15 दिनों में बैंकों में आए करीब 7 लाख करोड़ रुपये. आखिर कहां से आया इतना पैसा ?

चिराग ठाकुर

12 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 12 2026 5:41 PM)

सिर्फ 15 दिनों में बैंकों में 6.97 लाख करोड़ रुपये की नई जमा आई. जानिए क्वार्टर एंड, विदेशी पूंजी और बढ़ती नकदी का EMI, FD और बाजार पर क्या असर हो सकता है.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

जून अंत में बैलेंस शीट बेहतर दिखाने के लिए बैंक जमा बढ़ाया

विदेशी निवेश बढ़ाने और रुपये को संभालने वाले कदम असरदार रहे

विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा, जिससे बाहरी पैसे की आमद का संकेत मिला

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में सिर्फ 15 दिनों के भीतर करीब 6.97 लाख करोड़ रुपये की नई जमा (Deposit) दर्ज की गई है. यह बढ़ोतरी इतनी बड़ी है कि इसे पिछले 29 साल की तीसरी सबसे बड़ी पखवाड़े की जमा वृद्धि माना जा रहा है. पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि देश में अचानक पैसों की बाढ़ आ गई है. लेकिन इसके पीछे कई वजहें हैं. इनमें बैंकों की तिमाही खत्म होने से पहले की रणनीति, विदेशी पूंजी का प्रवाह और बैंकिंग सिस्टम में बेहतर होती लिक्विडिटी शामिल है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि EMI या FD की ब्याज दरों में तुरंत कोई बदलाव होने वाला है. लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि बैंकिंग सिस्टम की स्थिति पहले के मुकाबले अधिक मजबूत दिखाई दे रही है.

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SBI Research ने क्या बताया?

SBI Research की रिपोर्ट के मुताबिक 30 जून को खत्म हुए 15 दिनों के दौरान भारतीय बैंकिंग सिस्टम में करीब 6.97 लाख करोड़ रुपये की नई जमा दर्ज हुई. रिपोर्ट के अनुसार यह पिछले 29 वर्षों की तीसरी सबसे बड़ी पखवाड़े की बढ़ोतरी है. यह आंकड़ा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इतनी बड़ी मात्रा में जमा बढ़ना आमतौर पर रोजमर्रा की बैंकिंग गतिविधियों का हिस्सा नहीं होता.

आखिर इतना पैसा आया कहां से?

रिपोर्ट के मुताबिक इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह जून महीने का Quarter-End रहा. हर तिमाही के अंत में बैंक अपनी बैलेंस शीट को मजबूत दिखाने के लिए ज्यादा से ज्यादा डिपॉजिट जुटाने की कोशिश करते हैं. इसी प्रक्रिया को Deposit Mobilisation कहा जाता है. रिपोर्ट का अनुमान है कि कुल बढ़ोतरी में करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये से 4 लाख करोड़ रुपये तक सिर्फ Quarter-End Deposit Mobilisation की वजह से आए. यानी रिकॉर्ड जमा का बड़ा हिस्सा बैंकों की तिमाही समाप्त होने से पहले की गतिविधियों का नतीजा माना जा रहा है.

विदेशी पूंजी ने भी निभाई बड़ी भूमिका

रिपोर्ट के मुताबिक बाकी रकम विदेशी पूंजी के प्रवाह से जुड़ी हो सकती है. हाल के समय में सरकार और RBI ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने और रुपये को मजबूती देने के लिए कई कदम उठाए थे. इन प्रयासों के बाद भारत में करीब 7 अरब डॉलर का FII निवेश आया. वहीं Debt FAR के जरिए करीब 2.7 अरब डॉलर का निवेश दर्ज किया गया. रिपोर्ट के अनुसार कुल विदेशी पूंजी का प्रवाह लगभग 15 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. यानी बैंकिंग सिस्टम में आई रकम सिर्फ घरेलू स्रोतों से नहीं, बल्कि विदेशी निवेश के जरिए भी बढ़ी.

Forex Reserve में भी दिखा असर

विदेशी पूंजी के बढ़ते प्रवाह का असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दिखाई दिया. इसी अवधि के दौरान देश के Forex Reserve में करीब 4.4 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई. यह संकेत देता है कि RBI भी अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखने की दिशा में काम कर रहा है.

कंपनियां भी ले रही हैं ज्यादा कर्ज

रिपोर्ट में सिर्फ बैंक डिपॉजिट की बात नहीं की गई है. इसमें यह भी बताया गया है कि कंपनियों की ओर से उधारी लेने की रफ्तार भी बढ़ी है. FY27 की पहली तिमाही में Commercial Paper, यानी कंपनियों द्वारा लिया जाने वाला अल्पकालिक कर्ज, 55 महीनों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. इसी दौरान बैंकों का नया कर्ज भी बढ़कर 5.6 लाख करोड़ रुपये हो गया. पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा करीब 2.4 लाख करोड़ रुपये था. इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां नए निवेश और प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा फंड जुटा रही हैं.

बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी हुई मजबूत

रिपोर्ट के मुताबिक पहले बैंक अपनी फंडिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए Certificates of Deposit (CD) के जरिए ज्यादा उधारी लेते थे. लेकिन अब रिकॉर्ड डिपॉजिट आने के बाद बैंकों के पास नकदी की स्थिति पहले के मुकाबले अधिक आरामदायक हो सकती है. इसका मतलब यह है कि बैंकों को बाजार से ऊंची ब्याज दरों पर पैसा जुटाने की जरूरत कम पड़ सकती है.

आम लोगों पर क्या होगा असर?

बैंकों में डिपॉजिट बढ़ने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बेहतर होती है. जब बैंकों के पास पर्याप्त नकदी होती है, तब उन्हें महंगे स्रोतों से फंड जुटाने की जरूरत कम पड़ती है. हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि आपकी EMI तुरंत कम हो जाएगी या FD पर मिलने वाला ब्याज तुरंत बदल जाएगा. इन फैसलों पर RBI की Monetary Policy और बैंकों की अपनी रणनीति का असर होता है. यानी फिलहाल आम ग्राहकों के लिए यह बदलाव सीधे तौर पर दिखाई नहीं देगा, लेकिन मजबूत लिक्विडिटी भविष्य में बैंकिंग सिस्टम के लिए सकारात्मक मानी जा सकती है.

आगे क्या संकेत मिल रहे हैं?

करीब 7 लाख करोड़ रुपये की रिकॉर्ड जमा को सिर्फ एक बड़ा आंकड़ा मानकर नहीं देखा जा सकता. यह इस बात का भी संकेत हो सकता है कि भारत में विदेशी निवेशकों का भरोसा मजबूत हो रहा है. बैंकिंग सिस्टम में नकदी की स्थिति बेहतर हो रही है और कंपनियां भी निवेश तथा कर्ज लेने के मामले में ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रही हैं. हालांकि यह पूरा आकलन SBI Research की रिपोर्ट पर आधारित है. आने वाले महीनों के बैंकिंग और आर्थिक आंकड़े ही बताएंगे कि यह तेजी अस्थायी थी या लंबे समय तक बनी रहने वाली प्रवृत्ति साबित होती है.