भारत और एशिया के सबसे बड़े रईस गौतम अडानी के समूह के बारे में चर्चा तेज है कि वह भारत में अपनी एयरलाइन शुरू करने की तैयारी कर रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसके लिए समूह ने सरकार से एक पुराने नियम में बदलाव की मांग की है. हालांकि, सरकार और अडानी समूह, दोनों की तरफ से अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
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यह चर्चा इसलिए भी अहम है क्योंकि अडानी समूह पहले से देश का सबसे बड़ा एयरपोर्ट ऑपरेटर है. समूह के पास 8 एयरपोर्ट हैं, जिनमें मुंबई एयरपोर्ट भी शामिल है. इसके साथ ही समूह ग्राउंड हैंडलिंग, पायलट ट्रेनिंग और विमान मेंटेनेंस जैसे कारोबार में भी मौजूद है, और ब्राजील की कंपनी एम्ब्रेयर के साथ भारत में विमान बनाने की योजना पर भी काम कर रहा है.
क्या है पूरा मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा नियम कहता है कि जो कंपनी दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े एयरपोर्ट चलाती है, वह किसी शेड्यूल एयरलाइन में 10% से ज्यादा हिस्सेदारी नहीं रख सकती. रिपोर्ट में कहा गया है कि अडानी समूह इस नियम में ढील चाहता है. अभी इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.
भारत का हवाई बाजार बड़ा, लेकिन मुश्किल
भारत का एविएशन सेक्टर दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में गिना जाता है. हर साल बड़ी संख्या में लोग हवाई यात्रा कर रहे हैं और देश में नए एयरपोर्ट बनाने की योजनाओं पर भी काम चल रहा है. इसके बाद भी एयरलाइन कारोबार भारत में आसान नहीं माना जाता.
बीते वर्षों में किंगफिशर एयरलाइंस, जेट एयरवेज, गो फर्स्ट, एयर डेक्कन, पैरामाउंट एयरवेज और एयर कोस्टा जैसी कई एयरलाइंस बंद हुईं या बाजार से बाहर हो गईं. इससे साफ है कि एयरलाइन शुरू करना एक बात है, लेकिन उसे लंबे समय तक सफल तरीके से चलाना अलग चुनौती है.
अडानी समूह को कहां दिख रहा है मौका
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अडानी समूह सिर्फ एयरपोर्ट चलाने तक सीमित नहीं है. वह हवाई यात्रा से जुड़े कई हिस्सों में पहले ही मौजूद है. अगर समूह एयरलाइन भी शुरू करता है, तो पूरा ढांचा एक ही समूह के भीतर आ सकता है.
अडानी समूह की मौजूदगी से जुड़े मुख्य बिंदु
• 8 एयरपोर्ट का संचालन.
• ग्राउंड हैंडलिंग कारोबार में मौजूदगी.
• पायलट ट्रेनिंग में मौजूदगी.
• विमान मेंटेनेंस कारोबार में मौजूदगी.
• एम्ब्रेयर के साथ भारत में विमान बनाने की योजना पर काम.
मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर देखा जाए तो यही बात अडानी समूह को दूसरे संभावित खिलाड़ियों से अलग बनाती है. पहले कई कंपनियां केवल विमान लेकर बाजार में उतरी थीं, जबकि अडानी समूह के पास इससे जुड़ी दूसरी सेवाओं का भी आधार पहले से मौजूद है.
फिर भी एयरलाइन कारोबार आसान क्यों नहीं है
विशेषज्ञ मानते हैं कि एयरलाइन कारोबार दुनिया के सबसे मुश्किल कारोबारों में गिना जाता है. ईंधन महंगा होने पर मुनाफा दबाव में आ जाता है. डॉलर महंगा होने पर लागत बढ़ जाती है. विमान की डिलीवरी में देरी हो जाए तो कारोबारी योजना प्रभावित होती है. यात्रियों की संख्या में कमी आए तो नुकसान बढ़ सकता है.
यानी, इस क्षेत्र में छोटी चूक भी बड़े नुकसान में बदल सकती है. यही वजह है कि मजबूत कारोबारी आधार होने के बाद भी सफलता की गारंटी नहीं मानी जाती.
बाजार में पहले से किसका दबदबा है
मौजूदा समय में भारत के घरेलू हवाई बाजार पर दो बड़े खिलाड़ियों का दबदबा बताया जाता है. एक तरफ इंडिगो है और दूसरी तरफ एयर इंडिया समूह. दोनों मिलकर घरेलू बाजार का करीब 90% हिस्सा नियंत्रित करते हैं. इंडिगो अकेले 60% से ज्यादा बाजार पर कब्जा रखती है.
ऐसे में किसी नए खिलाड़ी के लिए जगह बनाना आसान नहीं होगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर शुरुआती वर्षों में कोई नया खिलाड़ी 10 से 15 फीसदी बाजार हिस्सेदारी भी हासिल कर ले, तो उसे बड़ी सफलता माना जाएगा. इंडिगो और एयर इंडिया जैसे खिलाड़ियों को सीधी चुनौती देना 1 या 2 साल का काम नहीं, बल्कि 10 साल की लंबी दौड़ हो सकती है.
सरकार और बाजार के लिए बहस का मुद्दा
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल हितों के टकराव को लेकर उठ रहा है. अगर कोई समूह एयरपोर्ट भी चलाए और अपनी एयरलाइन भी शुरू करे, तो बाकी एयरलाइंस यह सवाल उठा सकती हैं कि कहीं स्लॉट, पार्किंग या दूसरी सुविधाओं में उसकी अपनी एयरलाइन को फायदा तो नहीं मिलेगा.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार का पक्ष यह है कि अगर नियमों में बदलाव होता है, तो ऐसी व्यवस्था बनाई जाएगी जिससे किसी एयरलाइन को अनुचित फायदा न मिले. दूसरी तरफ, यह भी माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर बहस जल्दी खत्म नहीं होगी.
एम्ब्रेयर के साथ योजना का क्या मतलब हो सकता है
अडानी समूह ब्राजील की कंपनी एम्ब्रेयर के साथ भारत में विमान बनाने की योजना पर काम कर रहा है. अगर आगे चलकर भारत में एम्ब्रेयर के विमान बनने लगते हैं और समूह की अपनी एयरलाइन भी होती है, तो वही एयरलाइन इन विमानों की शुरुआती बड़ी ग्राहक बन सकती है. इस तरह एयरलाइन कारोबार सिर्फ टिकट बेचने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उससे जुड़े बड़े ढांचे को भी सहारा मिल सकता है.
निष्कर्ष
फिलहाल अडानी समूह की एयरलाइन योजना को लेकर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस संभावना ने भारतीय एविएशन सेक्टर में नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है. एक तरफ बड़ा बाजार, एयरपोर्ट नेटवर्क और जुड़े कारोबार में मौजूदगी अडानी समूह के पक्ष में दिखती है. दूसरी तरफ ऊंची लागत, कड़ी प्रतिस्पर्धा, पुराने नियम और हितों के टकराव जैसे सवाल इस राह को कठिन बनाते हैं. अगर समूह इस क्षेत्र में उतरता है, तो असली चुनौती एयरलाइन शुरू करना नहीं, बल्कि कई साल तक टिके रहकर मजबूत जगह बनाना होगी.
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