कभी दुनिया की "फैक्ट्री" कहलाने वाला चीन आज एक अजीब आर्थिक स्थिति से गुजर रहा है. एक तरफ उसके Export लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ उसकी आर्थिक विकास दर लगातार कमजोर हो रही है. आम तौर पर माना जाता है कि जब किसी देश का निर्यात बढ़ता है तो उसकी अर्थव्यवस्था भी तेजी से आगे बढ़ती है. लेकिन चीन का मौजूदा हाल इस धारणा से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखा रहा है.
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इसी दौरान भारत ने भी ब्रिटेन के साथ Free Trade Agreement लागू किया है, जिसके पहले ही दिन करीब 14 करोड़ डॉलर का निर्यात दर्ज हुआ. ऐसे में एक तरफ चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है और दूसरी तरफ भारत वैश्विक व्यापार में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
तो आखिर चीन की अर्थव्यवस्था में ऐसा क्या हो रहा है कि Export रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन Growth लगातार कमजोर हो रही है. और क्या इससे भारत को कोई बड़ा फायदा मिल सकता है.
तीन साल की सबसे धीमी आर्थिक रफ्तार
- अप्रैल-जून तिमाही में चीन की GDP Growth घटकर सिर्फ 4.3% रह गई. यह पिछले तीन वर्षों की सबसे धीमी आर्थिक रफ्तार है.
- इससे पहले जनवरी-मार्च तिमाही में चीन की विकास दर 5% रही थी. यानी सिर्फ तीन महीने के भीतर ही आर्थिक गति और कमजोर हो गई.
- अगर भारत से तुलना करें तो इसी अवधि में भारत की GDP Growth 7.8% रही. यानी फिलहाल आर्थिक विकास की रफ्तार के मामले में भारत चीन से आगे दिखाई दे रहा है.
Export लगातार बढ़ रहा है, फिर भी Economy क्यों कमजोर?
चीन की सबसे बड़ी ताकत उसका Manufacturing Sector और Export रहा है. यही वजह है कि मौजूदा समय में भी चीन का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है.जून महीने में चिप्स, बैटरी और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की मजबूत वैश्विक मांग के कारण चीन के Export में सालाना 27% की बढ़ोतरी दर्ज हुई.साल के पहले छह महीनों में कुल Export 20% से अधिक बढ़ चुका है.
इतना ही नहीं, चीन का Trade Surplus यानी Export और Import के बीच का अंतर भी 125 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया. इसका मतलब साफ है कि दुनिया के कई देशों में चीन का सामान पहले की तरह बिक रहा है. लेकिन इसके बावजूद चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत नहीं दिख रही.
पहली बड़ी वजह. प्रॉपर्टी मार्केट का लंबा संकट
चीन के आर्थिक संकट की सबसे बड़ी वजह उसका Real Estate Sector माना जा रहा है. कई वर्षों से वहां प्रॉपर्टी मार्केट दबाव में है. घरों की कीमतों में लगातार गिरावट आई है और Construction Sector पर इसका बड़ा असर पड़ा है. इसका नतीजा यह हुआ कि निर्माण क्षेत्र में 1 करोड़ 40 लाख से ज्यादा लोगों की नौकरियां खत्म हो गईं. जब किसी परिवार की सबसे बड़ी संपत्ति यानी घर की कीमत कम होने लगती है, तो लोग खर्च करने के बजाय बचत करना शुरू कर देते हैं. यही वजह है कि घरेलू बाजार में मांग लगातार कमजोर होती चली गई.
दूसरी वजह. लोग खर्च करने से बच रहे हैं
चीन की अर्थव्यवस्था की दूसरी बड़ी समस्या कमजोर Consumer Spending है. लोग महंगे सामान खरीदने से बच रहे हैं और सस्ते विकल्पों की तरफ बढ़ रहे हैं. कई परिवार अपनी रोजमर्रा की खरीदारी में भी खर्च कम करने की कोशिश कर रहे हैं.
सोशल मीडिया पर भी लोग पैसे बचाने के तरीके साझा कर रहे हैं. इससे साफ संकेत मिलता है कि उपभोक्ताओं का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा.
जब लोग कम खरीदारी करते हैं तो कंपनियों की बिक्री घटती है. बिक्री घटने का असर मुनाफे पर पड़ता है और इसका सीधा असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है.
तीसरी वजह. रोजगार को लेकर बढ़ती चिंता
चीन में Artificial Intelligence, Semiconductor और Electric Vehicle जैसे सेक्टर अभी भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन इन क्षेत्रों के बाहर रोजगार की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है. तकनीक आधारित कंपनियां आगे बढ़ रही हैं, लेकिन उनका फायदा बड़ी संख्या में आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा. ऐसे में बेरोजगारी और Underemployment जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं. यानी नई टेक्नोलॉजी से कंपनियों की उत्पादकता बढ़ रही है, लेकिन रोजगार का लाभ व्यापक स्तर पर नहीं दिख रहा.
Export मजबूत, लेकिन घरेलू अर्थव्यवस्था कमजोर.
अगर पूरी तस्वीर को एक साथ देखें तो चीन की Export Machine अभी भी पूरी रफ्तार से काम कर रही है.
- दुनिया में चीन का सामान बिक रहा है.
- लेकिन देश के भीतर तस्वीर अलग है.
- प्रॉपर्टी मार्केट संकट में है.
- लोग खर्च कम कर रहे हैं.
- रोजगार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
इसी वजह से Export में तेज बढ़ोतरी के बावजूद चीन की आर्थिक विकास दर कमजोर पड़ रही है.
क्या इससे भारत को फायदा मिल सकता है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था लंबे समय तक दबाव में रहती है, तो क्या दुनिया की कंपनियां Manufacturing और Investment के लिए भारत की तरफ रुख करेंगी.
इसका जवाब पूरी तरह हां या ना में नहीं है.
चीन आज भी दुनिया की सबसे बड़ी Manufacturing Power बना हुआ है. उसकी Supply Chain, Infrastructure और उत्पादन क्षमता को कोई भी देश कुछ ही वर्षों में पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकता. लेकिन अगर चीन की घरेलू मांग कमजोर रहती है और कंपनियों पर दबाव बढ़ता है, तो कई वैश्विक कंपनियां अपनी Supply Chain को Diversify करने के लिए दूसरे देशों की तलाश जरूर तेज कर सकती हैं.
यहीं पर भारत के सामने बड़ा अवसर बनता है. हाल के समय में भारत ने Manufacturing पर फोकस बढ़ाया है. इसके अलावा UK के साथ लागू हुआ Free Trade Agreement और China+1 Strategy जैसी वैश्विक सोच भी भारत को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश कर रही है.
हालांकि सिर्फ चीन की कमजोरी से भारत को अपने आप फायदा नहीं मिलेगा. इसके लिए भारत को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, तेज सुधार और निवेश के अनुकूल माहौल लगातार बनाए रखना होगा. चीन की मौजूदा स्थिति यह दिखाती है कि केवल Export बढ़ने से किसी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो जाती. अगर घरेलू मांग कमजोर हो, प्रॉपर्टी सेक्टर संकट में हो और रोजगार की स्थिति दबाव में हो, तो आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है.
आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चीन अपनी घरेलू चुनौतियों से उबर पाता है या फिर वैश्विक कंपनियां धीरे-धीरे अपने निवेश और मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों में स्थानांतरित करना शुरू करती हैं. अगर ऐसा होता है, तो भारत के पास वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का एक बड़ा अवसर हो सकता है.
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