Crude Oil: पश्चिम एशिया में एक बार फिर बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है. अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य घटनाक्रम के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है. ब्रेंट क्रूड 92 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है, जिससे दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ गई है. भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति सिर्फ महंगे तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर महंगाई, आयात बिल और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.
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92 डॉलर के पार पहुंचा ब्रेंट क्रूड
गुरुवार को इंटरकांटिनेंटल एक्सचेंज पर सितंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड कॉन्ट्रैक्ट दोपहर के कारोबार में 92.50 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखाई दिया. यह पिछले कारोबारी सत्र की क्लोजिंग के मुकाबले 2.33 प्रतिशत अधिक था. इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में भी तेल की कीमतों में जोरदार उछाल देखने को मिला था. कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 8 प्रतिशत चढ़कर 90.80 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था और आखिर में 90.74 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था. लगातार दूसरे दिन तेजी ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी है.
अमेरिका-ईरान तनाव बना सबसे बड़ी वजह
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेजी की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में तेजी से बदलता भू-राजनीतिक माहौल है. जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर तेहरान की ओर से किए गए हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान पर जवाबी कार्रवाई की. इसके बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया.
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी हमलों के दौरान ईरान के कई इलाकों में विस्फोटों की खबरें सामने आईं. इस घटनाक्रम ने यह आशंका बढ़ा दी कि यदि संघर्ष और गहराया तो इसका असर सीधे तेल उत्पादन और ऊर्जा ढांचे पर पड़ सकता है. यही वजह है कि निवेशकों ने तेल की खरीद बढ़ा दी और कीमतों में तेजी आ गई.
इजरायल-लेबनान मोर्चे ने भी बढ़ाई चिंता
सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ही नहीं, बल्कि इजरायल और लेबनान से जुड़े घटनाक्रम ने भी बाजार की चिंता बढ़ा दी है. इजरायल की सेना ने साफ संकेत दिया है कि जब तक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती, तब तक दक्षिणी लेबनान के कब्जे वाले क्षेत्रों से सैनिकों की वापसी नहीं होगी. इससे यह संदेश गया कि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द खत्म होने की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है.
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयात करने वाला देश है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो सबसे पहले देश का आयात बिल बढ़ेगा. इसके बाद ईंधन की लागत बढ़ने से परिवहन महंगा हो सकता है, जिसका असर रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है. यानी महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका बढ़ जाती है.
आयात बिल बढ़ने का खतरा
अनुमानों के अनुसार यदि पूरे एक साल तक कच्चे तेल की कीमतों में हर बैरल पर केवल 1 डॉलर की बढ़ोतरी बनी रहती है, तो भारत के आयात बिल में करीब 18,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ जुड़ सकता है. भारत का सालाना कच्चा तेल आयात बिल लगभग 120 अरब डॉलर के आसपास है. यह देश के कुल मर्चेंडाइज आयात का बड़ा हिस्सा है. ऐसे में तेल की कीमतों में हर बढ़ोतरी का असर सीधे विदेशी मुद्रा खर्च और चालू खाते पर पड़ सकता है.
महंगाई पर भी बढ़ सकता है दबाव
ऊंचे तेल भाव सिर्फ सरकारी खर्च नहीं बढ़ाते, बल्कि आम लोगों की जेब पर भी असर डालते हैं. ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के उत्पादों तक पहुंच सकता है. हाल के महीनों में खुदरा महंगाई पहले ही बढ़कर 4.3 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. ऐसे में अगर कच्चा तेल लगातार महंगा रहता है तो महंगाई को नियंत्रित रखना नीति निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकता है.
रूस से तेल खरीद पर भी बढ़ सकती है मुश्किल
भारत के सामने एक और संभावित चुनौती अमेरिकी सीनेट में प्रस्तावित कानून है. इस प्रस्ताव के तहत रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कही गई है. भारत फिलहाल अपने कुल कच्चे तेल आयात का आधे से अधिक हिस्सा रूस से खरीद रहा है. यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो भारत की ऊर्जा खरीद रणनीति और लागत दोनों प्रभावित हो सकती हैं.
समुद्री रास्ते फिलहाल खुले, लेकिन जोखिम बरकरार
तनाव बढ़ने के बावजूद दुनिया के दो सबसे अहम समुद्री ऊर्जा मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही फिलहाल जारी है. हालांकि जहाजों का ट्रैफिक युद्ध से पहले के स्तर तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन फिलहाल सप्लाई पूरी तरह बाधित नहीं हुई है. इसके बावजूद बाजार में यह आशंका बनी हुई है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो इन समुद्री मार्गों पर भी असर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
आगे क्या रहेगा सबसे अहम?
अब बाजार की नजर पूरी तरह पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर रहेगी. अगर अमेरिका, ईरान और क्षेत्र के अन्य देशों के बीच तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है. दूसरी ओर यदि हालात सामान्य होने लगते हैं तो बाजार में कुछ राहत लौट सकती है.
फिलहाल भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा लागत को नियंत्रित रखने, महंगाई पर नजर बनाए रखने और आयात बिल के दबाव को संभालने की होगी. आने वाले दिनों में तेल बाजार की चाल सिर्फ वैश्विक अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि भारतीय बाजार और आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी बड़ा असर डाल सकती है.
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