दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस समय एक उलझी हुई तस्वीर पेश कर रही है. एक तरफ उसका निर्यात तेजी से बढ़ रहा है और दुनिया भर में चीनी सामान की मांग बनी हुई है. दूसरी तरफ चीन की अपनी अर्थव्यवस्था की चाल धीमी पड़ती दिख रही है.
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अप्रैल से जून 2026 की तिमाही में चीन की जीडीपी (GDP) ग्रोथ 4.3 फीसदी रही. यह पिछले तीन साल की सबसे धीमी रफ्तार बताई जा रही है. इसी दौरान भारत की अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि निर्यात मजबूत होने के बाद भी चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था दबाव में क्यों है.
चीन और भारत के आंकड़े क्या कहते हैं
अप्रैल से जून 2026 में चीन की जीडीपी (GDP) ग्रोथ 4.3 फीसदी रही.जनवरी से मार्च 2026 की तिमाही में चीन की ग्रोथ 5 फीसदी थी.यानी सिर्फ तीन महीने में विकास दर में गिरावट आई.इसी दौरान भारत की अर्थव्यवस्था 7.8 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी.यह आंकड़ा अर्थशास्त्रियों की उम्मीद से भी कमजोर बताया गया.
आंकड़े साफ बताते हैं कि चीन की बाहरी मांग मजबूत है, लेकिन अंदरूनी मांग कमजोर पड़ रही है. यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा है. बाहर की दुनिया चीनी सामान खरीद रही है, लेकिन चीन के लोग पहले की तरह खर्च नहीं कर रहे हैं.
निर्यात में रिकॉर्ड, फिर भी दबाव
जून में चीन के निर्यात में पिछले साल के मुकाबले 27 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इस बढ़त में एआई (AI) से जुड़े सामान, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरियां और सेमीकंडक्टर चिप्स की बड़ी भूमिका रही. इन उत्पादों की दुनिया भर में मांग तेज बनी हुई है.
साल के पहले छह महीनों में चीन का कुल निर्यात 20 फीसदी से ज्यादा बढ़ा. साथ ही चीन का व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) 125 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया. यह उसके इतिहास के बड़े स्तरों में गिना जा रहा है. यानी फैक्ट्रियां चल रही हैं, सामान बिक रहा है और विदेशी कमाई भी आ रही है.
लेकिन दूसरी तस्वीर यह है कि इन मजबूत निर्यात आंकड़ों का फायदा चीन के आम लोगों की खर्च करने की ताकत में साफ नहीं दिख रहा है. यही वजह है कि कुल आर्थिक रफ्तार पर दबाव बना हुआ है.
पहली बड़ी वजह, प्रॉपर्टी बाजार का संकट
चीन का रियल एस्टेट सेक्टर कई साल से दबाव में है. घरों की कीमतें गिर रही हैं और नई इमारतों का काम धीमा पड़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक इस संकट की वजह से 1 करोड़ 40 लाख से ज्यादा निर्माण मजदूरों की नौकरी गई.
जिन लोगों ने पहले ऊंचे दाम पर घर खरीदे थे, उनके घरों की कीमत अब कम हो चुकी है. इससे लोगों का भरोसा भी प्रभावित हुआ है. ऐसे में वे नया घर खरीदने या बड़ा खर्च करने से बच रहे हैं. जब लोग खर्च कम करते हैं, तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी धीमी पड़ती है.
दूसरी बड़ी वजह, लोग खर्च रोक रहे हैं
खबर के अनुसार अंतरराष्ट्रीय तनाव, खासकर अमेरिका-ईरान तनाव, का असर चीन पर भी पड़ा. ईंधन महंगा हुआ. हालांकि चीन सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित करती है, फिर भी पिछले साल के मुकाबले ईंधन महंगा बताया गया है.
इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ा. यात्रा का खर्च बढ़ा और रोजमर्रा के खर्च भी ऊपर गए. सोशल मीडिया पर लोग पैसे बचाने के तरीके साझा कर रहे हैं. कई लोग महंगे ब्रांड छोड़कर सस्ते सामान खरीद रहे हैं. कई परिवारों की आमदनी में लंबे समय से खास बढ़ोतरी नहीं हुई है.
यानी लोगों के पास पैसा होने पर भी वे उसे खर्च करने के बजाय बचाकर रखना चाहते हैं. बाजार में खरीदारी कम होती है तो कारोबार पर असर पड़ता है. यही कमजोरी घरेलू मांग को नीचे खींच रही है.
तीसरी बड़ी वजह, रोजगार को लेकर चिंता
एआई, इलेक्ट्रिक वाहन और चिप बनाने वाली कंपनियां अच्छा कारोबार कर रही हैं. लेकिन बाकी क्षेत्रों में तस्वीर उतनी मजबूत नहीं है. कई उद्योगों में नौकरियां घट रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि नई तकनीक से बड़ी कंपनियों को फायदा मिल रहा है, लेकिन आम लोगों को उसका असर उतना नहीं मिल रहा.
यूरेशिया ग्रुप के चीन निदेशक डैन वांग के मुताबिक, एआई की वजह से कई जगह पारंपरिक नौकरियां खत्म हो रही हैं. इसका मतलब यह है कि जिन लोगों के पास पहले काम था, उनके पुराने कौशल की मांग कम हो रही है. रोजगार को लेकर यही अनिश्चितता लोगों को और सतर्क बना रही है.
कुल तस्वीर क्या है
एक तरफ चीन की फैक्ट्रियां दुनिया के लिए सामान बना रही हैं. निर्यात मजबूत है. एआई, इलेक्ट्रिक वाहन और चिप्स जैसे क्षेत्र अभी भी उसकी ताकत बने हुए हैं. दूसरी तरफ प्रॉपर्टी बाजार की कमजोरी, लोगों की घटी खरीदारी और रोजगार की चिंता उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रही है.
यही वजह है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इस समय मुश्किल दौर से गुजर रही है. आगे सबसे अहम बात यही होगी कि क्या चीन अपनी घरेलू मांग को फिर से मजबूत कर पाता है, या फिर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं ग्रोथ के मामले में उससे आगे बनी रहती हैं.
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