देश में बढ़ती महंगाई के बीच अब तांबे की कमी की खबर ने नई चिंता बढ़ा दी है. तांबा ऐसी धातु है जिसका इस्तेमाल घरों से लेकर फैक्ट्रियों तक बहुत बड़े पैमाने पर होता है. ऐसे में इसकी कीमत बढ़ने का असर आगे चलकर कई सामानों की लागत पर पड़ सकता है.
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रिपोर्ट्स के मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े तांबा उत्पादक देश चिली में उत्पादन 15 से 20 फीसदी तक गिरा है. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तांबे के भाव चढ़ने लगे हैं. मंगलवार यानी 14 जुलाई को तांबा वायदा भाव 6.25 डॉलर प्रति पाउंड के ऊपर पहुंच गया, जो करीब 3 हफ्तों के ऊंचे स्तर के आसपास है.
तांबा क्यों जरूरी है
तांबे का इस्तेमाल रोजमर्रा की कई चीजों में होता है. इसी वजह से इसकी कमी का असर सिर्फ एक सेक्टर तक सीमित नहीं रहता.
- घर की बिजली की वायरिंग में तांबा लगता है.
- मोबाइल चार्जर, पंखे की मोटर, फ्रिज और एसी के कई हिस्सों में तांबा इस्तेमाल होता है.
- कारों के इलेक्ट्रिक सिस्टम में तांबा लगता है.
- इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल, पवन ऊर्जा परियोजनाएं और बड़े डाटा सेंटर भी तांबे पर काफी निर्भर हैं.
चिली में उत्पादन क्यों घटा
रिपोर्ट्स के अनुसार चिली में तांबा उत्पादन घटने की एक नहीं, कई वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह पानी की कमी बताई जा रही है, क्योंकि खदानों से तांबा निकालने में काफी पानी लगता है.
दूसरी वजह तकनीकी दिक्कतें हैं. कई खदानों में मशीनों की मरम्मत करनी पड़ी और कुछ जगह अनियोजित रखरखाव करना पड़ा. इससे उत्पादन रुक-रुककर हुआ.
तीसरी वजह अयस्क में बदलाव है. कई खदानों में पुराने तरह के अयस्क से नए तरह के अयस्क की ओर बदलाव चल रहा है. इस दौरान पहले जैसी रफ्तार से उत्पादन नहीं हो पाता.
चौथी वजह मजदूरों से जुड़े विवाद हैं. कई खदानों में श्रमिकों और कंपनियों के बीच तनाव बना हुआ है. इसका असर भी उत्पादन पर पड़ा है.
बड़ी खदानों में कितनी गिरावट आई
यह असर सिर्फ छोटी खदानों तक सीमित नहीं है. दुनिया की सबसे बड़ी तांबा खदानों में शामिल एस्कोंडिडा का उत्पादन 17.6 फीसदी गिरकर 1 लाख 8 हजार 800 टन रह गया है. यह खदान बीएचपी के नियंत्रण में है.
दूसरी बड़ी खदान कोलाहुआसी का उत्पादन भी 19.3 फीसदी गिरकर 31 हजार टन रह गया. बड़ी खदानों में गिरावट आने से वैश्विक आपूर्ति पर सीधा असर पड़ता है.
कीमतें क्यों बढ़ रही हैं
आसान भाषा में समझें तो जरूरत लगभग पहले जैसी बनी हुई है, लेकिन सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता देश से सप्लाई कम हो रही है. जब बाजार में माल कम पहुंचे और मांग बनी रहे, तो कीमतों पर दबाव बढ़ता है. तांबे के साथ अभी यही स्थिति बनती दिख रही है.
चिली की अर्थव्यवस्था पर असर
तांबा चिली की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है. देश के कुल तांबा निर्यात में इसकी हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी है. वहीं देश की जीडीपी में इसका योगदान 10 फीसदी से ज्यादा माना जाता है.
ऐसे में उत्पादन कम होने का असर सरकार की कमाई, निर्यात और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल चिली का मासिक आर्थिक गतिविधि सूचकांक भी कमजोरी दिखा रहा है, जिसकी एक बड़ी वजह खनन क्षेत्र की सुस्ती मानी जा रही है.
भारत पर क्या असर पड़ सकता है
अगर दुनिया में तांबे की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो उन कंपनियों की लागत बढ़ सकती है जो बड़ी मात्रा में तांबा इस्तेमाल करती हैं.
- बिजली के उपकरण बनाने वाली कंपनियां.
- इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने वाली कंपनियां.
- ऑटोमोबाइल कंपनियां, खासकर इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली कंपनियां.
- कई तरह के औद्योगिक सामान बनाने वाले उद्योग.
हालांकि किसी भी सामान की कीमत सिर्फ तांबे से तय नहीं होती. उसमें दूसरी लागतें भी शामिल होती हैं. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर चीज तुरंत महंगी हो जाएगी. लेकिन अगर तांबा लंबे समय तक महंगा रहता है, तो कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है.
बाजार की नजर आगे किस पर है
तांबा बाजार इस समय सिर्फ चिली की खबरों पर नहीं, बल्कि वैश्विक तनाव पर भी नजर रखे हुए है. निवेशकों की नजर मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव पर भी बनी हुई है. जब वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, तो जिंस बाजार में उतार-चढ़ाव तेज हो जाता है.
फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि चिली अपने तांबा उत्पादन को कितनी जल्दी सामान्य स्तर पर ला पाता है. अगर गिरावट लंबी चली, तो तांबे के भाव में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है और इसका असर दुनिया भर की सप्लाई चेन और कई उद्योगों पर दिख सकता है.
कुल मिलाकर, तांबे की यह कमी सिर्फ एक देश की समस्या नहीं है. चिली में उत्पादन घटने से यह साफ हुआ है कि पानी, खनन और श्रमिकों से जुड़ी दिक्कतें वैश्विक बाजार को सीधे प्रभावित कर सकती हैं. आने वाले समय में तांबे की कीमतों और उससे जुड़ी लागत पर नजर रखना जरूरी होगा.
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