सोना फिर करेगा जोरदार वापसी, HSBC ने किया बड़ा दावा !

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04 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 4 2026 6:04 PM)

मिडिल ईस्ट तनाव और तेल उछाल के बाद भी सोना नहीं भागा. एचएसबीसी के मुताबिक बॉन्ड यील्ड, डॉलर और केंद्रीय बैंक खरीदारी आगे इसकी दिशा तय करेंगे.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

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मिडिल ईस्ट तनाव के बावजूद सोना उम्मीद के मुताबिक तेज नहीं बढ़ा

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एचएसबीसी ने कहा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने सोने पर ज्यादा दबाव डाला

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सोना ब्याज नहीं देता, इसलिए निवेशक बॉन्ड की तरफ मुड़े

2026 की शुरुआत में सोने ने लगातार नए रिकॉर्ड बनाए. निवेशकों को लगने लगा था कि वैश्विक अनिश्चितता और आर्थिक जोखिमों के बीच Gold की तेजी अभी और जारी रहेगी. इसके बाद Middle East में तनाव बढ़ा, मिसाइल हमले हुए और कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल देखने को मिला.

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आमतौर पर ऐसे हालात में निवेशक सुरक्षित निवेश (Safe Haven) की तलाश में सोने की ओर रुख करते हैं. लेकिन इस बार तस्वीर अलग रही. उम्मीद के विपरीत सोने में वैसी तेजी नहीं आई जैसी पहले बड़े भू-राजनीतिक संकटों के दौरान देखने को मिलती थी.

यहीं से सवाल उठने लगे कि क्या Gold अब अपनी Safe Haven वाली पहचान खो रहा है? हालांकि, HSBC की ताजा रिपोर्ट इस धारणा से सहमत नहीं है. बैंक का मानना है कि सोने की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है और साल 2026 के अंत तक इसमें फिर से तेजी देखने को मिल सकती है.

युद्ध नहीं, इस बार Bond Yield ने तय की सोने की चाल

HSBC के मुताबिक, मौजूदा दौर में सोने की कीमतों को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा फैक्टर युद्ध नहीं, बल्कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (US Treasury Yield) है.

जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तो निवेशक ऐसे निवेश विकल्पों की ओर आकर्षित होते हैं जो नियमित ब्याज देते हैं. चूंकि Gold पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए निवेशकों का एक हिस्सा सोने से निकलकर बॉन्ड में निवेश करने लगता है.

यही वजह रही कि Middle East में तनाव बढ़ने के बावजूद अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ, बॉन्ड यील्ड ऊंची बनी रही और सोने की रफ्तार सीमित रही. यानी इस बार भू-राजनीतिक तनाव से ज्यादा असर ब्याज दरों और बॉन्ड मार्केट का देखने को मिला.

रिकॉर्ड हाई से फिसला सोना

हाल के कारोबारी सप्ताह के अंत तक सोने की कीमत करीब 1,47,365 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रही थी, जो इसके हालिया रिकॉर्ड स्तर से नीचे है.

इसी गिरावट के बाद कई निवेशकों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि क्या अब Gold पहले जैसा Safe Haven नहीं रहा.

HSBC क्यों अब भी Gold पर Bullish है?

HSBC का कहना है कि शॉर्ट टर्म में दबाव जरूर बना रह सकता है, लेकिन लंबी अवधि में तीन बड़े फैक्टर सोने को मजबूती दे सकते हैं.

1. Central Banks की लगातार खरीदारी

दुनिया के कई केंद्रीय बैंक लगातार अपने Gold Reserve बढ़ा रहे हैं. इसमें चीन सबसे आगे बना हुआ है.

रिपोर्ट के मुताबिक, People's Bank of China ने केवल एक महीने में 8.1 टन सोना खरीदा, जो यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंकों का भरोसा अब भी Gold पर कायम है.

2. ETF में लगातार निवेश

HSBC के अनुसार, बड़े संस्थागत निवेशक अब भी Gold ETF में लगातार निवेश कर रहे हैं. इसका मतलब है कि लंबी अवधि के निवेशकों की मांग कमजोर नहीं हुई है.

3. Portfolio Diversification

दुनिया भर के बड़े निवेशक अब केवल शेयर बाजार पर निर्भर नहीं रहना चाहते. वे अपने पोर्टफोलियो में ऐसे एसेट रखना चाहते हैं जो आर्थिक या भू-राजनीतिक संकट के समय सुरक्षा प्रदान करें.

Gold आज भी इसी भूमिका में सबसे अहम निवेश विकल्पों में शामिल है.

क्या Gold अब Safe Haven नहीं रहा?

HSBC इस सवाल का जवाब "नहीं" में देता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, Middle East संकट के दौरान बाजार में एक साथ कई घटनाएं हुईं—

कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं.

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंची हुई.

डॉलर मजबूत हुआ.

शेयर बाजारों में दबाव बढ़ा.

ऐसे माहौल में कई निवेशकों को तुरंत नकदी (Cash) की जरूरत पड़ी. ऐसे समय में उन्होंने Gold इसलिए बेचा क्योंकि यह सबसे अधिक Liquid Asset में से एक है और इसे आसानी से नकदी में बदला जा सकता है.

यानी सोना अपनी भूमिका निभाने में असफल नहीं हुआ. बल्कि उसने वही काम किया जिसके लिए उसे सुरक्षित निवेश माना जाता है—जरूरत पड़ने पर तुरंत Liquidity उपलब्ध कराना.

Oil और Gold का पुराना रिश्ता भी बदल चुका है

HSBC की रिपोर्ट एक और अहम बदलाव की ओर इशारा करती है.

1970 और 1980 के दशक में तेल और सोने की कीमतें अक्सर एक साथ बढ़ती थीं. तेल महंगा होता था तो Gold भी तेजी दिखाता था.लेकिन अब यह संबंध काफी कमजोर पड़ चुका है. इसलिए केवल Geopolitical Tension या Oil Price देखकर Gold की भविष्य की दिशा तय करना अब सही रणनीति नहीं मानी जा सकती.

आगे Gold में क्या हो सकता है?

HSBC का मानना है कि आने वाले महीनों में Gold की चाल मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर और US Bond Yield पर निर्भर करेगी.

हालांकि यदि—

केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीदते रहे,

Gold ETF में निवेश जारी रहा,

और वैश्विक अनिश्चितता बनी रही,

तो साल 2026 के अंत तक Gold में दोबारा अच्छी तेजी देखने को मिल सकती है.

2026 ने यह जरूर दिखाया है कि अब Gold की कीमतें केवल युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव से तय नहीं होतीं. इस बार बॉन्ड मार्केट, अमेरिकी ब्याज दरें और डॉलर की मजबूती ने सोने की चाल पर कहीं ज्यादा असर डाला.

फिर भी केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी, संस्थागत निवेशकों का भरोसा और पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन की बढ़ती जरूरत यह संकेत देती है कि Gold की लंबी अवधि की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. इसी वजह से HSBC अब भी सोने को लेकर सकारात्मक नजरिया बनाए हुए है और उसे उम्मीद है कि 2026 के अंत तक इसमें फिर से मजबूती लौट सकती है.