड़ियों और बाइक सवारों से लिफ्ट लेकर तारापुर की ओर रवाना होना पड़ा.
बोनट खोलकर देखते रहे ड्राइवर, अंदर बैठे रहे साहब!
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सड़क पर अजीबोगरीब नजारा देखने को मिला. एक तरफ जहां खाकी वर्दीधारी जवान चिलचिलाती धूप में गाड़ी में धक्का लगा रहे थे, वहीं गाड़ी के अंदर एक व्यक्ति आराम से बैठा हुआ दिखाई दे रहा था. हालांकि, वह व्यक्ति खुद श्रम प्रवर्तन अधिकारी थे या कोई अन्य, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है. वहीं, गाड़ी का ड्राइवर बार-बार बोनट खोलकर बेबस नजरों से इंजन को घूरता नजर आया.
वीआईपी सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
इस घटना के बाद अब जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की तैयारी पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं कि जब मुख्यमंत्री स्तर का वीआईपी काफिला मूवमेंट में था, तो उससे पहले काफिले में शामिल होने वाली गाड़ियों की तकनीकी जांच क्यों नहीं की गई? मुंगेर की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिहार के सरकारी तंत्र में जब भी तकनीकी व्यवस्थाएं दम तोड़ती हैं, तो वहां अंततः 'धक्का तंत्र' ही सबसे बड़ा और इकलौता सहारा बनता है.
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