देश में इस समय E20 पेट्रोल (E20 Fuel) को लेकर जबरदस्त बवाल मचा हुआ है. एक तरफ सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियां दावा कर रही हैं कि इस फ्यूल से गाड़ियों को कोई नुकसान नहीं है, बस माइलेज में थोड़ी कमी आती है. वहीं दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियोज की बाढ़ आ गई है जहां लोग अपनी गाड़ियों के फ्यूल पाइप गलने, इंजन खराब होने और भारी मेंटेनेंस खर्च की शिकायतें कर रहे हैं. इन दो विरोधाभासी दावों के बीच आखिर सच क्या है? इंडिया टुडे ग्रुप के 'तक' चैनल्स के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर ने अपने साप्ताहिक शो 'हिसाब-किताब' में इसका पूरा विश्लेषण किया है.
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क्या है E20 पेट्रोल और इसके पीछे का लॉजिक?
अगर आप अपनी गाड़ी में 10 लीटर पेट्रोल डलवाते हैं और उसमें 2 लीटर इथेनॉल मिला हो, तो उसे E20 पेट्रोल कहा जाता है. यानी सामान्य पेट्रोल में 20% इथेनॉल का मिश्रण. सरकार द्वारा इस फ्यूल को बढ़ावा देने के पीछे मुख्य रूप से 4 बड़े लॉजिक (फायदे) दिए जाते हैं.
क्रूड ऑयल की खपत में कमी
भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल (Crude Oil) विदेशों से आयात करता है. इथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है
विदेशी मुद्रा की बचत
कच्चे तेल का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है, इथेनॉल ब्लेंडिंग से देश के करोड़ों डॉलर बचते हैं.
किसानों को सीधा फायदा
इथेनॉल का उत्पादन किसानों के गन्ने, मक्के और सड़े हुए अनाज से होता है. इससे किसानों की आमदनी बढ़ती है.
प्रदूषण में कमी
पेट्रोल में इथेनॉल मिलने से गाड़ियों से होने वाला जहरीला गैसों का उत्सर्जन (Emission) कम होता है, जिससे पर्यावरण को फायदा मिलता है.
इथेनॉल का सफर और डेडलाइन की 'जल्दबाजी'
इथेनॉल ब्लेंडिंग की इस नीति पर सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने काम शुरू किया था, जिसे बाद में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने आगे बढ़ाया. लेकिन पिछले 10 सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस नीति को बुलेट ट्रेन की रफ्तार दे दी, और यही रफ्तार अब विवाद की मुख्य वजह बन गई है.
मूल नीति के तहत भारत को 2030 तक पूरे देश में E20 पेट्रोल लागू करना था, लेकिन साल 2021 में मोदी सरकार ने नीति आयोग की एक कमेटी की सिफारिश पर इस डेडलाइन को 5 साल घटाकर 2025 कर दिया. सरकार का यह फैसला अचानक नहीं था, बल्कि नीति आयोग की रिपोर्ट पर आधारित था, लेकिन यहां एक बड़ी चूक हो गई.
नीति आयोग की वो चूक, जिससे जनता हो रही है परेशान
साल 2021 में जब नीति आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार कर रहा था, तब ऑटो इंडस्ट्री (गाड़ी बनाने वाली कंपनियों) ने सरकार को दो बेहद महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे, जिन्हें नीति आयोग ने दरकिनार कर दिया. सुझाव के तहत ऑटो इंडस्ट्री ने कहा था कि साल 2028 तक देश में दोनों तरह के पेट्रोल (E10 और E20) मिलने चाहिए.
चेतावनी
कंपनियों का लॉजिक था कि साल 2008 के बाद बनी गाड़ियां E10 पेट्रोल के लिए तो पूरी तरह सुरक्षित हैं, लेकिन E20 के लिए नहीं अगर पुरानी गाड़ियों में E20 डाला गया, तो गाड़ियों के रबर या प्लास्टिक से बने फ्यूल पाइप गल सकते हैं और मेटल के फ्यूल टैंक में मॉइस्चर (नमी) आने से जंग लग सकती है. साथ ही इंजन की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
नीति आयोग ने इन चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए 2025 (जो वास्तव में 2026 से प्रभावी हुआ) से केवल E20 पेट्रोल ही अनिवार्य करने का फैसला सुना दिया.
कंपनियों ने क्यों बदली अपनी लाइन?
हैरानी की बात यह है कि जिस ऑटो इंडस्ट्री ने 2021 में सरकार को आगाह किया था, उसने हाल ही में दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी बात बदल ली. उन्होंने कहा कि गाड़ियों में कोई खराबी नहीं आएगी, सिर्फ 2% से 6% तक माइलेज कम होगा.
इंडस्ट्री के यू-टर्न की वजह पुणे की सरकारी रिसर्च संस्था ARAI (Automobile Research Association of India) की एक रिपोर्ट बनी, जिसने दावा किया कि गाड़ियों को कोई नुकसान नहीं होगा. इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर 1 अप्रैल से देशभर के पेट्रोल पंपों पर केवल E20 पेट्रोल की सप्लाई शुरू कर दी गई.
सड़कों पर दौड़ रही 80% गाड़ियां खतरे में ?
साल 2023 से बनने वाली नई गाड़ियां तो E20 फ्यूल के हिसाब से (Compliant) बनाई जा रही हैं, लेकिन ऐसी गाड़ियों की संख्या बहुत कम है. आज अगर सड़क पर 100 गाड़ियां दौड़ रही हैं, तो उनमें से केवल 20 गाड़ियां ही E20 पेट्रोल के अनुकूल हैं.बाकी 80% गाड़ियां पुरानी तकनीक (E10 या उससे कम) वाली हैं. यही कारण है कि जिन 80% गाड़ियों के मालिकों को मजबूरी में E20 पेट्रोल डलवाना पड़ रहा है, उनकी गाड़ियों के पाइप गल रहे हैं और इंजन खराब हो रहे हैं.
ब्राजील के उदाहरण से सीख और समाधान
सरकार अक्सर ब्राजील का उदाहरण देती है, जहा E27 (27% इथेनॉल) पेट्रोल का इस्तेमाल होता है. लेकिन ब्राजील को E27 तक पहुंचने में 40 साल का लंबा वक्त लगा, जबकि भारत ने बेहद जल्दबाजी दिखाई.
समाधान क्या है?
पॉलिसी बेहतरीन है लेकिन इसके इम्प्लीमेंटेशन (क्रियान्वयन) में जल्दबाजी भारी पड़ रही है. अभी भी देर नहीं हुई है; भले ही लॉजिस्टिकल चुनौतियां आएं, लेकिन सरकार को पेट्रोल पंपों पर E20 के साथ-साथ पुरानी गाड़ियों के लिए E10 पेट्रोल का विकल्प भी उपलब्ध कराना चाहिए ताकि आम जनता को इस भारी नुकसान से बचाया जा सके.
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