Crude Oil Price: कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच सोमवार को अचानक नरमी देखने को मिली. सऊदी अरब के तेल ठिकानों और एयरपोर्ट पर हमलों की खबरों ने जहां सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ाई हुई है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम करीब 2 फीसदी तक गिर गए. इससे बाजार में एक बार फिर सवाल उठने लगा है कि जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है, तो तेल की कीमतों में गिरावट क्यों आ रही है? क्या यह सिर्फ कुछ समय के लिए आई राहत है या फिर महंगे कच्चे तेल से दुनिया को थोड़ी राहत मिलने वाली है? कच्चे तेल की कीमतों में आई इस नरमी के पीछे शुक्रवार की तेज बढ़त के बाद मुनाफावसूली और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले से पहले निवेशकों की सतर्कता जैसे कारण अहम हैं. हालांकि, सऊदी अरब पर हमलों, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और तेल की सप्लाई में संभावित रुकावटों ने बाजार की चिंता अब भी बरकरार रखी है.
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WTI और Brent के दाम में कितनी गिरावट आई?
सोमवार को अमेरिकी कच्चे तेल WTI की कीमत 2.17 डॉलर यानी करीब 2.11 फीसदी गिरकर 101.09 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई. वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 2.16 डॉलर यानी 1.85 फीसदी टूटकर 114.50 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. यह गिरावट ऐसे समय आई है, जब कच्चा तेल हाल ही में छह महीने के ऊंचे स्तर के करीब पहुंच गया था. इससे पहले शुक्रवार को हूती विद्रोहियों के हमलों की आशंका के बीच तेल की कीमतों में करीब 3 डॉलर प्रति बैरल तक की तेजी आई थी. पूरे सप्ताह के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 6 फीसदी और WTI क्रूड लगभग 2.3 फीसदी चढ़ा था. शुक्रवार की तेजी के बाद सोमवार को कीमतों में आई गिरावट को बाजार में कुछ ठहराव के तौर पर देखा जा रहा है. जब किसी कमोडिटी के दाम तेजी से बढ़ते हैं, तो कई निवेशक ऊंचे स्तर पर अपना मुनाफा निकालने लगते हैं. इससे कीमतों पर दबाव बन सकता है. इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आगामी नीतिगत फैसले से पहले भी निवेशक सतर्क रुख अपना रहे हैं. हालांकि, कीमतों में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि तेल बाजार से संकट का खतरा टल गया है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण आने वाले दिनों में कीमतों में फिर तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
सऊदी अरब पर हमलों के बीच क्यों बढ़ी तेल सप्लाई की चिंता?
सऊदी अरब पर लगातार हो रहे हमले कच्चे तेल के बाजार के लिए बड़ी चिंता बने हुए हैं. शनिवार को हूती विद्रोहियों ने दावा किया कि उन्होंने सऊदी अरब के एक एयरपोर्ट और तेल ठिकानों को निशाना बनाया. दूसरी ओर, सऊदी अरब ने रविवार को कई मिसाइलों और ड्रोन को हवा में ही मार गिराने की जानकारी दी. इससे पहले हुए हमलों में सऊदी अरब के एक प्रमुख एयरपोर्ट को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई थी. रविवार को वहां कामकाज भी सीमित स्तर पर ही शुरू हो पाया. हूती विद्रोहियों ने आगे भी इस एयरपोर्ट को निशाना बनाने की धमकी दी है. तेल बाजार में सऊदी अरब की अहम भूमिका होने के कारण वहां के ऊर्जा ठिकानों की सुरक्षा पर उठने वाले सवाल सीधे कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं. अगर हमलों के कारण तेल उत्पादन, भंडारण या निर्यात की व्यवस्था प्रभावित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध तेल की मात्रा कम होने का खतरा बढ़ जाएगा. ऐसी स्थिति में खरीदारों के बीच सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है और कीमतों में तेजी आ सकती है. यही वजह है कि सोमवार को दाम गिरने के बावजूद बाजार में सतर्कता बनी हुई है.
क्या कच्चा तेल फिर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जाएगा?
अब निवेशकों और तेल कारोबारियों की नजर इस बात पर है कि पश्चिम एशिया में तनाव किस दिशा में आगे बढ़ता है. कच्चे तेल की कीमतों में आगे की चाल काफी हद तक तेल ठिकानों की सुरक्षा और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली आवाजाही पर निर्भर करेगी. ब्रेंट क्रूड पहले ही 117 डॉलर प्रति बैरल का स्तर पार कर चुका है. बाजार से जुड़े जानकारों का मानना है कि अगर तेल के ठिकानों पर हमले बढ़ते हैं या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही में गंभीर रुकावट आती है, तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के अहम समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है. यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से तेल की सप्लाई पर दबाव पड़ सकता है. इसके साथ ही, शिपिंग खर्च बढ़ने और सुरक्षा संबंधी दिक्कतों के कारण तेल की डिलीवरी महंगी हो सकती है. दूसरी तरफ, अगर संबंधित देशों के बीच तनाव कम करने के लिए कोई ठोस पहल होती है और सप्लाई को लेकर चिंताएं घटती हैं, तो तेल की कीमतों में गिरावट भी आ सकती है. ऐसे में आने वाले दिनों में बाजार की दिशा सिर्फ मौजूदा कीमतों से नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक घटनाक्रम से भी तय होगी.
