अडानी केस पर अमेरिकी न्याय विभाग का यू टर्न, कहा मुकदमा जरूरी नहीं था

न्यूज तक

• 12:01 PM • 05 Jul 2026

अमेरिकी न्याय विभाग ने गौतम अडानी मामले में कोर्ट से कहा कि यह केस शायद दर्ज नहीं होना चाहिए था. 10 पन्नों की फाइलिंग ने पुराने फैसले पर बड़े सवाल खड़े किए.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

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आरोप पत्र के सिर्फ 2 पन्नों में भारत का जिक्र 200 से ज्यादा बार होने का दावा

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विभाग ने पूछा, इतने भारतीय पहलुओं वाले मामले में अमेरिका क्यों आए

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ज्यादातर गवाह, सबूत और घटनाएं अमेरिका के बाहर होने की बात कही

अमेरिका के न्याय विभाग यानी Department of Justice (DOJ) की एक 10 पन्नों की कोर्ट फाइलिंग इस समय दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी हुई है. वजह सिर्फ इतनी नहीं है कि गौतम अडानी और अन्य आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला वापस लेने की बात कही गई है. असली वजह उस फाइलिंग में इस्तेमाल की गई भाषा है. DOJ ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कई ऐसी टिप्पणियां की हैं, जो आमतौर पर किसी सरकारी एजेंसी की अदालत में दाखिल फाइलिंग में देखने को नहीं मिलतीं.

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इस दस्तावेज में DOJ ने यहां तक कहा कि यह मामला शायद पहले ही खत्म हो जाना चाहिए था, या फिर इसे कभी दर्ज ही नहीं किया जाना चाहिए था. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन 10 पन्नों में ऐसा क्या लिखा है, जिसने इस मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है.

DOJ क्या है और इसकी भूमिका क्यों अहम है?

DOJ यानी Department of Justice अमेरिका की सबसे बड़ी सरकारी कानूनी संस्था है. यही एजेंसी बड़े फेडरल आपराधिक मामलों की जांच कराती है, अदालत में सरकार का पक्ष रखती है और यह तय करती है कि किन मामलों में मुकदमा चलाया जाएगा और किन मामलों को वापस लिया जाएगा. यही वजह है कि जब वही एजेंसी खुद अदालत से कहे कि किसी आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है, तो उसका महत्व काफी बढ़ जाता है.

पूरा मामला क्या था?

नवंबर 2024 में तत्कालीन जो बाइडेन प्रशासन के दौरान DOJ ने गौतम अडानी, सागर अडानी और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ आपराधिक आरोप लगाए थे. आरोप था कि भारत में सोलर प्रोजेक्ट हासिल करने के लिए कथित तौर पर रिश्वत दी गई और अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया गया. इन आरोपों के बाद अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट आई. विदेशी निवेशकों की चिंता बढ़ी और यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया. करीब डेढ़ साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई. DOJ ने अदालत से कहा कि इस आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने का कोई व्यावहारिक या कानूनी आधार नहीं बचता. जब अदालत ने इस फैसले का कारण पूछा, तब DOJ ने 10 पन्नों की विस्तृत फाइलिंग दाखिल की.

पहला बड़ा दावा: "यह केस शायद कभी दर्ज ही नहीं होना चाहिए था"

DOJ ने अपनी फाइलिंग में लिखा कि यह मामला एक साल पहले ही समाप्त हो जाना चाहिए था या फिर इसे शुरू ही नहीं किया जाना चाहिए था. यह टिप्पणी इसलिए बेहद असामान्य मानी जा रही है क्योंकि जिस एजेंसी ने कभी आरोप लगाए थे, वही अब अदालत में कह रही है कि मुकदमा शुरू करना ही सही फैसला नहीं था. सरकारी कोर्ट फाइलिंग में इतनी स्पष्ट और कड़ी भाषा कम ही देखने को मिलती है.

दूसरा बड़ा तर्क: आरोपपत्र में 200 से ज्यादा बार लिखा गया 'India'

DOJ ने अदालत का ध्यान आरोपपत्र के शुरुआती हिस्से की ओर दिलाया. उसका कहना था कि अगर आरोपपत्र के शुरुआती दो पन्नों में "India" शब्द खोजा जाए, तो यह 200 से ज्यादा बार दिखाई देगा. DOJ का तर्क था कि कथित आरोपी भारतीय हैं. जिन अधिकारियों को कथित रिश्वत दी गई, वे भारतीय हैं. सरकारी कॉन्ट्रैक्ट भारत के हैं. प्रोजेक्ट भारत में हैं. बिजली भारत में बननी थी और उसका फायदा भी भारत को ही मिलना था. यानी DOJ के मुताबिक पूरा मामला लगभग पूरी तरह भारत से जुड़ा था. ऐसे में सवाल यह था कि इस पूरे विवाद में अमेरिकी अदालतों की भूमिका कितनी बनती है.

