क्या प्रशांत किशोर के डर से मैदान में उतरे तेजस्वी? छात्रों के मुद्दे पर मार्च, लेकिन आंदोलन में छात्र क्यों नहीं ?

ऋचा शर्मा

• 08:03 PM • 19 Aug 2026

5 साल बाद सड़क पर उतरे तेजस्वी यादव. राजभवन मार्च में छात्रों, बेरोजगारी और AK-47 मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा. क्या यह रणनीति है या Prashant Kishor का दबाव?

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बिहार की राजनीति में एक बार फिर तेजस्वी यादव सड़क पर नजर आए. राजभवन मार्च के बाद तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर युवाओं के नाम भावुक और जोशीला पोस्ट लिखा. उन्होंने पानी की बौछार, अत्याचार और गोली की बौछार के बावजूद युवाओं के पीछे नहीं हटने की बात कही और "युवा एकता जिंदाबाद" और "इंकलाब" का नारा दिया.

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लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस छात्र और युवा मुद्दे को लेकर तेजस्वी यादव सड़क पर उतरे, उस मार्च में छात्र ही क्यों नजर नहीं आए? और उससे भी बड़ा सवाल- क्या तेजस्वी की यह अचानक सक्रियता सिर्फ छात्रों के मुद्दे पर है, या इसके पीछे बिहार की बदलती सियासी जमीन और प्रशांत किशोर का बढ़ता प्रभाव भी एक बड़ी वजह है?

पांच साल बाद सड़क पर तेजस्वी, सवाल टाइमिंग पर

तेजस्वी यादव लंबे समय से बिहार की राजनीति में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं. बीच में अगस्त 2022 से जनवरी 2024 तक वह डिप्टी सीएम रहे, लेकिन विपक्ष में रहते हुए बड़े सड़क आंदोलन के मामले में उनकी सक्रियता लंबे समय से सीमित रही है.

अब अचानक राजभवन मार्च, हाथ में तिरंगा और सोशल मीडिया पर "इंकलाब" जैसी भाषा ने राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है. सवाल यही है कि आखिर अभी ऐसा क्या बदला कि तेजस्वी को फिर सड़क पर उतरना पड़ा? इस सवाल का जवाब बिहार की हालिया राजनीति में प्रशांत किशोर की एंट्री और बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे से जोड़कर देखा जा रहा है.

बांकीपुर की जीत ने बदला विपक्ष का नैरेटिव?

बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी की जीत ने बिहार की राजनीति में एक नया संदेश दिया. बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले इलाके में जीत और आरजेडी उम्मीदवार का प्रदर्शन विपक्ष के समीकरणों पर सवाल खड़े करने वाला रहा. प्रशांत किशोर लगातार युवाओं, छात्रों, रोजगार और आम लोगों के मुद्दों को लेकर राजनीतिक नैरेटिव तैयार करते रहे हैं. ऐसे में अगर वह खुद को बिहार में एक वैकल्पिक विपक्षी चेहरे के तौर पर स्थापित करने में सफल होते हैं, तो इसका सीधा असर तेजस्वी यादव की राजनीति पर पड़ सकता है.

विधानसभा में संख्या बल के आधार पर तेजस्वी नेता प्रतिपक्ष बने रह सकते हैं, लेकिन राजनीति सिर्फ विधानसभा के आंकड़ों से नहीं चलती. जनता के बीच कौन विपक्ष की आवाज बन रहा है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि तेजस्वी की हालिया सड़क पर वापसी को राजनीतिक जानकार सिर्फ सरकार के खिलाफ आंदोलन के तौर पर नहीं, बल्कि विपक्ष की जगह और युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं.

सीवान फायरिंग बनी आंदोलन की वजह

सीवान में छात्रों पर AK-47 से फायरिंग की घटना के बाद तेजस्वी यादव ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया और राजभवन मार्च का ऐलान किया. हालांकि, सरकार की ओर से इस मामले में कार्रवाई की जा चुकी थी. संबंधित जवान को निलंबित किया गया, अधिकारियों के तबादले किए गए और हथियारों के इस्तेमाल को लेकर भी कदम उठाए गए.

