8th Pay Commission: सिर्फ फिटमेंट फैक्टर नहीं, 15 साल के पेंशन नियम और सालाना इंक्रीमेंट में बदलाव से भी बदल सकती है कर्मचारियों की कमाई

तनीषा त्यागी

• 03:04 PM • 31 Aug 2026

8वें वेतन आयोग में सिर्फ फिटमेंट फैक्टर नहीं, पेंशन बहाली के 15 साल वाले नियम और सालाना इंक्रीमेंट पर भी बड़ा फैसला हो सकता है. जानिए किसे कितना असर पड़ेगा.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

संगठन 5 से 7 फीसदी सालाना इंक्रीमेंट की मांग कर रहे हैं

पेंशन बहाली अवधि 15 से 11 साल करने की मांग उठी

35,000 रुपये पेंशन के उदाहरण में फायदा 6 लाख रुपये से ज्यादा

8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच उम्मीदें लगातार बढ़ रही हैं. कर्मचारियों की नजर जहां नई वेतन संरचना और फिटमेंट फैक्टर पर है, वहीं पेंशनभोगियों के लिए पेंशन से जुड़े कुछ पुराने नियमों में बदलाव की मांग भी जोर पकड़ रही है. 8वें वेतन आयोग का गठन नवंबर 2025 में हो चुका है, लेकिन इसकी सिफारिशों को अभी लागू नहीं किया गया है. आयोग की बैठकों का दौर जारी है और अलग-अलग कर्मचारी संगठन अपनी मांगें आयोग के सामने रख रहे हैं. इन मांगों में केवल मूल वेतन बढ़ाने की बात नहीं है. कर्मचारी संगठन सालाना वेतन वृद्धि यानी इंक्रीमेंट की दर बढ़ाने की मांग भी कर रहे हैं. वहीं पेंशनभोगियों से जुड़ी एक अहम मांग यह है कि सेवानिवृत्ति के समय एकमुश्त रकम लेने के बदले कम हुई पेंशन को दोबारा पूरी तरह बहाल करने की अवधि 15 साल से घटाकर 11 साल की जाए. अगर इन मांगों पर फैसला कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के पक्ष में आता है, तो इसका असर उनकी आय पर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है.

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पेंशनभोगियों के लिए 15 साल के नियम में बदलाव की मांग

राष्ट्रीय संयुक्त परामर्शदात्री तंत्र यानी NC-JCM ने पेंशन से जुड़े एक पुराने नियम में बदलाव की मांग की है. संगठन चाहता है कि सेवानिवृत्ति के समय एकमुश्त रकम लेने के कारण पेंशन में होने वाली कटौती की अवधि 15 साल से घटाकर 11 साल कर दी जाए. मौजूदा व्यवस्था के तहत कोई कर्मचारी सेवानिवृत्ति के समय अपनी पेंशन का एक हिस्सा पहले ही एकमुश्त रकम के रूप में ले सकता है. इसके बदले उसकी हर महीने मिलने वाली पेंशन कम हो जाती है. यह कटौती एक निश्चित अवधि तक जारी रहती है और 15 साल पूरे होने के बाद पूरी पेंशन फिर से बहाल हो जाती है. NC-JCM का तर्क है कि यह व्यवस्था काफी पुरानी है और जिस समय इसे लागू किया गया था, उस समय आर्थिक परिस्थितियां और जीवन प्रत्याशा आज से काफी अलग थीं. इसलिए अब इसकी समीक्षा किए जाने की जरूरत है.

15 साल का नियम बदलने पर पेंशनभोगियों को कितना फायदा?

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, अगर कम्यूटेड पेंशन की बहाली की अवधि 15 साल से घटाकर 11 साल कर दी जाती है, तो पेंशनभोगियों को चार साल तक पूरी पेंशन मिलने का अतिरिक्त लाभ मिल सकता है. उदाहरण के तौर पर अगर किसी कर्मचारी की मूल पेंशन 35,000 रुपये है, तो चार साल की अतिरिक्त पूरी पेंशन से उसे 6 लाख रुपये से ज्यादा का फायदा होने का अनुमान लगाया गया है. हालांकि यह केवल दिए गए उदाहरण के आधार पर समझाया गया संभावित लाभ है. वास्तविक फायदा कर्मचारी की पेंशन, कम्यूट की गई राशि और लागू नियमों पर निर्भर करेगा.

आखिर क्या है कम्यूटेड पेंशन?

कम्यूटेड पेंशन को आसान भाषा में समझें तो यह सेवानिवृत्ति के समय पेंशन के एक हिस्से को पहले ही एकमुश्त रकम के रूप में लेने की सुविधा है. मान लीजिए किसी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद हर महीने एक निश्चित पेंशन मिलनी है. वह अपनी पेंशन के एक हिस्से को पहले ही एकमुश्त रकम के तौर पर ले सकता है. इसके बदले हर महीने मिलने वाली पेंशन में कटौती हो जाती है. मौजूदा व्यवस्था के अनुसार यह कटौती 15 साल तक रहती है. 15 साल पूरे होने के बाद पेंशन की कटौती खत्म हो जाती है और पूरी पेंशन फिर से मिलने लगती है. NC-JCM अब इसी अवधि को 11 साल करने की मांग कर रहा है. अगर यह मांग स्वीकार होती है, तो पेंशनभोगियों को तय अवधि से चार साल पहले पूरी पेंशन मिलने लगेगी.

