बिहार में आरक्षण को लेकर सियासी बहस अब परिवारों के बीच भी दिखाई देने लगी है. केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बीच आरक्षण के मुद्दे पर जारी राजनीतिक बयानबाजी के बाद अब लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य और जीतन राम मांझी की बहू व इमामगंज विधायक दीपा मांझी आमने-सामने हैं. रोहिणी आचार्य ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का विरोध किया, जिसके जवाब में दीपा मांझी ने कहा कि गरीबों और वंचितों को ज्ञान या उपदेश नहीं, बल्कि उनका हक और हिस्सा चाहिए.
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रोहिणी आचार्य ने आरक्षण की समीक्षा पर क्या कहा?
दरअसल, रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा को लेकर अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी बनी हुई है, तब तक आरक्षण की किसी भी तरह की समीक्षा उचित नहीं है. रोहिणी ने आरक्षण को केवल गरीबी दूर करने की योजना मानने के बजाय सामाजिक भेदभाव और असमानता को दूर करने का संवैधानिक माध्यम बताया. उनके मुताबिक, आरक्षण का उद्देश्य उन समुदायों की शिक्षा, शासन, प्रशासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी सुनिश्चित करना भी है, जो लंबे समय तक सामाजिक रूप से वंचित रहे हैं. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 का हवाला देते हुए आरक्षण को सामाजिक न्याय से जोड़ने की बात कही.
दीपा मांझी ने दिया पलटवार
रोहिणी आचार्य के बयान पर इमामगंज की विधायक दीपा मांझी ने प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि गरीबों और वंचितों को आरक्षण के मुद्दे पर ज्ञान या उपदेश नहीं, बल्कि उनका हक और हिस्सा चाहिए. दीपा मांझी ने सवाल उठाया कि अगर सामाजिक न्याय और आरक्षण की व्यवस्था लंबे समय से लागू है, तो आज भी समाज के सबसे वंचित वर्गों तक इसका लाभ पूरी तरह क्यों नहीं पहुंच पाया है. उन्होंने कहा कि सवाल किसी व्यक्ति से नहीं बल्कि व्यवस्था से है. उनके मुताबिक, आरक्षण किसी की कृपा नहीं बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक वंचना के खिलाफ मिला संवैधानिक अधिकार है.
'जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'
दीपा मांझी ने अपने बयान में आरक्षण के लाभ को समाज के सबसे पीछे खड़े लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि वह किसी का अधिकार छीनने की मांग नहीं कर रही हैं, बल्कि सबसे वंचित लोगों को भी अवसर और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. इसी संदर्भ में उन्होंने अपने कोटे में कोटा यानी quota within quota की मांग का समर्थन किया. उनका तर्क है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक भी पहुंचना चाहिए जो अपने ही वर्ग के भीतर सबसे ज्यादा वंचित हैं. दीपा मांझी ने 'जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' की बात दोहराते हुए आरक्षण व्यवस्था के भीतर वास्तविक भागीदारी और प्रतिनिधित्व के आंकड़ों पर चर्चा की जरूरत बताई.
'अब आंकड़ों पर जवाब चाहिए'
रोहिणी आचार्य के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए दीपा मांझी ने कहा कि ज्ञान और उपदेश बहुत हो चुके, अब गरीबों और वंचितों को आंकड़ों पर जवाब चाहिए. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर आरक्षण का लाभ किन लोगों तक पहुंचा और समाज के सबसे वंचित वर्गों को उनका हिस्सा कब मिलेगा. दीपा मांझी का कहना है कि आरक्षण व्यवस्था बनी रहनी चाहिए, लेकिन इसके लाभ का वितरण भी इस तरह होना चाहिए कि समाज में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक अवसर और प्रतिनिधित्व पहुंचे.
चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बाद बढ़ी बहस
आरक्षण के मुद्दे पर यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब बिहार में चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच भी आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस देखने को मिली है. अब रोहिणी आचार्य और दीपा मांझी के आमने-सामने आने से इस मुद्दे ने नया राजनीतिक रंग ले लिया है. एक तरफ आरक्षण की समीक्षा के विरोध की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ आरक्षण का लाभ सबसे वंचित लोगों तक पहुंचाने और कोटे के भीतर कोटा देने की मांग उठ रही है. यानी बहस सिर्फ आरक्षण खत्म करने या बनाए रखने तक सीमित नहीं है. अब सवाल यह भी है कि आरक्षण का लाभ किसे मिल रहा है, समाज के सबसे पिछड़े वर्गों तक इसकी पहुंच कितनी है और क्या आरक्षण के भीतर भी लाभ के समान वितरण की व्यवस्था होनी चाहिए?
अब आगे क्या?
बिहार की राजनीति में आरक्षण हमेशा से एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है. फिलहाल दोनों नेताओं के बयानों ने आरक्षण की समीक्षा, सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और quota within quota जैसे मुद्दों को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया है. अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर बिहार के दूसरे राजनीतिक दल और नेता क्या रुख अपनाते हैं और क्या यह बहस सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहती है या आरक्षण के लाभ के आंकड़ों और प्रतिनिधित्व पर भी कोई ठोस चर्चा होती है.
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