बैंक ऑफ बड़ौदा ने NMC हेल्थकेयर मामले में 600 मिलियन डॉलर यानी करीब ₹5,700 करोड़ का आउट-ऑफ-कोर्ट सेटलमेंट किया है. अब इस समझौते को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं और इस पर अलग-अलग दावे और प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. एक तरफ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बैंक की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, वहीं बैंक ऑफ बड़ौदा का कहना है कि उसने किसी भी तरह की गलती या कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है और ये समझौता सिर्फ लंबे कानूनी विवाद को खत्म करने के लिए किया गया.
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क्या है पूरा मामला?
साल 2019 में UAE की हेल्थकेयर कंपनी NMC Healthcare पर अपने कर्ज को कम दिखाने का आरोप लगा था. बाद में सामने आया कि कंपनी पर 5.4 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज था, जिसकी सही जानकारी नहीं दी गई थी. इसके बाद NMC दिवालिया प्रक्रिया में चली गई और कई बैंकों के साथ कानूनी विवाद शुरू हो गया.इसी मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा की अबू धाबी शाखा का नाम भी सामने आया. कुछ विदेशी अदालतों में दायर दावों में आरोप लगाया गया कि बैंक ने NMC और उससे जुड़ी कंपनियों के साथ ऐसे बैंकिंग लेन-देन किए, जिनसे कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति छिपी रही. साथ ही एंटी मनी लॉन्ड्रिंग (AML), KYC और ड्यू डिलिजेंस नियमों के पालन पर भी सवाल उठाए गए.
बैंक ऑफ बड़ौदा ने क्या कहा?
- NMC Health PLC, NMC Healthcare Ltd. और NMC Holding Ltd. के Joint Administrators के साथ कोर्ट के बाहर समझौता किया गया है
- समझौते के तहत बैंक ने 600 मिलियन डॉलर (करीब ₹5,700 करोड़) का भुगतान किया है
- यह समझौता किसी भी गलती, धोखाधड़ी या कानूनी जिम्मेदारी को स्वीकार किए बिना किया गया है
- इसका मकसद वर्षों से चल रहे मुकदमों, अनिश्चितता और कानूनी खर्च को खत्म करना था
- समझौते के बाद ADGM और इंग्लैंड एंड वेल्स हाई कोर्ट में बैंक के खिलाफ चल रहे मुकदमे खत्म हो गए हैं
- समझौते की शर्तें गोपनीय हैं क्योंकि दूसरे पक्षों से जुड़े मामले अभी भी विचाराधीन हैं
- मूल डिफॉल्टरों के खिलाफ बैंक की रिकवरी की कार्रवाई भारत और विदेश में जारी रहेगी
बैंक के मुनाफे पर कितना असर पड़ा?
बैंक ने बताया कि इस सेटलमेंट का पूरा असर जून 2026 तिमाही के नतीजों में शामिल कर लिया गया है. इस भुगतान के बाद बैंक का शुद्ध लाभ ₹1,278 करोड़ रहा. अगर ये असाधारण खर्च नहीं होता तो बैंक का शुद्ध लाभ ₹5,528 करोड़ होता. बैंक ने ये भी कहा कि उसने अपना ₹2,500 करोड़ का फ्लोटिंग प्रोविजन नहीं छुआ है और उसे भविष्य की जरूरतों के लिए बरकरार रखा है.
मीडिया रिपोर्ट्स में क्या दावे किए गए?
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अबू धाबी की अदालत के दस्तावेजों में बैंक पर NMC की वास्तविक देनदारियां छिपाने, AML नियमों के उल्लंघन और अन्य अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे. रिपोर्ट्स में यह सवाल भी उठाया गया कि जब अन्य बैंक रिकवरी की कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, तब बैंक ऑफ बड़ौदा ने समझौते का रास्ता क्यों चुना. हालांकि, अब तक किसी अदालत ने इन आरोपों पर बैंक को अंतिम रूप से दोषी नहीं ठहराया है. दूसरी ओर बैंक ऑफ बड़ौदा का कहना है कि उसने किसी भी तरह की गलती, धोखाधड़ी या कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है.
आगे क्या?
फिलहाल NMC विवाद में बैंक ऑफ बड़ौदा का अदालत के बाहर समझौता हो चुका है. लेकिन इस मामले को लेकर सार्वजनिक चर्चा जारी है. निवेशकों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि बैंक आगे अपनी रिकवरी प्रक्रिया में कितना सफल रहता है और इस समझौते का उसके वित्तीय प्रदर्शन पर लंबी अवधि में क्या असर पड़ता है.
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