15 साल का नियम इतना पुराना क्यों है?

दिए गए इनपुट के मुताबिक, पेंशन से संबंधित यह 15 साल की व्यवस्था साल 1896 में लागू की गई थी. उस समय ब्याज दर करीब 12 फीसदी थी और औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 57.7 साल बताई गई थी. अब आर्थिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और जीवन प्रत्याशा में भी काफी बदलाव आया है. इसी आधार पर कर्मचारी संगठन इस पुराने नियम की समीक्षा की मांग कर रहे हैं. संगठन का तर्क है कि दशकों पहले बनाए गए नियमों को मौजूदा आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के हिसाब से देखा जाना चाहिए.

8वें वेतन आयोग में सिर्फ फिटमेंट फैक्टर पर नहीं है नजर

केंद्रीय कर्मचारियों के बीच 8वें वेतन आयोग की चर्चा अक्सर फिटमेंट फैक्टर को लेकर होती है. लेकिन कर्मचारियों की मांग इससे कहीं आगे है. फिटमेंट फैक्टर वह गुणक है, जिसका इस्तेमाल मौजूदा मूल वेतन को संशोधित मूल वेतन में बदलने के लिए किया जाता है. इसे आसान तरीके से ऐसे समझ सकते हैं.

मौजूदा मूल वेतन × फिटमेंट फैक्टर = संशोधित मूल वेतन

7वें वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था. 8वें वेतन आयोग के लिए अभी कोई अंतिम फिटमेंट फैक्टर तय नहीं हुआ है. इसलिए 3.61, 3.83 या 4 जैसे आंकड़े फिलहाल केवल चर्चाओं और मांगों का हिस्सा हैं. इन्हें सरकार की आधिकारिक घोषणा नहीं माना जा सकता.

बड़ा फिटमेंट फैक्टर मिला तो तुरंत बढ़ सकता है मूल वेतन

फिटमेंट फैक्टर का असर कर्मचारी के मूल वेतन पर सीधे दिखाई देता है. अगर उदाहरण के तौर पर किसी कर्मचारी की मौजूदा मूल वेतन 56,100 रुपये है और उस पर 2.57 का गुणक लगाया जाए, तो संशोधित मूल वेतन लगभग 1.44 लाख रुपये बन सकता है. इसके बाद सालाना वेतन वृद्धि के आधार पर मूल वेतन में आगे बढ़ोतरी होती रहती है. यहां यह समझना जरूरी है कि यह केवल गणित समझाने के लिए दिया गया उदाहरण है. 8वें वेतन आयोग ने अभी इस तरह की कोई अंतिम वेतन संरचना घोषित नहीं की है.

सालाना इंक्रीमेंट बढ़ा तो लंबी अवधि में बड़ा फायदा

कर्मचारी संगठनों का जोर केवल शुरुआत में मिलने वाली वेतन बढ़ोतरी पर नहीं है. वे सालाना इंक्रीमेंट की मौजूदा दर में भी बढ़ोतरी चाहते हैं. अभी 3 फीसदी सालाना इंक्रीमेंट की व्यवस्था के संदर्भ में कर्मचारी संगठन इसे बढ़ाकर 5 फीसदी, 6 फीसदी या 7 फीसदी करने की मांग कर रहे हैं. इसका असर शुरुआत में बहुत बड़ा दिखाई नहीं दे सकता, लेकिन लंबे समय में इसका प्रभाव काफी बढ़ सकता है. इसकी वजह यह है कि हर साल की वेतन वृद्धि बढ़े हुए मूल वेतन पर होती है. यानी एक साल की बढ़ोतरी अगले साल की वेतन गणना का आधार बन जाती है. इस तरह समय के साथ बढ़ोतरी पर चक्रवृद्धि प्रभाव दिखाई देता है.

5 फीसदी इंक्रीमेंट का क्या असर पड़ेगा?

दिए गए उदाहरण के मुताबिक, अगर 56,100 रुपये की शुरुआती मूल वेतन पर कोई फिटमेंट फैक्टर नहीं लगाया जाए और सालाना इंक्रीमेंट 5 फीसदी कर दिया जाए, तो पहले साल मूल वेतन करीब 58,900 रुपये हो सकती है. इसी दर से बढ़ोतरी जारी रहने पर 15वें साल में मूल वेतन करीब 1.17 लाख रुपये और 30वें साल में लगभग 2.42 लाख रुपये तक पहुंच सकती है. यह गणना केवल सालाना इंक्रीमेंट के प्रभाव को समझाने के लिए है. वास्तविक वेतन 8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिशों और सरकार के फैसले पर निर्भर करेगा.

