E20 Petrol Economics: E20 पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं? सरकार, उपभोक्ता और एथेनॉल की पूरी इकोनॉमिक्स समझिए

तनीषा त्यागी

• 11:38 AM • 14 Jul 2026

E20 पेट्रोल पर बहस इसलिए बढ़ी है क्योंकि सरकार ऊर्जा सुरक्षा की बात कर रही है, लेकिन ग्राहकों को अभी न कीमत में राहत दिख रही है और न माइलेज में फायदा.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

E20 में 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल मिलाया जाता है

सरकार ने माना E20 से माइलेज 3 से 5 प्रतिशत कम होता

कई मामलों में एथेनॉल की खरीद लागत रिफाइनरी पेट्रोल से ज्यादा

एथेनॉल से Energy Security को बढ़ावा मिलेगा

E20 पेट्रोल को लेकर देशभर में लगातार चर्चा हो रही है. सरकार इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है. दूसरी ओर, कई वाहन मालिकों का कहना है कि E20 इस्तेमाल करने के बाद माइलेज कम हो गया है, जबकि पेट्रोल की कीमत में कोई राहत नहीं मिली. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर E20 में घरेलू स्तर पर तैयार होने वाला एथेनॉल मिलाया जा रहा है, तो इसकी कीमत सामान्य पेट्रोल से कम क्यों नहीं है. आइए इस पूरे मामले की इकोनॉमिक्स को आसान भाषा में समझते हैं.

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क्या है E20 पेट्रोल और सरकार इसे क्यों बढ़ावा दे रही है?

E20 ऐसा ईंधन है, जिसमें 20 प्रतिशत एथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है. एथेनॉल एक बायोफ्यूल है, जिसे गन्ने, मक्का और अन्य कृषि आधारित कच्चे माल से तैयार किया जाता है. सरकार का मानना है कि पेट्रोल में एथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ने से देश का कच्चे तेल का आयात घटेगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और वैश्विक तेल बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर कम होगा.

सरकार ने साफ किया है कि E20 का उद्देश्य पेट्रोल को सस्ता बनाना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और ईंधन की उपलब्धता को अधिक स्थिर बनाना है.

सरकार ने पहली बार माइलेज को लेकर क्या माना?

E20 को लेकर सबसे ज्यादा शिकायत कम माइलेज की रही है. अब सरकार ने भी माना है कि E20 इस्तेमाल करने पर सामान्य पेट्रोल की तुलना में लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक माइलेज कम हो सकता है. इसकी वजह एथेनॉल की कम ऊर्जा क्षमता है. नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक E20 में सामान्य पेट्रोल की तुलना में करीब 6 से 7 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है. इसका असर सीधे वाहन की माइलेज पर पड़ता है.

दिलचस्प बात यह है कि नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि E20 की रिटेल कीमत सामान्य पेट्रोल से कम होनी चाहिए, ताकि कम ऊर्जा क्षमता की भरपाई की जा सके. हालांकि फिलहाल ऐसा नहीं किया गया है.

क्या एथेनॉल वास्तव में पेट्रोल से सस्ता है?

आम तौर पर यह माना जाता है कि घरेलू स्तर पर तैयार होने वाला एथेनॉल सस्ता होगा. लेकिन उपलब्ध खरीद आंकड़े अलग तस्वीर पेश करते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक ऑयल मार्केटिंग कंपनियां एथेनॉल खरीदने के लिए लगभग 65 से 72 रुपये प्रति लीटर तक भुगतान करती हैं. वहीं टैक्स से पहले रिफाइनरी स्तर पर पेट्रोल की लागत करीब 53 रुपये प्रति लीटर होती है. यानी मौजूदा परिस्थितियों में एथेनॉल कई मामलों में पेट्रोल से महंगा इनपुट साबित हो सकता है.

किस स्थिति में E20 आर्थिक रूप से फायदेमंद बनता है?

पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार E20 की लागत काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करती है. अगर कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो E20 तैयार करने की लागत सामान्य पेट्रोल जितनी या उससे अधिक हो सकती है. वहीं एथेनॉल ब्लेंडिंग का बड़ा आर्थिक फायदा तब दिखाई देता है, जब कच्चे तेल की कीमत 120 से 130 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर पहुंच जाए. यानी मौजूदा वैश्विक कीमतों पर E20 सीधे तौर पर उत्पादन लागत कम नहीं करता.

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1.97 लाख करोड़ रुपये की बचत का दावा क्या कहता है?

सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से देश ने लगभग 1.97 लाख करोड़ रुपये की बचत की है और करीब 316 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात को बदला जा सका है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा वास्तविक शुद्ध बचत नहीं, बल्कि आयात में कमी का अनुमान है.

उनके मुताबिक इस गणना में कई अहम खर्च शामिल नहीं किए गए हैं. इनमें एथेनॉल खरीदने की लागत, किसानों और डिस्टिलरी को किया गया भुगतान, उत्पादन प्रक्रिया में मिलने वाली बिजली और पानी की सब्सिडी, तथा टैक्स रियायतों का प्रभाव शामिल नहीं है. ऐसे में कुल बचत और वास्तविक शुद्ध बचत के बीच अंतर हो सकता है.

अगर सरकार बचत कर रही है, तो उपभोक्ता को फायदा क्यों नहीं मिल रहा?

यह पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है. विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार जिस बचत का जिक्र करती है, वह मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा बचत से जुड़ी है. लेकिन पेट्रोल पंप पर उपभोक्ता जो कीमत चुकाता है, वह अलग व्यवस्था से तय होती है. इस कीमत में केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकारों का वैट और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों का मार्जिन शामिल होता है. यानी राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली विदेशी मुद्रा बचत का फायदा सीधे पेट्रोल की खुदरा कीमत में दिखाई नहीं देता.

क्या E20 सस्ता करने से किसानों को नुकसान होगा?

E20 की कीमत को लेकर यह तर्क भी दिया जाता है कि अगर पेट्रोल सस्ता किया गया, तो किसानों और डिस्टिलरी को नुकसान हो सकता है. हालांकि विशेषज्ञ इस दलील से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि एथेनॉल खरीदने की कीमत और पेट्रोल पंप पर उपभोक्ता से वसूली जाने वाली कीमत दो अलग-अलग प्रशासनिक फैसले हैं. अगर सरकार चाहे तो किसानों और डिस्टिलरी को मिलने वाली खरीद कीमत में कोई बदलाव किए बिना एक्साइज ड्यूटी या ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन में बदलाव कर E20 की खुदरा कीमत कम कर सकती है.

राज्य सरकारें कीमत कम करने में क्यों हिचकती हैं?

पेट्रोल की कीमतों में कमी न आने की एक वजह राज्यों की टैक्स व्यवस्था भी है. अधिकांश राज्यों में पेट्रोल पर वैट प्रतिशत के आधार पर लगाया जाता है. ऐसे में अगर पेट्रोल की खुदरा कीमत कम होती है, तो राज्यों के वैट से मिलने वाले राजस्व में भी कमी आती है. यही कारण है कि राज्य सरकारों के लिए भी कीमतों में कटौती आसान फैसला नहीं होता.

आखिर आम उपभोक्ता के लिए इसका क्या मतलब है?

E20 कार्यक्रम का सबसे बड़ा उद्देश्य देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना, कच्चे तेल के आयात को कम करना और विदेशी मुद्रा की बचत करना है. इस नजरिए से यह कार्यक्रम भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. लेकिन उपभोक्ता के स्तर पर तस्वीर अलग है. सरकार खुद मान चुकी है कि E20 से माइलेज 3 से 5 प्रतिशत तक कम हो सकता है. वहीं कीमत में फिलहाल कोई राहत नहीं दी गई है. यानी फिलहाल E20 का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ देश और सरकारी खजाने को मिलता दिखाई देता है, जबकि आम वाहन मालिक के लिए इसका प्रत्यक्ष फायदा अभी सीमित नजर आता है.

आने वाले समय में अगर E20 या प्रस्तावित E25 के लिए कीमतों की नई नीति बनाई जाती है, तो यह देखना अहम होगा कि ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है.

 

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