नौकरी चली जाए तो नहीं होगी पैसों की टेंशन, 3-6-9 नियम से ऐसे तैयार करें अपना इमरजेंसी फंड

तनीषा त्यागी

• 03:34 PM • 16 Aug 2026

नौकरी छूटने, बीमारी या कारोबार में नुकसान जैसी मुश्किल घड़ी में 3-6-9 नियम बड़ी मदद कर सकता है. जानिए मासिक खर्च के हिसाब से कितना इमरजेंसी फंड रखना चाहिए.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

इमरजेंसी फंड अचानक नौकरी जाने या बीमारी में खर्च संभालता है

3-6-9 नियम जरूरी मासिक खर्च के गुणा पर लक्ष्य तय करता है

वेतनभोगी लोगों के लिए 6 महीने का फंड बेहतर माना जाता है

Emergency Fund : अचानक नौकरी चले जाना, मेडिकल इमरजेंसी आ जाना या कारोबार में नुकसान होना जैसी परिस्थितियां किसी के सामने भी आ सकती हैं. ऐसी स्थिति में अगर आपके पास पर्याप्त बचत नहीं है, तो रोजमर्रा के जरूरी खर्चों के साथ-साथ ईएमआई, किराया और दूसरे वित्तीय दायित्वों को संभालना मुश्किल हो सकता है. इसी वजह से वित्तीय योजना बनाते समय इमरजेंसी फंड को भी शामिल करना जरूरी माना जाता है. यह ऐसा पैसा होता है, जिसे सामान्य निवेश या खर्च के लिए नहीं, बल्कि अचानक आने वाली आर्थिक जरूरतों के लिए अलग रखा जाता है.

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लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इमरजेंसी फंड में कितने पैसे होने चाहिए? इसका एक आसान तरीका 3-6-9 नियम है. इस नियम के जरिए आप अपने जरूरी मासिक खर्चों के आधार पर तय कर सकते हैं कि आपको कितनी रकम अलग रखनी चाहिए.

क्या है 3-6-9 नियम?

3-6-9 नियम के तहत आपको अपने जरूरी मासिक खर्चों के 3, 6 या 9 गुना के बराबर रकम इमरजेंसी फंड में रखने का लक्ष्य बनाना चाहिए. जरूरी खर्चों में किराया, ईएमआई, राशन, बिजली-पानी के बिल और दूसरे अनिवार्य खर्च शामिल किए जा सकते हैं.

इस नियम के तहत कितने महीने का फंड रखना है, यह आपकी नौकरी, आमदनी की स्थिरता और परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है. अगर आपकी नौकरी स्थिर है और परिवार में कमाई के दूसरे साधन भी हैं, तो कम से कम 3 महीने के जरूरी खर्च के बराबर रकम का फंड तैयार किया जा सकता है. वेतनभोगी लोगों के लिए 6 महीने के जरूरी खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड रखना एक बेहतर लक्ष्य हो सकता है. इससे नौकरी जाने या किसी दूसरी अचानक आर्थिक परेशानी की स्थिति में कुछ समय तक रोजमर्रा के खर्च संभालने में मदद मिल सकती है.

वहीं कारोबार करने वाले लोगों, फ्रीलांसरों या परिवार में अकेले कमाने वाले व्यक्ति के लिए 9 से 12 महीने के जरूरी खर्च के बराबर फंड रखना ज्यादा सुरक्षित विकल्प हो सकता है. इन लोगों की आमदनी में उतार-चढ़ाव की संभावना अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकती है, इसलिए लंबी अवधि का वित्तीय सहारा जरूरी हो जाता है.

