भारतीय शेयर बाजार में रिकॉर्ड 29 अरब डॉलर की बिकवाली करने के बाद विदेशी संस्थागत निवेशक अब फिर से लौटते दिख रहे हैं. 15 जुलाई तक विदेशी निवेशकों ने 1.8 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश किया है, जो फरवरी के बाद पहली बार है जब वे किसी महीने में कुल मिलाकर खरीदार बने हैं.
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जेफरीज के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटेजी क्रिस्टोफर वुड के मुताबिक, भारत से हुई भारी बिकवाली की वजह भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी नहीं थी. उनका कहना है कि एशिया के एआई और टेक शेयरों में निवेश की वैश्विक दौड़ के चलते फंड्स ने भारत से पैसा निकालकर दक्षिण कोरिया और ताइवान का रुख किया.
जुलाई में लौटे विदेशी निवेशक
जुलाई में आई यह खरीदारी पहले की रिकॉर्ड बिकवाली के मुकाबले अभी छोटी है, लेकिन बाजार के लिए इसे सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. वुड का कहना है कि यह इस बात का इशारा हो सकता है कि एआई ट्रेड का आकर्षण अब धीरे धीरे कम हो रहा है.
15 जुलाई तक विदेशी निवेशकों ने 1.8 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश किया.फरवरी के बाद यह पहला महीना है जब विदेशी निवेशक कुल मिलाकर खरीदार बने हैं.इससे पहले भारतीय बाजार से 29 अरब डॉलर की रिकॉर्ड बिकवाली हो चुकी थी.
बिकवाली की असली वजह क्या थी
जेफरीज की ग्रीड एंड फियर रिपोर्ट में क्रिस्टोफर वुड ने कहा कि विदेशी बिकवाली का मुख्य कारण भारत नहीं था. उनके मुताबिक, उभरते बाजारों में पैसा लगाने वाले कई फंड्स ने भारत में अपनी हिस्सेदारी बेचकर दक्षिण कोरिया और ताइवान के एआई और टेक हार्डवेयर शेयरों में निवेश किया.
वुड के अनुसार, विदेशी बिकवाली को भारत की घरेलू कमजोरी से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. उनका साफ कहना है कि उस दौर में वैश्विक फंड्स के लिए एआई से जुड़ा निवेश ज्यादा आकर्षक बन गया था.
एमएससीआई में कोरिया का बढ़ा वजन
जेफरीज के मुताबिक, एमएससीआई उभरते बाजार सूचकांक में दक्षिण कोरिया का वजन 2025 की शुरुआत में 9% था, जो बढ़कर 23.7% हो गया. रिपोर्ट के अनुसार, इसी बदलाव के बाद कई वैश्विक फंड्स ने भारत से पैसा निकालकर कोरिया और ताइवान में लगाया.
क्रिस्टोफर वुड का मानना है कि विदेशी निवेशकों की बड़ी वापसी के लिए दो में से किसी एक हालात का बनना जरूरी होगा. पहला, वैश्विक एआई ट्रेड का आकर्षण कम हो. दूसरा, भारतीय शेयर बाजार के भाव में बड़ी गिरावट आए.
एआई शेयरों का आकर्षण कम हो जाए.भारतीय शेयर बाजार के वैल्यूएशन में बड़ी गिरावट आए.
वुड के मुताबिक, अभी पहली संभावना ज्यादा मजबूत दिख रही है क्योंकि एआई शेयरों से धीरे धीरे पैसा निकलना शुरू हो रहा है.
घरेलू निवेशकों ने बाजार को संभाला
विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार को घरेलू म्यूचुअल फंड निवेशकों का मजबूत सहारा मिला. जेफरीज के मुताबिक, यही लगातार घरेलू निवेश भारतीय बाजार की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है.
जून में एसआईपी के जरिए निवेश 31,800 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.यह इक्विटी म्यूचुअल फंड में कुल निवेश का 87% हिस्सा था.पिछले 12 महीनों में एसआईपी के जरिए सालाना आधार पर करीब 3.63 लाख करोड़ रुपये का निवेश हुआ.
क्या अब बड़ी कंपनियों की बारी है
जेफरीज का मानना है कि आने वाले समय में भारतीय लार्जकैप शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 2 साल में मिडकैप शेयरों ने लार्जकैप से कहीं बेहतर रिटर्न दिया है, लेकिन अब तस्वीर बदल सकती है.
निफ्टी मिडकैप 100 में करीब 99% की तेजी आई.निफ्टी 50 में 33% की बढ़त दर्ज की गई.निफ्टी मिडकैप 150 की औसत मुनाफा वृद्धि 18% रही.निफ्टी 100 की औसत मुनाफा वृद्धि 8% रही.
जेफरीज का अनुमान है कि अगले 2 वित्त वर्षों में लार्जकैप कंपनियों की कमाई 14% से 15% की दर से बढ़ सकती है. वहीं, मिडकैप कंपनियों की कमाई करीब 20% रह सकती है. इसके बावजूद वैल्यूएशन के हिसाब से बड़ी कंपनियां ज्यादा आकर्षक दिख रही हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, निफ्टी 100 का फॉरवर्ड पीई अभी निफ्टी मिडकैप 150 के मुकाबले 33% डिस्काउंट पर कारोबार कर रहा है, जबकि पिछले 10 साल का औसत डिस्काउंट 20% रहा है. इसका मतलब यह है कि भाव के हिसाब से बड़ी कंपनियां अभी ज्यादा सस्ती दिख रही हैं.
कमाई के मोर्चे पर भी भरोसा
जेफरीज का अनुमान है कि तेल, गैस, धातु और वित्तीय कंपनियों को छोड़कर जिन कंपनियों को वह कवर करता है, उनकी आय वृद्धि जून तिमाही में 13 तिमाहियों के सबसे ऊंचे स्तर 16% तक पहुंच सकती है. वहीं, एमएससीआई इंडिया की कंपनियों की कमाई मौजूदा वित्त वर्ष में करीब 14% बढ़ने का अनुमान है.
बाजार के सामने जोखिम भी हैं
जेफरीज ने चेतावनी दी है that भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम अब भी कच्चे तेल की कीमतें हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य पूर्व में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास बढ़ता तनाव तेल को महंगा कर सकता है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. अगर तेल महंगा होता है तो सरकार पर ईंधन सब्सिडी का दबाव बढ़ सकता है, जिससे बुनियादी ढांचा खर्च पर असर पड़ने की आशंका रहेगी.
रुपये की कमजोरी भी चिंता का विषय बनी हुई है. 2025 की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 11.1% कमजोर हो चुका है. ऐसे में विदेशी निवेशकों की वापसी को अर्थव्यवस्था और पूंजी प्रवाह, दोनों के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है.
इक्विटी सप्लाई भी बढ़ी
जेफरीज के अनुसार, अप्रैल में मासिक इक्विटी इश्यू 1 अरब डॉलर था, जो जून में बढ़कर 6.5 अरब डॉलर हो गया. मई और जून में इस सप्लाई का करीब 75% हिस्सा प्रमोटर्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशकों की हिस्सेदारी बेचने से आया.
कुल मिलाकर, जेफरीज का कहना है कि भारत से विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली घरेलू वजहों से नहीं, बल्कि वैश्विक एआई निवेश थीम की वजह से हुई थी. अब अगर एआई शेयरों की तेजी धीमी पड़ती है, तो भारत में विदेशी निवेश की वापसी तेज हो सकती है. साथ ही, मजबूत घरेलू निवेश और कंपनियों की बेहतर कमाई भारतीय शेयर बाजार को आगे भी सहारा दे सकती है.
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