सोने की कीमतों में तेजी के बीच एक रिपोर्ट ने दुनियाभर के बाजारों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है. निवेश बैंक Goldman Sachs के एक अनुमान के मुताबिक, चीन जितना सोना आधिकारिक आंकड़ों में दिखा रहा है, उसकी वास्तविक खरीद इससे कहीं ज्यादा हो सकती है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन की गोल्ड खरीद आधिकारिक आंकड़ों से कई गुना ज्यादा हो सकती है. अब सवाल यह है कि क्या चीन वाकई बड़े पैमाने पर सोना जमा कर रहा है? अगर ऐसा है तो इसके पीछे उसकी रणनीति क्या है? और क्या चीन समेत दुनिया के केंद्रीय बैंकों की बढ़ती खरीदारी आने वाले समय में सोने की कीमतों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है?
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सोने और चांदी की कीमतों में तेजी जारी
सोमवार को कारोबारी सत्र के दौरान सोने और चांदी दोनों में तेजी देखने को मिली. खबर लिखे जाने तक MCX पर अगस्त डिलीवरी वाला सोना करीब 650 रुपये की बढ़त के साथ 1,41,630 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा था.वहीं सितंबर डिलीवरी वाली चांदी में करीब 2,500 रुपये की तेजी देखने को मिली और इसकी कीमत करीब 2,19,000 रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंच गई. बाजार में सोने की मजबूती के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. इनमें वैश्विक अनिश्चितता, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और Goldman Sachs की नई रिपोर्ट को अहम माना जा रहा है.
चीन की गोल्ड खरीद पर Goldman Sachs का बड़ा अनुमान
Goldman Sachs के मुताबिक, मई 2026 में चीन ने आधिकारिक तौर पर करीब 10 टन सोना खरीदने की जानकारी दी थी. लेकिन निवेश बैंक का अनुमान है कि चीन की वास्तविक खरीद इससे कहीं ज्यादा हो सकती है. रिपोर्ट के अनुसार, वास्तविक खरीद 48 टन से अधिक हो सकती है. यानी आधिकारिक आंकड़ों की तुलना में यह करीब पांच गुना ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया है. Goldman Sachs ने यह अनुमान London OTC यानी Over-the-Counter Gold Market के आंकड़ों के आधार पर लगाया है. बैंक का कहना है कि केवल आधिकारिक रिजर्व डेटा देखने से चीन की पूरी गोल्ड खरीद की तस्वीर सामने नहीं आती. हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह Goldman Sachs का अनुमान है. चीन की वास्तविक खरीद को लेकर आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं की गई है.
आखिर चीन इतना सोना क्यों खरीद रहा है?
अगर चीन वास्तव में बड़े पैमाने पर सोना जमा कर रहा है तो इसके पीछे सबसे बड़ी वजह डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति मानी जा रही है. पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने देखा कि रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देशों ने अपने रिजर्व मैनेजमेंट को लेकर नए सिरे से सोचना शुरू किया. कई देशों को यह महसूस हुआ कि केवल डॉलर आधारित विदेशी मुद्रा भंडार रखना जोखिम भरा हो सकता है. ऐसे में केंद्रीय बैंक धीरे-धीरे अपने रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं. चीन भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. सोना एक ऐसा एसेट माना जाता है, जो किसी एक देश की मुद्रा या वित्तीय प्रणाली पर पूरी तरह निर्भर नहीं होता.
दुनिया के केंद्रीय बैंक भी बढ़ा रहे हैं सोने की खरीद
सोना खरीदने की यह रणनीति सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है. दुनियाभर के कई केंद्रीय बैंक लगातार अपने गोल्ड रिजर्व को बढ़ा रहे हैं. Goldman Sachs के मुताबिक, मई में दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने कुल मिलाकर करीब 81 टन सोने की खरीदारी की. अगर पिछले तीन महीनों का औसत देखा जाए तो केंद्रीय बैंकों की खरीद करीब 67 टन प्रति महीना रही. वहीं 2022 से पहले यही औसत करीब 17 टन प्रति महीना हुआ करता था. यानी कुछ ही वर्षों में केंद्रीय बैंकों की गोल्ड खरीदारी में कई गुना बढ़ोतरी देखने को मिली है.
