सोने की कीमतों में तेज गिरावट ने निवेशकों के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अपने रिकॉर्ड हाई से करीब 26% नीचे आ चुका है, तो दूसरी तरफ कुछ संकेत बताते हैं कि निवेशकों की दिलचस्पी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. ऐसे में क्या दिवाली से पहले सोने की कीमतों में और गिरावट आएगी या अगले 2 से 3 महीनों में इसमें 10 से 15% तक की रिकवरी देखने को मिल सकती है?
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सोने की अगली चाल काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी डॉलर, ब्याज दरों और वैश्विक निवेश के रुझान पर निर्भर करेगी.
सोने की कीमतों में कितनी बड़ी गिरावट आई?
जनवरी 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 5,419 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था. इसके बाद कीमतें फिसलकर 4,000 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गईं. इस तरह रिकॉर्ड स्तर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 26% टूट चुका है.
भारतीय बाजार में भी सोने की कीमतों पर दबाव देखने को मिला है. जनवरी में MCX पर सोना करीब ₹1.80 लाख प्रति 10 ग्राम के स्तर तक पहुंचा था. वहीं, पिछले कारोबारी हफ्ते के अंत तक दिसंबर डिलीवरी वाला गोल्ड फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट करीब ₹1.42 लाख प्रति 10 ग्राम पर आ गया. यानी इन स्तरों के बीच करीब ₹38,000 प्रति 10 ग्राम की गिरावट आई है.
कच्चा तेल और अमेरिकी ब्याज दरें क्यों बढ़ा रहीं मुश्किल?
सोने की कीमतों पर दबाव की एक बड़ी वजह कच्चे तेल में तेजी है. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा सप्लाई को लेकर चिंताओं के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 117 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का जोखिम रहता है.
अगर अमेरिका में महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती को टाल सकता है. इससे सोने पर दबाव बढ़ सकता है.
इसके पीछे तीन प्रमुख वजहें हैं.
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मजबूत डॉलर: डॉलर मजबूत होने पर दूसरी मुद्राओं में सोना खरीदना महंगा पड़ सकता है.
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बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न: ब्याज देने वाले निवेश विकल्प आकर्षक बने रहें, तो सोने की मांग प्रभावित हो सकती है.
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मुनाफावसूली: रिकॉर्ड तेजी के बाद निवेशकों की बिकवाली और अहम तकनीकी स्तर टूटने से गिरावट तेज हो सकती है.
गिरावट के बीच गोल्ड ETF में निवेश बढ़ा
सोने की कीमतों में गिरावट के बावजूद निवेश के मोर्चे पर कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं. वैश्विक गोल्ड ETF की होल्डिंग बढ़कर 101.55 मिलियन औंस पहुंच गई, जो जुलाई 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, सितंबर में भारत के गोल्ड ETF में करीब 466 मिलियन डॉलर का निवेश आया. यह सात महीनों का सबसे ऊंचा स्तर था. अक्टूबर के पहले आधे हिस्से में भी निवेश का प्रवाह सकारात्मक बना रहा.
इससे संकेत मिलता है कि कुछ निवेशक कीमतों में गिरावट को सोने में निवेश बढ़ाने के अवसर के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि, ETF में निवेश बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि सोने की कीमतें तुरंत चढ़ने लगेंगी.
भारतीय बाजार में डिस्काउंट घटने से क्या संकेत मिलता है?
घरेलू बाजार में सोने की मांग का अंदाजा लगाने के लिए डिस्काउंट पर भी नजर रखी जाती है. जब भारत में मांग कमजोर होती है, तो सोना अंतरराष्ट्रीय कीमत के मुकाबले कम भाव पर बिक सकता है.
सितंबर में भारतीय बाजार में सोने पर औसत डिस्काउंट करीब 66 डॉलर प्रति औंस था. 16 अक्टूबर तक यह घटकर करीब 8 डॉलर प्रति औंस रह गया. यानी अंतरराष्ट्रीय कीमत के मुकाबले भारतीय बाजार में सोने का भाव पहले जितना कम नहीं रह गया था.
यह घरेलू मांग में सुधार का संकेत हो सकता है, लेकिन सिर्फ डिस्काउंट में कमी के आधार पर तेजी की पुष्टि नहीं की जा सकती.
फेड की बैठक और महंगाई के आंकड़ों पर नजर
आने वाले दिनों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक और महंगाई के आंकड़े सोने की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली फेड की बैठक से बाजार को ब्याज दरों और आगे की मौद्रिक नीति के संकेत मिल सकते हैं.
इसके बाद अमेरिका के PCE महंगाई आंकड़े भी महत्वपूर्ण होंगे. अगर महंगाई उम्मीद से ज्यादा रहती है, तो ब्याज दरों में कटौती की संभावना कमजोर पड़ सकती है. इसके उलट, महंगाई में नरमी सोने को सहारा दे सकती है.
भारतीय निवेशकों के लिए रुपये की चाल भी अहम है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत घटने के बावजूद रुपये में कमजोरी घरेलू बाजार में गिरावट को सीमित कर सकती है.
सोने के लिए कौन से स्तर अहम?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में 4,000 डॉलर प्रति औंस का स्तर फिलहाल महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसके नीचे कीमतों के टिकने पर सोना 3,930 से 3,950 डॉलर प्रति औंस तक फिसल सकता है.
वहीं, तेजी लौटने की स्थिति में 4,140 और 4,227 डॉलर के स्तर अहम रहेंगे. इन स्तरों के ऊपर मजबूती से टिकना सोने में सुधार का संकेत दे सकता है.
Augmont की चीफ रिसर्च ऑफिसर रेनिशा चेनानी के मुताबिक, अगले 2 से 3 महीनों में सोना मजबूत आधार बनाकर 10 से 15% तक रिकवर कर सकता है. हालांकि, यह एक अनुमान है और इसकी पुष्टि बाजार की आगे की चाल से ही होगी.
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
फिलहाल सोने के सामने दो विपरीत स्थितियां हैं. महंगा कच्चा तेल, मजबूत डॉलर और ऊंची ब्याज दरों की आशंका कीमतों पर दबाव बना सकती है. वहीं, गोल्ड ETF में निवेश और भारतीय बाजार में मांग सुधरने के संकेत सोने को सहारा दे सकते हैं.
ऐसे में केवल रिकॉर्ड हाई से बड़ी गिरावट देखकर सोने को सस्ता मान लेना सही नहीं होगा. निवेशकों को अपनी निवेश अवधि, जोखिम उठाने की क्षमता और बाजार के संकेतों को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए.
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