कई महीनों की लगातार बिकवाली के बाद विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने जुलाई में भारतीय शेयर बाजार में फिर से खरीदारी शुरू कर दी है। अब तक वे भारतीय इक्विटी में 2 अरब डॉलर (करीब 17,000 करोड़ रुपये) से अधिक का निवेश कर चुके हैं। इससे निवेशकों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या विदेशी निवेश का रुख एक बार फिर भारत की ओर लौट रहा है।
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हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अभी इसे पूरी तरह से ट्रेंड बदलने का संकेत नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, फिलहाल यह खरीदारी रणनीतिक (Tactical) नजर आती है, न कि लंबे समय के लिए निवेश की वापसी।
आखिर क्यों लौटे FII?
विशेषज्ञों के मुताबिक जुलाई में वैश्विक परिस्थितियों में कुछ राहत देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, रुपये में स्थिरता, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में कम आक्रामक रुख की उम्मीद और वैश्विक जोखिम लेने की बढ़ती क्षमता ने विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है।
मंगल केशव फाइनेंशियल के चेयरमैन परेश भगत का कहना है कि हालिया निवेश सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन इसे अभी स्थायी बदलाव नहीं कहा जा सकता। उनका मानना है कि बाजार में आई गिरावट के बाद कई बड़े शेयर आकर्षक वैल्यूएशन पर उपलब्ध हो गए हैं, जिससे विदेशी निवेशकों को एंट्री का बेहतर मौका मिला।
कच्चे तेल और रुपये की मजबूती का असर
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में गिरावट से महंगाई, चालू खाते का घाटा और रुपये पर दबाव कम होता है। यही वजह है कि तेल सस्ता होने पर विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ता है।
बोनांजा के रिसर्च एनालिस्ट बालाजी राव मुदिली के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों का युद्ध-पूर्व स्तर के करीब लौटना और रुपये की मजबूती FII की वापसी की बड़ी वजह रही है। उनका कहना है कि विदेशी निवेशक किसी भी उभरते बाजार में निवेश से पहले मुद्रा की स्थिरता पर खास नजर रखते हैं।
भारत की ग्रोथ स्टोरी अब भी मजबूत
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविध अर्थव्यवस्था है। बैंकिंग, ऑटोमोबाइल, उपभोक्ता क्षेत्र, हेल्थकेयर, इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और वित्तीय सेवाओं जैसे कई सेक्टर विदेशी निवेशकों को आकर्षित करते हैं।
अल्फाएक्युरेट एडवाइजर्स के CIO राजेश कोठारी का कहना है कि भारत में निवेश के अवसर कई क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जबकि कई अन्य उभरते बाजार कुछ चुनिंदा सेक्टरों पर ही निर्भर हैं। यही वजह है कि भारत लंबी अवधि के निवेश के लिए आकर्षक बना हुआ है।
क्या खत्म हो गई FII की बिकवाली?
विशेषज्ञ इस सवाल पर अभी एकमत नहीं हैं। उनका कहना है कि जुलाई की खरीदारी उत्साहजनक जरूर है, लेकिन इससे पहले विदेशी निवेशक करीब 28 अरब डॉलर की बिकवाली कर चुके हैं। ऐसे में केवल एक महीने की खरीदारी को स्थायी ट्रेंड मानना जल्दबाजी होगी।
परेश भगत का कहना है कि विदेशी निवेशकों के फैसले अभी भी अमेरिकी ब्याज दरों, बॉन्ड यील्ड, डॉलर इंडेक्स और वैश्विक वैल्यूएशन पर निर्भर रहेंगे। वहीं, भारत अब भी सबसे महंगे उभरते बाजारों में शामिल है, इसलिए निवेश चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित रह सकता है।
आगे क्या रहेगा नजरिया?
आने वाले महीनों में विदेशी निवेश का रुख चार प्रमुख कारकों पर निर्भर करेगा—
कच्चे तेल की कीमतेंअमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरेंडॉलर इंडेक्सभारतीय कंपनियों के तिमाही नतीजे
अगर कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रण में रहती हैं, रुपया मजबूत बना रहता है और कंपनियों के नतीजे बेहतर आते हैं, तो विदेशी निवेश में और तेजी देखने को मिल सकती है।
घरेलू निवेशकों का बना हुआ है मजबूत सहारा
हाल के महीनों में विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार पर ज्यादा दबाव नहीं आया। इसकी सबसे बड़ी वजह घरेलू निवेशकों की लगातार खरीदारी रही। SIP के जरिए म्यूचुअल फंड में रिकॉर्ड निवेश और रिटेल निवेशकों की मजबूत भागीदारी ने बाजार को सहारा दिया है।
निष्कर्ष
जुलाई में 2 अरब डॉलर से अधिक की FII खरीदारी भारतीय बाजार के लिए सकारात्मक संकेत जरूर है। इससे यह साफ है कि भारत एक बार फिर विदेशी निवेशकों की नजर में है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि विदेशी निवेशक पूरी तरह भारतीय बाजार में लौट आए हैं। आने वाले कुछ महीनों में वैश्विक आर्थिक हालात, कच्चे तेल की कीमतें और कंपनियों के नतीजे तय करेंगे कि यह वापसी स्थायी साबित होती है या नहीं।
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