पहले अपने जरूरी खर्चों का हिसाब लगाएं

इमरजेंसी फंड तैयार करने का पहला कदम यह पता लगाना है कि हर महीने आपके जरूरी खर्च कितने हैं. इसके लिए महीने के सभी खर्चों की सूची बनाएं और उनमें से गैर-जरूरी खर्चों को अलग कर दें. किराया, ईएमआई, राशन, बिजली-पानी के बिल और दूसरे अनिवार्य खर्चों को जोड़कर एक मासिक रकम तय करें. इसके बाद इसी रकम को 3, 6, 9 या 12 से गुणा करके अपने इमरजेंसी फंड का लक्ष्य तय किया जा सकता है.

30 हजार रुपये मासिक खर्च है तो कितना फंड रखें?

मान लीजिए आपके जरूरी मासिक खर्च 30,000 रुपये हैं. ऐसे में 3-6-9 नियम के मुताबिक आपका इमरजेंसी फंड इस तरह तैयार हो सकता है.

  • 3 महीने का फंड: 90,000 रुपये
  • 6 महीने का फंड: 1,80,000 रुपये
  • 9 महीने का फंड: 2,70,000 रुपये
  • 12 महीने का फंड: 3,60,000 रुपये

यानी अगर आपके जरूरी मासिक खर्च 30,000 रुपये हैं, तो आपकी आर्थिक स्थिति के हिसाब से 90,000 रुपये से लेकर 3.60 लाख रुपये तक का इमरजेंसी फंड बनाया जा सकता है.

इमरजेंसी फंड बनाने की शुरुआत कैसे करें?

अगर फिलहाल आपके पास बड़ी रकम बची हुई नहीं है, तो भी इमरजेंसी फंड बनाने की शुरुआत की जा सकती है. इसके लिए सबसे जरूरी है कि हर महीने नियमित तौर पर एक निश्चित रकम अलग रखी जाए. सैलरी या आमदनी मिलते ही 5 से 10 फीसदी रकम को अलग खाते में ट्रांसफर करने की आदत बनाई जा सकती है. इससे बचत को नियमित करना आसान होगा. शुरुआत में रकम छोटी हो सकती है, लेकिन लगातार बचत करने से धीरे-धीरे इमरजेंसी फंड का आकार बढ़ाया जा सकता है. समय के साथ जब आय बढ़े, तो इस फंड में जाने वाली रकम भी बढ़ाई जा सकती है.

इमरजेंसी फंड के लिए अलग खाता रखें

इमरजेंसी फंड को सामान्य बचत और निवेश से अलग रखना बेहतर हो सकता है. इसके लिए अलग बैंक खाता इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका फायदा यह होगा कि रोजमर्रा के खर्चों के लिए रखे पैसे और आपात स्थिति के लिए बचाए गए पैसे अलग रहेंगे. इससे इमरजेंसी फंड को बिना जरूरत खर्च करने की संभावना भी कम हो सकती है. इस पैसे का इस्तेमाल केवल वास्तविक आपात स्थिति में ही करना चाहिए. छुट्टियों, खरीदारी या दूसरे गैर-जरूरी खर्चों के लिए इस रकम का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए.

इमरजेंसी फंड कहां रखें?

इमरजेंसी फंड के लिए ऐसी जगह का चुनाव जरूरी है, जहां जरूरत पड़ने पर पैसे आसानी से उपलब्ध हो सकें. इस फंड का प्राथमिक उद्देश्य ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि आर्थिक संकट के समय तुरंत पैसे उपलब्ध कराना है.

बचत खाता

इमरजेंसी फंड की कुछ रकम बचत खाते में रखी जा सकती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि जरूरत पड़ने पर रकम आसानी से निकाली जा सकती है.

लिक्विड म्यूचुअल फंड

लिक्विड म्यूचुअल फंड भी इमरजेंसी फंड के लिए एक विकल्प हो सकता है. इसमें बचत खाते की तुलना में बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना हो सकती है और पैसे की उपलब्धता भी बनी रहती है. हालांकि किसी भी निवेश विकल्प को चुनने से पहले उसके जोखिम और शर्तों को समझना जरूरी है.