केंद्रीय बैंकों की खरीद से सोने को मिल रहा मजबूत सहारा
Goldman Sachs का मानना है कि केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी ने सोने की कीमतों के नीचे एक मजबूत सपोर्ट तैयार कर दिया है. आसान भाषा में समझें तो अगर ब्याज दरों में बढ़ोतरी या डॉलर की मजबूती के कारण सोने की कीमतों पर दबाव आता भी है, तो केंद्रीय बैंकों की खरीदारी गिरावट को सीमित कर सकती है. यही वजह है कि सोने में लंबी अवधि के लिए मजबूती की उम्मीद बनी हुई है.
ब्याज दरें और डॉलर अभी भी बड़ी चुनौती
हालांकि सोने की तेजी की राह पूरी तरह आसान नहीं है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर बाजार में अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है. आमतौर पर ऊंची ब्याज दरें डॉलर को मजबूत करती हैं और इसका असर सोने की कीमतों पर दबाव के रूप में देखने को मिलता है. लेकिन Goldman Sachs का मानना है कि यह असर सीमित अवधि के लिए हो सकता है. अगर केंद्रीय बैंकों की खरीदारी जारी रहती है और दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो सोने की लंबी अवधि की तेजी बरकरार रह सकती है.
Goldman Sachs ने दिया $4,900 का टारगेट
सोने की कीमतों को लेकर बड़े निवेश बैंक अभी भी सकारात्मक नजरिया बनाए हुए हैं. Goldman Sachs ने 2026 के अंत तक सोने के लिए 4,900 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस का लक्ष्य बरकरार रखा है. वहीं Bernstein ने भी 2026 के लिए अपना गोल्ड टारगेट बढ़ाकर 4,533 डॉलर प्रति औंस कर दिया है. इन अनुमानों से साफ है कि बड़े निवेश संस्थान अभी भी मान रहे हैं कि सोने की तेजी की कहानी खत्म नहीं हुई है.
क्या चीन अपनी पूरी गोल्ड खरीद दुनिया को नहीं बता रहा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन जानबूझकर अपनी पूरी गोल्ड खरीद दुनिया के सामने नहीं रख रहा है? इसका स्पष्ट जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है. Goldman Sachs ने केवल इतना अनुमान लगाया है कि चीन की वास्तविक खरीद आधिकारिक आंकड़ों से ज्यादा हो सकती है. इसके पीछे कई संभावनाएं बताई जा रही हैं. पहली यह कि चीन अपनी रिजर्व रणनीति को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं करना चाहता हो. दूसरी संभावना यह है कि कुछ खरीदारी ऐसी सरकारी संस्थाओं के जरिए हो रही हो, जो तुरंत केंद्रीय बैंक के आधिकारिक रिजर्व आंकड़ों में दिखाई नहीं देती. हालांकि इन संभावनाओं की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
क्या सोना नई ऊंचाइयों पर पहुंच सकता है?
अगर Goldman Sachs का अनुमान सही साबित होता है, तो चीन की गोल्ड खरीद सिर्फ एक निवेश फैसला नहीं बल्कि उसकी विदेशी मुद्रा रिजर्व रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत हो सकती है. इसके अलावा अगर दुनिया के दूसरे केंद्रीय बैंक भी लगातार सोना खरीदते रहते हैं, तो कीमतों को लंबे समय तक मजबूत समर्थन मिल सकता है. फिलहाल बाजार की नजर तीन बड़ी चीजों पर है. केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, अमेरिकी ब्याज दरों की दिशा और वैश्विक तनाव. यही तीन फैक्टर तय करेंगे कि आने वाले समय में सोना नई रिकॉर्ड ऊंचाइयों तक पहुंचता है या नहीं.
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