तीसरा बड़ा संदेश: अमेरिका को हर जगह 'World Police' बनने की जरूरत नहीं

फाइलिंग का सबसे चर्चित हिस्सा वह रहा, जहां DOJ ने कहा कि अमेरिका को हर विदेशी मामले में "World Police" बनने की जरूरत नहीं है. DOJ का कहना था कि यदि मामला भारत से जुड़ा है, तो भारत की संस्थाएं और एजेंसियां उसे बेहतर तरीके से संभाल सकती हैं. ब्रुकलिन या वॉशिंगटन के सरकारी वकीलों को हर विदेशी विवाद में हस्तक्षेप करना जरूरी नहीं है. यह टिप्पणी सिर्फ इस केस तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे ट्रंप प्रशासन की व्यापक कानूनी और विदेश नीति की सोच से भी जोड़कर देखा जा रहा है.

चौथा कारण: कानूनी आधार भी कमजोर बताया

DOJ ने अपनी फाइलिंग में यह भी कहा कि इस मामले में कानूनी चुनौतियां भी काफी थीं. एजेंसी के अनुसार अधिकांश घटनाएं अमेरिका के बाहर हुईं. मुख्य गवाह विदेश में हैं. अहम सबूत भी अमेरिका से बाहर मौजूद हैं. इसके अलावा यह भी निश्चित नहीं था कि आरोपी कभी अमेरिकी अदालत के सामने पेश होंगे. ऐसे में अमेरिकी अदालत में इस मुकदमे को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाना आसान नहीं था.

पांचवां तर्क: किसी निवेशक के नुकसान का स्पष्ट प्रमाण नहीं

DOJ ने यह भी कहा कि इस मामले में ऐसा कोई निवेशक नहीं मिला, जिसका आर्थिक नुकसान स्पष्ट रूप से साबित किया जा सके. यानी ऐसा कोई पीड़ित सामने नहीं था, जिसे अदालत के जरिए मुआवजा दिलाया जाना हो. एजेंसी का मानना था कि सिविल मामले के निपटने के बाद आपराधिक मुकदमा जारी रखने का कोई व्यावहारिक लाभ नहीं बचता था.

पिछली अमेरिकी सरकार पर भी उठाए सवाल

फाइलिंग का सबसे विवादित हिस्सा वह माना जा रहा है, जिसमें DOJ ने पिछली अमेरिकी सरकार के फैसले पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी की. DOJ ने लिखा कि आरोपपत्र पिछली सरकार के अंतिम दिनों में सार्वजनिक किया गया और ऐसा प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य केवल "Name and Shame" करना था. यानी किसी बड़े कारोबारी का नाम सार्वजनिक कर देना, जबकि मुकदमा वास्तव में ट्रायल तक पहुंचेगा या नहीं, इसकी वास्तविक संभावना बहुत कम थी. अमेरिका में नई सरकार द्वारा अपनी ही पूर्ववर्ती सरकार के फैसले पर इस तरह सार्वजनिक रूप से सवाल उठाना बेहद असामान्य माना जा रहा है.

क्या DOJ ने गौतम अडानी को पूरी तरह क्लीन चिट दे दी?

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. DOJ ने कहीं भी यह नहीं कहा कि रिश्वत हुई थी या नहीं हुई थी. उसने यह भी नहीं कहा कि गौतम अडानी पूरी तरह निर्दोष हैं. DOJ का मुख्य तर्क सिर्फ इतना है कि अमेरिका में इस मामले पर आपराधिक मुकदमा चलाने का कानूनी आधार पर्याप्त मजबूत नहीं था और व्यावहारिक रूप से भी इस मुकदमे को जारी रखना उचित नहीं था. यानी बहस अब कथित आरोपों से हटकर अमेरिका के अधिकार क्षेत्र, कानूनी प्रक्रिया और विदेश नीति पर आ गई है.

इस फाइलिंग से क्या संकेत मिलते हैं?

DOJ की 10 पन्नों की यह फाइलिंग सिर्फ एक केस बंद करने का दस्तावेज नहीं मानी जा रही. इसे ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिकी न्याय विभाग की बदलती प्राथमिकताओं की झलक के रूप में भी देखा जा रहा है.डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि अमेरिका को दुनिया के हर विवाद में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. DOJ की इस फाइलिंग में भी कुछ तर्क उसी सोच के अनुरूप दिखाई देते हैं. यही कारण है कि कई कानूनी विशेषज्ञ इस दस्तावेज को हाल के वर्षों की सबसे असामान्य सरकारी कोर्ट फाइलिंग में से एक मान रहे हैं.

आगे क्या देखना होगा?

फिलहाल सबसे बड़ा तथ्य यह है कि DOJ ने अदालत में खुद स्वीकार किया है कि इस आपराधिक मुकदमे को आगे बढ़ाने का मजबूत कानूनी आधार नहीं था और इसे पहले ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए था या शायद शुरू ही नहीं किया जाना चाहिए था.अब आगे सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि क्या इस फैसले का असर अडानी समूह से जुड़े अन्य कानूनी मामलों पर भी पड़ता है और क्या इसे अमेरिका की बदलती कानूनी तथा कूटनीतिक रणनीति के संकेत के रूप में देखा जाएगा.