एक्सपर्ट की सलाह: तेजी के पीछे भागने से बचें ट्रेडर्स
रेलिगेयर ब्रोकिंग के रिसर्च के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अजीत मिश्रा के मुताबिक, फिलहाल कच्चे तेल के बाजार का रुख तेजी की ओर है, लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव लगातार आने वाली खबरों से प्रभावित हो रहा है. उनका मानना है कि ट्रेडर्स को अचानक आने वाली तेजी देखकर जल्दबाजी में ट्रेड करने से बचना चाहिए. इसके बजाय उन्हें पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के संकेतों और हर सप्ताह जारी होने वाले तेल के स्टॉक से जुड़े आंकड़ों पर नजर रखनी चाहिए. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव, संभावित सैन्य कार्रवाई, सऊदी अरब पर हमले और समुद्री मार्गों की सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं कच्चे तेल की कीमतों को समर्थन दे रही हैं. ऐसे माहौल में किसी एक खबर के कारण कीमतों में अचानक तेजी या गिरावट आ सकती है. इसलिए ट्रेडर्स के लिए बाजार में जोखिम को समझना और बिना पर्याप्त जानकारी के तेजी के पीछे भागने से बचना अहम है.
3 नवंबर के बाद ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमले की आशंका
कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित करने वाला एक और बड़ा पहलू अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है. मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज में कमोडिटीज रिसर्च के हेड नवनीत दमानी के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और सऊदी अरब के आसपास बढ़ते हमलों ने तेल ठिकानों और निर्यात की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और इजरायल की ओर से 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाने की योजना पर विचार किए जाने की बात सामने आई है. इसमें नतांज के पास स्थित परमाणु ठिकानों का भी जिक्र किया गया है. ईरान ने भी चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका या इजरायल की ओर से हमला किया जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इस तरह की आशंकाएं तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ाती हैं, क्योंकि सैन्य कार्रवाई की स्थिति में उत्पादन और निर्यात से जुड़ी व्यवस्थाएं प्रभावित होने का जोखिम रहता है. हालांकि, संभावित हमलों से जुड़ी खबरों और वास्तविक घटनाओं के बीच अंतर करना जरूरी है. तेल की कीमतों पर इन खबरों का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तनाव किस स्तर तक पहुंचता है और क्या वास्तव में तेल की सप्लाई प्रभावित होती है.
G7 और IEA के तेल जारी करने के ऐलान का असर क्यों नहीं दिखा?
तेल की कीमतों को काबू में रखने और सप्लाई को लेकर चिंताएं कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कदम उठाए जा रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपने आपातकालीन भंडार से अतिरिक्त तेल जारी करने की बात कही है. वहीं, G7 देशों ने भी बाजार में 100 मिलियन बैरल अतिरिक्त तेल उपलब्ध कराने की घोषणा की है. इसके बावजूद तेल की कीमतों में तेजी को रोकना आसान साबित नहीं हुआ है. इसकी एक वजह यह है कि बाजार केवल घोषणाओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह देखता है कि अतिरिक्त तेल वास्तव में कब और कितनी मात्रा में उपलब्ध होगा. अगर किसी क्षेत्र में उत्पादन या निर्यात बाधित होने का खतरा बढ़ जाता है, तो आपातकालीन भंडार से तेल जारी करने का फैसला उस चिंता को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाता. बाजार को यह भरोसा चाहिए कि उपलब्ध सप्लाई लगातार बनी रहेगी और तेल की डिलीवरी में बड़ी बाधाएं नहीं आएंगी. रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के लिए रूसी डीजल की पहली खेप रवाना होने के बाद भी कीमतों में तेजी पर खास रोक नहीं लग पाई. इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल बाजार में सप्लाई बढ़ाने की घोषणाओं से ज्यादा महत्व वास्तविक उपलब्धता और परिवहन की स्थिति का है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और शिपिंग की दिक्कतें बनी हुई हैं अहम चुनौती
कच्चे तेल की सप्लाई केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं करती. तेल को एक देश से दूसरे देश तक सुरक्षित और समय पर पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होने वाली आवाजाही में कुछ सुधार के संकेत मिलने के बावजूद शिपिंग खर्च, परिवहन संबंधी मुश्किलों और सुरक्षा जोखिमों को लेकर चिंता बनी हुई है. अगर जहाजों को अपने रास्ते में सुरक्षा संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, तो तेल की डिलीवरी में देरी हो सकती है. इसके अलावा, शिपिंग और बीमा का खर्च बढ़ने से तेल की कुल लागत पर भी असर पड़ सकता है. यही वजह है कि तेल की सप्लाई बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद बाजार में कीमतों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. जब तक बाजार को यह भरोसा नहीं मिलता कि तेल का उत्पादन और निर्यात सामान्य तरीके से जारी रह सकता है, तब तक कीमतों पर दबाव बने रहने की आशंका रहेगी.
आगे कच्चे तेल की कीमतों में क्या देखना होगा?
फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट को स्थायी राहत मानना जल्दबाजी होगी. सोमवार को WTI और ब्रेंट क्रूड में नरमी जरूर आई, लेकिन सऊदी अरब पर हमले, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति और अमेरिकी फेडरल रिजर्व का फैसला बाजार के लिए अहम बने हुए हैं. अगर तनाव बढ़ता है और तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो कीमतें फिर तेजी पकड़ सकती हैं और ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर की ओर बढ़ सकता है. इसके उलट, अगर हालात सुधरते हैं और बाजार में तेल की उपलब्धता को लेकर भरोसा लौटता है, तो कीमतों में और गिरावट देखने को मिल सकती है. इसलिए फिलहाल तेल बाजार में सिर्फ एक दिन की तेजी या गिरावट के आधार पर आगे की दिशा तय करना मुश्किल है. आने वाले दिनों में भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वास्तविक सप्लाई की स्थिति ही कच्चे तेल की कीमतों की चाल तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाएगी.
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