7 फीसदी इंक्रीमेंट हुआ तो अंतर और बड़ा

अगर सालाना इंक्रीमेंट की दर 7 फीसदी हो जाती है, तो लंबी अवधि में इसका प्रभाव और ज्यादा दिखाई देगा. 56,100 रुपये की शुरुआती मूल वेतन के उदाहरण में 7 फीसदी सालाना वृद्धि होने पर पहले साल मूल वेतन करीब 60,000 रुपये हो सकती है. इसी तरह 15वें साल में यह करीब 1.55 लाख रुपये और 30वें साल में लगभग 4.27 लाख रुपये तक पहुंचने का उदाहरण दिया गया है. इससे समझ आता है कि फिटमेंट फैक्टर और सालाना इंक्रीमेंट दोनों का असर अलग-अलग समय पर दिखाई देता है. फिटमेंट फैक्टर वेतन को शुरुआत में बड़ा आधार देता है, जबकि ज्यादा सालाना इंक्रीमेंट लंबे समय में उस आधार को लगातार बढ़ाता है.

कर्मचारी संगठन कितने इंक्रीमेंट की मांग कर रहे हैं?

8वें वेतन आयोग के सामने अलग-अलग कर्मचारी संगठनों ने सालाना इंक्रीमेंट बढ़ाने की मांग रखी है. दिए गए प्रस्तावों के मुताबिक NC-JCM ने 6 फीसदी इंक्रीमेंट की मांग की है. AIDEF और FNPO ने भी 6 फीसदी की मांग रखी है. AINPSEF ने 7 फीसदी और IRTSA ने 5 फीसदी सालाना इंक्रीमेंट की मांग की है. यहां ध्यान रखना जरूरी है कि ये सभी कर्मचारी संगठनों की मांगें हैं. अभी सरकार या 8वें वेतन आयोग ने इनमें से किसी मांग को मंजूरी नहीं दी है.

बड़ा फिटमेंट फैक्टर या बड़ा इंक्रीमेंट, किसका फायदा ज्यादा?

कर्मचारियों के लिए दोनों का महत्व अलग है. बड़ा फिटमेंट फैक्टर मिलने पर संशोधित मूल वेतन में शुरुआत में ही बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है. इससे वेतन संरचना का नया आधार ऊंचा हो जाता है. वहीं ज्यादा सालाना इंक्रीमेंट का फायदा धीरे-धीरे सामने आता है. हर साल बढ़ा हुआ मूल वेतन अगले साल की बढ़ोतरी का आधार बनता है और लंबे समय में चक्रवृद्धि प्रभाव के कारण अंतर काफी बड़ा हो सकता है. इसलिए कर्मचारी संगठनों की कोशिश है कि 8वें वेतन आयोग में केवल शुरुआत में वेतन बढ़ाने पर ध्यान न रहे, बल्कि भविष्य में होने वाली सालाना बढ़ोतरी को भी बेहतर बनाया जाए.

8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया अभी बाकी

8वें वेतन आयोग का गठन नवंबर 2025 में किया जा चुका है. फिलहाल आयोग की बैठकों का दौर चल रहा है. अलग-अलग स्थानों पर बैठकों के जरिए कर्मचारियों और संबंधित पक्षों की मांगों पर चर्चा की जा रही है. दिए गए कार्यक्रम के अनुसार जयपुर में 31 अगस्त से 1 सितंबर 2026, चेन्नई में 7 और 8 सितंबर, पुडुचेरी में 9 सितंबर और चंडीगढ़ में 16 से 18 सितंबर तक बैठकें प्रस्तावित हैं. मुंबई की बैठक की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है, जबकि बेंगलुरु में 7 और 8 अक्टूबर को बैठक होनी है. इन बैठकों के बाद आयोग अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देगा और रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा. इसके बाद सरकार के स्तर पर इसे लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. इसलिए फिलहाल कर्मचारियों को फिटमेंट फैक्टर, इंक्रीमेंट या पेंशन नियम में बदलाव को लेकर किसी अंतिम घोषणा का इंतजार करना होगा.

कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए क्यों अहम है यह पूरा मामला?

8वें वेतन आयोग का असर केवल मौजूदा कर्मचारियों की मासिक आय तक सीमित नहीं रहेगा. इसकी सिफारिशों का प्रभाव पेंशन और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली राशि पर भी पड़ सकता है. एक तरफ कर्मचारी ज्यादा फिटमेंट फैक्टर और सालाना इंक्रीमेंट की उम्मीद कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पेंशनभोगी कम्यूटेड पेंशन की बहाली की अवधि घटाने की मांग कर रहे हैं. अगर इन मांगों में से कुछ को मंजूरी मिलती है, तो कर्मचारियों और पेंशनभोगियों दोनों की वित्तीय स्थिति पर इसका असर पड़ सकता है. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 8वें वेतन आयोग की अंतिम सिफारिशों में फिटमेंट फैक्टर कितना रखा जाता है, सालाना इंक्रीमेंट की दर में कोई बदलाव होता है या नहीं और पेंशन से जुड़े 15 साल के नियम पर सरकार क्या फैसला करती है. इन सभी मुद्दों पर अंतिम तस्वीर आयोग की रिपोर्ट और उसके बाद सरकार के फैसले से ही साफ होगी.