Fed Interest Rate Decision : अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को 3.75% से 4% की रेंज में बरकरार रखा है. फेड के इस फैसले का असर भारतीय शेयर बाजार, रुपये, महंगाई और सोने-चांदी की कीमतों पर भी पड़ सकता है. हालांकि, बाजार पहले से ही ब्याज दरों में बदलाव नहीं होने की उम्मीद कर रहा था. ऐसे में भारतीय बाजार पर फैसले का तत्काल बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है.
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अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने महंगाई के ऊंचे स्तर पर बने रहने के बीच अपनी प्रमुख ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. फेडरल ओपन मार्केट कमिटी (FOMC) ने 10-2 के बहुमत से फेडरल फंड्स रेट को 3.75% से 4% की रेंज में बनाए रखने का फैसला किया. इससे पहले सितंबर में फेड ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की थी. यह जुलाई 2023 के बाद ब्याज दरों में पहली बढ़ोतरी थी.
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका में ब्याज दरों से जुड़े फैसलों का असर दुनियाभर के वित्तीय बाजारों पर पड़ता है. इसकी वजह यह है कि अमेरिकी ब्याज दरें तय करती हैं कि निवेशकों के लिए डॉलर में निवेश कितना आकर्षक रहेगा. इसका असर भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी निवेश, रुपये की चाल और शेयर बाजार पर भी देखने को मिल सकता है.
दिसंबर में फिर बढ़ सकती हैं ब्याज दरें?
फेड के ताजा फैसले के बाद अब निवेशकों की नजर दिसंबर में होने वाली अगली नीतिगत बैठक पर है. बाजार में इस बात को लेकर चर्चा है कि फेड आगे चलकर ब्याज दरों में फिर बढ़ोतरी कर सकता है. हालांकि, यह फैसला महंगाई, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े आंकड़ों पर निर्भर करेगा.
ब्याज दरों को स्थिर रखने के फैसले पर बाजार की प्रतिक्रिया काफी हद तक सीमित रहने की उम्मीद है, क्योंकि निवेशक पहले से ही इस फैसले का अनुमान लगा रहे थे.
भारतीय शेयर बाजार पर क्या होगा असर?
अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी होने पर वैश्विक वित्तीय स्थितियां सख्त हो सकती हैं. इससे विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी बॉन्ड और अन्य डॉलर आधारित निवेश ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं. नतीजतन, भारत जैसे बाजारों से विदेशी पूंजी की निकासी बढ़ सकती है.
हालांकि, इस बार फेड ने दरों में बदलाव नहीं किया है. ऐसे में भारतीय शेयर बाजार के लिए यह फैसला कोई बड़ा नकारात्मक संकेत नहीं माना जा रहा है. फिलहाल बाजार की नजर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी पर है.
मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी.के. विजयकुमार ने कहा कि बाजार पहले ही ब्याज दरों में ठहराव को ध्यान में रखकर चल रहा था. इसलिए फेड के फैसले से किसी बड़े असर की उम्मीद नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि बाजार के कुछ हिस्सों में शेयर आकर्षक कीमतों पर उपलब्ध होने के कारण वैल्यू बाइंग देखने को मिल रही है.
रुपये पर बढ़ सकता है दबाव
अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी या लंबे समय तक ऊंची दरें बने रहने से डॉलर मजबूत हो सकता है. ऐसी स्थिति में विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकालकर अमेरिका में निवेश करना पसंद कर सकते हैं. इससे रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है.
पिछले कारोबारी सत्र में भारतीय रुपया 21 पैसे कमजोर होकर 95.28 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट से भारत के लिए कच्चे तेल समेत कई आयात महंगे हो जाते हैं.
महंगा कच्चा तेल बढ़ा सकता है महंगाई
भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है. कच्चे तेल की कीमत फिलहाल करीब 115 डॉलर प्रति बैरल बताई जा रही है.
तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. इसके अलावा ट्रांसपोर्ट और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं. इस तरह रुपये में कमजोरी और कच्चे तेल की तेजी मिलकर महंगाई की चुनौती बढ़ा सकती हैं.
RBI पर भी बढ़ सकता है दबाव
अगर रुपये में लगातार कमजोरी आती है, विदेशी पूंजी की निकासी बढ़ती है और महंगाई का दबाव बना रहता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने नीतिगत चुनौती बढ़ सकती है. ऐसी स्थिति में रुपये को स्थिर रखने और महंगाई पर काबू पाने के लिए ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाने का दबाव बन सकता है.
हालांकि, RBI का फैसला सिर्फ अमेरिकी फेड की नीति पर निर्भर नहीं करता. केंद्रीय बैंक घरेलू महंगाई, आर्थिक विकास, रुपये की चाल और अन्य आर्थिक संकेतकों को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है. रेपो रेट में बढ़ोतरी होने पर होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज महंगे हो सकते हैं.
सोने-चांदी की कीमतों पर क्या असर होगा?
सोने और चांदी की कीमतों पर भी अमेरिकी ब्याज दरों का असर पड़ता है. आमतौर पर ब्याज दरें ऊंची रहने पर सोने जैसे ऐसे निवेश की आकर्षकता कम हो सकती है, जिस पर नियमित ब्याज नहीं मिलता. इसके उलट, ब्याज दरें घटने की उम्मीद से सोने की कीमतों को सहारा मिल सकता है.
हालांकि, सोने-चांदी की कीमतें केवल ब्याज दरों से तय नहीं होतीं. डॉलर की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षित निवेश की मांग भी इनकी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. पिछले कारोबारी सत्र में निवेशकों की नजर फेड के फैसले पर रहने के कारण सोने और चांदी की कीमतों में मामूली गिरावट देखी गई थी.
शेयर और बॉन्ड बाजार में उतार-चढ़ाव की आशंका
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और वैश्विक स्तर पर वित्तीय स्थितियां सख्त होने से शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है. इसका असर खासकर उन शेयरों पर पड़ सकता है, जिनकी वैल्यूएशन ऊंची है या जिन्हें विदेशी निवेशकों की खरीदारी से सहारा मिलता है.
पिछले कारोबारी सत्र में भारतीय बाजार में गिरावट दर्ज की गई थी. सेंसेक्स 352.64 अंक यानी 0.48% टूटकर 73,246.03 पर बंद हुआ था. वहीं, निफ्टी 50.90 अंक यानी 0.22% गिरकर 22,698.85 पर आ गया था.
कुल मिलाकर, फेड ने फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव नहीं किया है, लेकिन आगे की दिशा महंगाई, कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड जैसे कारकों से तय होगी. भारतीय निवेशकों के लिए आने वाले दिनों में रुपये की चाल, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर नजर रखना अहम रहेगा.
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