FPI Selling: दो महीने की खरीदारी के बाद विदेशी निवेशकों का यू-टर्न, 4 दिन में ₹7,443 करोड़ निकाले !

चिराग ठाकुर

• 03:12 PM • 06 Sep 2026

सितंबर के पहले हफ्ते में एफपीआई ने 7443 करोड़ रुपये निकाले. जानिए कच्चा तेल, डॉलर, बॉन्ड यील्ड और ऊंची वैल्यूएशन कैसे भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ा रहे हैं.

FPI Invest India
जुलाई के बाद अगस्त में भी जारी है एफपीआई के निवेश का सिलसिला. (Photo: ITG)
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न्यूज़ हाइलाइट्स

जुलाई और अगस्त में विदेशी निवेशकों ने जोरदार खरीदारी की थी

पिछले हफ्ते सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दबाव में बंद हुए

कच्चा तेल महंगा होने से महंगाई और आयात खर्च की चिंता बढ़ी

दो महीनों तक भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की खरीदारी से बनी राहत सितंबर की शुरुआत में खत्म होती दिख रही है. जुलाई और अगस्त में जमकर पैसा लगाने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPIs ने सितंबर के पहले ही हफ्ते में अपना रुख बदल लिया है. सिर्फ 4 सितंबर तक विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी बाजार से ₹7,443 करोड़ निकाल चुके हैं.

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खास बात यह है कि यह बिकवाली ऐसे समय में आई है, जब घरेलू शेयर बाजार भी दबाव में है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ मुनाफावसूली है या विदेशी निवेशकों का रुख एक बार फिर बाजार के लिए चिंता का कारण बन सकता है.

पिछले हफ्ते बाजार में भी दबाव

सितंबर के पहले हफ्ते में भारतीय शेयर बाजार को भी खास राहत नहीं मिली. Sensex में करीब 0.80 फीसदी की गिरावट रही, जबकि Nifty 0.91 फीसदी नीचे रहा.

यानी बाजार पहले से ही दबाव में था और इसी दौरान विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली ने चिंता और बढ़ा दी.

NSDL के आंकड़ों के मुताबिक, 4 सितंबर तक सिर्फ चार कारोबारी दिनों में FPIs ने ₹7,443 करोड़ की निकासी की है.

जुलाई-अगस्त में जमकर लगाया था पैसा

सितंबर की यह बिकवाली इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे ठीक पहले विदेशी निवेशक लगातार दो महीने भारतीय शेयरों में खरीदारी कर रहे थे.

  • जुलाई: करीब ₹20,200 करोड़ की खरीदारी.
  • अगस्त: ₹29,600 करोड़ से ज्यादा का निवेश.
  • सितंबर के पहले 4 दिन: ₹7,443 करोड़ की बिकवाली.

यानी दो महीने की खरीदारी के बाद विदेशी निवेशकों ने अचानक अपना रुख बदल लिया है.

Crude Oil और Bond Yields ने बढ़ाई चिंता

विदेशी निवेशकों के इस बदले रुख के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण हैं. इनमें कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और दुनिया के बड़े देशों में बढ़ती बॉन्ड यील्ड अहम हैं.

महंगा कच्चा तेल भारत के लिए चिंता बढ़ा सकता है. इससे आयात बिल बढ़ने के साथ महंगाई और चालू खाते पर दबाव आने का जोखिम रहता है.

वहीं अमेरिका, ब्रिटेन और जापान जैसे बड़े बाजारों में सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न भी ऊंचा हुआ है.

  • अमेरिका की 10 साल की बॉन्ड यील्ड: करीब 4.8 फीसदी.
  • ब्रिटेन की 10 साल की बॉन्ड यील्ड: करीब 5.2 फीसदी.
  • जापान की 10 साल की बॉन्ड यील्ड: 3 फीसदी के पार.

जब अपेक्षाकृत सुरक्षित बाजारों में ही निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलने लगे, तो भारत जैसे उभरते बाजारों में ज्यादा जोखिम लेने की जरूरत कम हो सकती है. मजबूत डॉलर भी इस दबाव को बढ़ा सकता है.

महंगे शेयर भी बन रहे हैं वजह

विदेशी निवेशकों की चिंता सिर्फ वैश्विक बाजारों तक सीमित नहीं है. भारतीय शेयर बाजार में कई हिस्सों की ऊंची कीमतें भी उनके फैसले पर असर डाल रही हैं.

खासकर Growth Stocks और Mid Cap-Small Cap शेयरों में ऊंची Valuation के बीच कुछ विदेशी फंड मुनाफावसूली कर रहे हैं. इसके साथ ही वे अपने निवेश को नए सिरे से संतुलित भी कर रहे हैं.

2026 में ₹2.32 लाख करोड़ की निकासी

विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर पूरे साल के आंकड़ों में और साफ दिखाई देता है.

2026 में अब तक FPIs भारतीय इक्विटी बाजार से करीब ₹2.32 लाख करोड़ निकाल चुके हैं. यह रकम पूरे 2025 में हुई करीब ₹1.66 लाख करोड़ की निकासी से भी ज्यादा है.

हालांकि, मार्च से जून तक लगातार चार महीने बिकवाली के बाद जुलाई और अगस्त में विदेशी निवेशकों की वापसी हुई थी. इसलिए सितंबर के शुरुआती आंकड़ों को अभी किसी बड़े और लंबे बिकवाली ट्रेंड की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी.

IPO Market अभी भी उम्मीद की वजह

इस कहानी का एक सकारात्मक पहलू भी है. भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालने के बावजूद विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

भारत का IPO बाजार विदेशी पूंजी के लिए अभी भी आकर्षक बना हुआ है. आने वाले समय में नए IPO बाजार में आ सकते हैं. अगर कंपनियों की कीमत और मूल्यांकन निवेशकों को सही लगे, तो विदेशी पैसा नए शेयरों में लगाया जा सकता है.

यानी पुराने शेयरों में बिकवाली और नए IPO में निवेश, दोनों एक साथ देखने को मिल सकते हैं.

अब इन संकेतकों पर रहेगी नजर

आने वाले दिनों में FPIs का रुख कुछ अहम संकेतकों से तय होगा.

  • अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर की चाल.
  • कच्चे तेल की कीमत.
  • अमेरिका का महंगाई आंकड़ा.
  • Federal Reserve की ब्याज दर नीति.
  • US-Iran तनाव और उससे जुड़े घटनाक्रम.

अगर कच्चा तेल महंगा रहता है, डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड मजबूत बने रहते हैं और भारतीय शेयरों की Valuation ऊंची रहती है, तो विदेशी बिकवाली का दबाव आगे भी बढ़ सकता है. दूसरी तरफ, अगर वैश्विक माहौल सुधरता है और अमेरिका में ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद मजबूत होती है, तो FPIs फिर से भारतीय बाजार की ओर लौट सकते हैं.

इसलिए आने वाले दिनों में सिर्फ Sensex और Nifty की चाल नहीं, बल्कि विदेशी निवेशकों के पैसे का रुख भी बाजार की अगली दिशा का बड़ा संकेत होगा.