फिक्स्ड डिपॉजिट

फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी का इस्तेमाल भी इमरजेंसी फंड के लिए किया जा सकता है. ऐसी एफडी का विकल्प चुना जा सकता है जिसे जरूरत पड़ने पर आसानी से तोड़ा जा सके. इमरजेंसी फंड के मामले में केवल रिटर्न को प्राथमिकता देने के बजाय पैसे की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर उसकी उपलब्धता को ज्यादा महत्व देना जरूरी है.

इमरजेंसी फंड को निवेश से अलग रखें

इमरजेंसी फंड और निवेश का उद्देश्य अलग होता है. निवेश का मकसद समय के साथ पैसा बढ़ाना हो सकता है, जबकि इमरजेंसी फंड का मकसद अचानक आने वाली आर्थिक जरूरतों को पूरा करना है. इसलिए इमरजेंसी के लिए रखे पैसे को ऐसे विकल्पों में रखने से बचना चाहिए, जहां बाजार में तेज उतार-चढ़ाव के कारण जरूरत के समय रकम का मूल्य कम हो सकता है.

हर साल फंड की समीक्षा करें

इमरजेंसी फंड बनाकर उसे हमेशा के लिए उसी स्तर पर छोड़ देना सही नहीं है. समय के साथ आपके खर्च बढ़ सकते हैं. किराया, ईएमआई या दूसरे जरूरी खर्चों में बदलाव हो सकता है. इसलिए कम से कम साल में एक बार अपने जरूरी खर्चों का दोबारा हिसाब लगाना चाहिए. अगर मासिक खर्च बढ़ गए हैं, तो उसी हिसाब से इमरजेंसी फंड का लक्ष्य भी बढ़ाना चाहिए. इसी तरह सैलरी या आमदनी बढ़ने पर बचत की रकम में भी बढ़ोतरी की जा सकती है.

इमरजेंसी फंड क्यों है जरूरी?

इमरजेंसी फंड का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अचानक आर्थिक संकट आने पर आपको तुरंत कर्ज लेने या अपने दूसरे निवेशों को जल्दबाजी में निकालने की जरूरत कम पड़ सकती है. नौकरी जाने की स्थिति में जब कुछ समय तक नियमित आमदनी नहीं आती, तब यही फंड किराया, राशन, ईएमआई और दूसरे जरूरी खर्चों को संभालने में मदद कर सकता है. इसी तरह अचानक कोई जरूरी खर्च सामने आने पर भी इमरजेंसी फंड वित्तीय दबाव को कम करने में मदद कर सकता है.

इमरजेंसी फंड को लेकर इन बातों का रखें ध्यान

इमरजेंसी फंड बनाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. सबसे पहले इसे अपने सामान्य निवेश पोर्टफोलियो से अलग रखें. दूसरे, इस पैसे का इस्तेमाल केवल वास्तविक आपात स्थिति में करें. हर साल अपने जरूरी खर्चों की समीक्षा करके फंड की रकम को भी अपडेट करें. आमदनी बढ़ने पर बचत की रकम बढ़ाएं और कोशिश करें कि इमरजेंसी फंड धीरे-धीरे मजबूत होता रहे. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इमरजेंसी फंड का उद्देश्य ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि मुश्किल समय में वित्तीय सुरक्षा देना है. इसलिए पैसे की सुरक्षा, आसानी से निकासी और जरूरत के समय उपलब्धता को प्राथमिकता देना बेहतर हो सकता है.

कुल मिलाकर, 3-6-9 नियम के जरिए कोई भी व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से इमरजेंसी फंड का लक्ष्य तय कर सकता है. अगर जरूरी मासिक खर्च 30,000 रुपये हैं, तो कम से कम 90,000 रुपये से शुरुआत करके धीरे-धीरे इसे 1.80 लाख, 2.70 लाख या 3.60 लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकता है. सही रकम आपकी नौकरी, आय की स्थिरता और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर निर्भर करेगी.