बिहार में इस वक्त हर जगह बस बांकीपुर उपचुनाव की चर्चा हो रही है. चर्चा के पीछे की सबसे बड़ी वजह है प्रशांत किशोर. राजनीतिक रणनीतिकार से खुद राजनेता बने प्रशांत किशोर इस बार खुद चुनावी मैदान में है. इस बीच इंडिया टुडे समूह के Tak चैनल्स के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर ने प्रशांत किशोर से खास बातचीत की. इस दौरान पीके ने अपने चुनावी हलफनामे में घोषित करीब 200 करोड़ रुपये की संपत्ति को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि उनकी यह आमदनी उनकी अपनी बुद्धि और सलाह से अर्जित की गई है, जिस पर पूरा टैक्स भरा गया है. साथ ही प्रशांत किशोर ने अपने डिग्री पर उठ रहे सवाल, अपनी इनकम समेत कई मुद्दों पर खुलकर बातचीत की. एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में आइए सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं इन्हीं सवालों के जवाब.
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95 करोड़ की 'वेदास वेंचर' कंपनी का खोला राज
हलफनामे में प्रशांत किशोर की पारिवारिक कंपनी 'वेदास वेंचर' के शेयरों की कीमत करीब 95 करोड़ रुपये दिखाई गई है, जो साल 2023 में ही बनी थी. इस कंपनी के काम और इसके अचानक बढ़े वैल्यूएशन पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए प्रशांत किशोर ने स्पष्ट किया कि यह कोई पॉलिटिकल कंसल्टिंग (राजनीतिक सलाह देने वाली) कंपनी नहीं है. यह एक इन्वेस्टमेंट कंपनी है जो उनके परिवार का 'फैमिली ऑफिस' है और शेयर्स, बॉन्ड्स तथा डिबेंचर्स में निवेश का प्रबंधन करती है. प्रशांत किशोर ने बताया कि इस कंपनी पर 30 फीसदी टैक्स और करीब 35 करोड़ रुपये का जीएसटी (GST) भरा गया है.
उन्होंने यह भी खुलासा किया कि कानूनी तौर पर इस कंपनी को हलफनामे में दिखाना उनके लिए जरूरी नहीं था क्योंकि इसमें उनके, उनकी पत्नी या बच्चे के नाम पर कोई शेयर नहीं हैं. लेकिन चूंकि यह कंपनी उनकी सलाह से बनी है और इस पर उनका 100% कंट्रोलिंग स्टेक है, इसलिए उन्होंने पारदर्शिता के लिए इसे सार्वजनिक किया है. पीके ने दावा किया कि इस कंपनी की 250 करोड़ रुपये की कमाई में से 90 करोड़ रुपये जन सुराज को डोनेट किए जा चुके हैं और भविष्य में भी इसकी 90% आमदनी जन सुराज को ही जाएगी ताकि संगठन को चलाने की व्यवस्था बनी रहे।.
मास्टर डिग्री के विवाद पर दिया IIM का उदाहरण
चुनावी हलफनामे में दर्ज उनकी मास्टर डिग्री को लेकर उठ रहे तकनीकी सवालों पर भी प्रशांत किशोर ने खुलकर बात की. जब उनसे पूछा गया कि जिस एडमिनिस्ट्रेटिव कॉलेज से उन्होंने पढ़ाई की है वह मास्टर डिग्री नहीं देता, तो पीके ने जवाब दिया कि तकनीकी रूप से आईआईएम (IIM) अहमदाबाद भी मास्टर डिग्री नहीं देता, बल्कि वह पीजी डिप्लोमा ही देता है. लेकिन वह डिप्लोमा हमेशा मास्टर डिग्री के समकक्ष (इक्विवेलेंट) माना जाता है.
उन्होंने बताया कि उनका यह कोर्स जॉन हॉपकिंस के सहयोग से चलता है और इसमें दाखिला कैट (CAT) परीक्षा के माध्यम से होता है. प्रशांत किशोर ने कहा कि चूंकि वह संस्थान तकनीकी रूप से यूनिवर्सिटी नहीं है, इसलिए उसे डिप्लोमा कहा जा सकता है, लेकिन उनके सर्टिफिकेट पर 'मास्टर्स' लिखा हुआ है. उन्होंने साफ किया कि जो उनके मूल सर्टिफिकेट और इनकम टैक्स के रिकॉर्ड में दर्ज है, वही उन्होंने हूबहू अपने चुनावी शपथ पत्र में भी लिखा है, ताकि बाद में कोई विसंगति न आए.
प्रोफेशन में अभी भी लिखा 'पॉलिटिकल कंसलटेंट'
इंटरव्यू के दौरान जब प्रशांत किशोर का ध्यान इस ओर खींचा गया कि पिछले 4 साल से बिहार के गांवों में घूमने के बावजूद उन्होंने हलफनामे में अपना प्रोफेशन 'पॉलिटिकल कंसलटेंट और एडवाइजर' ही लिखा है, तो उन्होंने इसकी वजह भी बताई. प्रशांत किशोर के अनुसार, चुनावी शपथ पत्र में पिछले 5 सालों की आमदनी और प्रोफेशन का ब्यौरा देना होता है. चूंकि उनके इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में यही प्रोफेशन दर्ज है, इसलिए कानूनी रूप से हलफनामे में भी उन्हें यही दिखाना पड़ा, ताकि आईटीआर और शपथ पत्र के आंकड़े आपस में मैच कर सकें.
बांकीपुर से चुनाव लड़ने के पीछे की 3 वजहें
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर सीट से चुनाव लड़ने के पीछे तीन मुख्य कारण बताए हैं. उन्होंने इस खास इंटरव्यू में कहा कि यह चुनाव सिर्फ एक विधायक चुनने का नहीं है, बल्कि यह वर्तमान एनडीए सरकार के नेतृत्व पर एक जनमत संग्रह है. उनके अनुसार, सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की जनता के पास यह पहला मौका है कि वे अपने वोट के माध्यम से यह बता सकें कि वे इस फैसले से सहमत हैं या नहीं. प्रशांत किशोर ने दावा किया कि बिहार का एक बड़ा वर्ग सम्राट चौधरी के नेतृत्व से नाखुश है और वह चाहता है कि वे बांकीपुर में आकर चुनाव लड़ें ताकि भाजपा को हराकर केंद्रीय नेतृत्व को संदेश दिया जा सके.
दूसरी वजह बताते हुए उन्होंने भाजपा के राजनीतिक अहंकार पर निशाना साधा. प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं ने कैमरे पर बयान दिया था कि बांकीपुर उनका ऐसा मजबूत किला है जहाँ वे कुत्ता-बिल्ली को भी लड़ाएंगे तो भी जनता उन्हें ही वोट देगी. उन्होंने इसे जनता का अपमान और राजनीतिक अहंकार बताया और कहा कि वे इस अहंकार पर अंकुश लगाने के लिए मैदान में उतरे हैं. तीसरी वजह के रूप में उन्होंने कहा कि बिहार में एनडीए के 202 विधायक और कई सांसद-मंत्री यह मानकर बैठ गए हैं कि वे जात, धर्म या लालू यादव के डर से जीत ही जाएंगे. उनके मन से जनता का डर खत्म हो चुका है, इसलिए प्रतिनिधियों में जनता के प्रति जवाबदेही और डर पैदा करने के लिए उन्होंने बांकीपुर को चुना है.
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