इसके बावजूद तेजस्वी ने इस मुद्दे को लेकर सड़क पर उतरने का फैसला किया. यही वजह है कि सवाल उठ रहा है कि क्या यह आंदोलन सिर्फ घटना पर सरकार को घेरने के लिए था, या इसके पीछे युवाओं के बीच अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की बड़ी रणनीति भी थी?

पार्टी का झंडा गायब, तिरंगा क्यों?

राजभवन मार्च में एक और चीज ने ध्यान खींचा. मार्च में आरजेडी के झंडे की जगह तिरंगा प्रमुखता से नजर आया. इसे भी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. संदेश यह देने की कोशिश हो सकती है कि आंदोलन किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि युवाओं और आम जनता के अधिकारों का आंदोलन है.

यही वह राजनीतिक भाषा है, जिसका इस्तेमाल प्रशांत किशोर भी लगातार करते रहे हैं- छात्र, युवा, रोजगार और आम आदमी के मुद्दे. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या तेजस्वी अब उसी सामाजिक और युवा स्पेस को दोबारा अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं?

सबसे बड़ा सवाल- छात्रों के मुद्दे पर छात्र ही नदारद

इस पूरे मार्च की सबसे बड़ी विडंबना यही रही. तेजस्वी यादव जिस छात्र और युवा मुद्दे को लेकर राजभवन की तरफ मार्च कर रहे थे, उसी समय छात्र खुद गर्दनीबाग में TRE-4 भर्ती को लेकर आंदोलन कर रहे थे.

छात्र 18 अगस्त से धरने और अनशन पर बैठे हैं. उनकी मांग शिक्षक भर्ती से जुड़ी है और आंदोलन लगातार जारी है. ऐसे में जिस समय तेजस्वी युवाओं के अधिकार और उनके भविष्य की बात कर रहे थे, उसी समय बड़ी संख्या में आंदोलनकारी छात्र अपने अलग धरना स्थल पर मौजूद थे. यानी छात्रों के नाम पर राजनीतिक मार्च हुआ, लेकिन जिस आंदोलन को छात्र खुद चला रहे थे, उससे तेजस्वी का मार्च अलग रहा. यही विरोधाभास अब इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी बन गया है.

क्या तेजस्वी ने प्रशांत किशोर की चुनौती स्वीकार कर ली?

बिहार की राजनीति में यह सवाल अब तेजी से उठ रहा है कि क्या प्रशांत किशोर के बढ़ते प्रभाव ने तेजस्वी यादव को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया है? अगर प्रशांत किशोर छात्रों, बेरोजगार युवाओं और आम जनता के मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहते हैं और सड़क की राजनीति को अपना हथियार बनाते हैं, तो तेजस्वी के लिए चुप रहना राजनीतिक तौर पर नुकसानदेह हो सकता है.

यही वजह है कि राजभवन मार्च को सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं बताता. इसके पीछे विपक्ष की राजनीति में अपनी जगह बनाए रखने और युवाओं के बीच अपना आधार मजबूत करने की कोशिश भी दिखाई देती है.

असली परीक्षा अब आगे

तेजस्वी यादव का राजभवन मार्च कितना राजनीतिक असर पैदा करता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा. लेकिन इस मार्च ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है- क्या तेजस्वी यादव अब प्रशांत किशोर की चुनौती का जवाब सड़क की राजनीति से देंगे? क्योंकि बिहार में विपक्ष की लड़ाई अब सिर्फ सरकार बनाम विपक्ष तक सीमित नहीं रह गई है. विपक्ष के भीतर भी यह मुकाबला शुरू हो चुका है कि युवाओं की आवाज कौन बनेगा और जनता के बीच असली विपक्ष का चेहरा किसे माना जाएगा.

राजभवन मार्च में तेजस्वी की हुंकार भले ही सरकार के खिलाफ थी, लेकिन बिहार की राजनीति में इसका एक संदेश विपक्ष के भीतर भी गया है- मैदान खाली नहीं छोड़ा जा सकता.